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कृषि से पलायन थामने की चुनौती

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केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का संसद में पेश आर्थिक समीक्षा 2017-18 में यह स्वीकारोक्ति कि रोजी की तलाश में गांवों से पलायन बढ़ रहा है और कृषि कार्य का बोझ महिलाओं पर आन पड़ा है।

रेखांकित करने के लिए पर्याप्त है कि कृषि से जुड़े रोजगार के अवसर लगातार घट रहे हैं। आर्थिक समीक्षा में यह तथ्य भी सामने आया है कि खेतीबाड़ी के काम में यांत्रिकीकरण यानी मशीनों का इस्तेमाल बढ़ा है और जोतों का आकार छोटा हुआ है। आर्थिक समीक्षा में आशंका जतायी गयी है कि कृषि आय पर जलवायु परिवर्तन का साया मंडरा रहा है जिसके कारण कृषि आय के मध्यम तौर पर 20-25 प्रतिशत तक घटने का जोखिम हो सकता है। अगर यह आशंका सच साबित होती है तो नि:संदेह गांवों से पलायन की गति और तेज होगी।

गौर करें तो भारतीय कृषि पर जलवायु परिवर्तन का असर पहले से ही देखा जा रहा है और अगर कहीं इसका प्रभाव व्यापक हुआ तो न केवल कृषि आय प्रभावित होगी बल्कि शहरों पर जनसंख्या का दबाव पर बढ़ेगा। विश्व बैंक पहले ही आगाह कर चुका है कि गांवों से पलायन की वजह से भारत की आधी आबादी 2050 तक शहरी हो जाएगी और कुल श्रम बल में कृषि श्रमिकों का प्रतिशत 2001 के 58.2 प्रतिशत से गिरकर 2050 तक 25.7 प्रतिशत तक आ जाएगा।

आश्चर्य है कि एक ओर केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुना करने के उद्देश्य से किसानों को संस्थानात्मक स्रोतों से ऋण उपलब्ध कराने के साथ मृदा कार्ड स्वास्थ्य, लागत प्रबंध, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, पीएमएफबीवाई तथा प्रोत्साहन जैसी योजनाएं चला रही है, वहीं गांवों से पलायन थमने का नाम नहीं ले रहा। यह स्वीकारने में हिचक नहीं कि खेती के विकास में क्षेत्रवार विषमता का बढ़ना, प्राकृतिक बाधाओं से पार पाने में विफलता, भूजल का खतरनाक स्तर पर पहुंचना और हरित क्रांति वाले इलाकों में पैदावार में कमी आना के अलावा फसलों और बाजारों की दूरी न घटने, फसलों का उचित मूल्य न मिलने जैसे कई कारण हैं जिसकी वजह से गांवों से पलायन बढ़ा है।

यह तथ्य यह भी दर्शाता है कि किसान क्रेडिट कार्ड और फसलों की बीमा योजनाओं के अलावा राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, गुणवत्तापूर्ण बीज के उत्पादन और वितरण, राष्ट्रीय बागवानी मिशन जैसी अनगिनत योजनाओं से भी किसानों को कोई विशेष लाभ नहीं हुआ है। कृषि कार्य में लागत के अनुपात में लाभ न के बराबर है ऐसे में इससे जुड़े लोगों का शहर की ओर पलायन लाजिमी है।

भूमि अधिग्रहण के कारण आज देश में प्रति व्यक्ति कृषि भूमि की उपलब्धता 0़18 हेक्टेयर रह गयी है। 82 प्रतिशत किसान लघु एवं सीमांत किसानों की श्रेणी में आ गए हैं और उनके पास कृषि भूमि दो हेक्टेयर या उससे भी कम रह गयी है। जो कल तक किसान थे, आज खेतीहर मजदूर बन गए हैं। दूसरी ओर कृषि क्षेत्र की विकास दर भी लगातार घटती जा रही है।

सरकार दावा करती है कि वह गांवों से पलायन रोकने के लिए कृषि ग्रोथ के लिए रचनात्मक पहल कर रही है। लेकिन हकीकत यह है कि वर्ष 2012 से 2017 के 12 वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि में भारत की पहले चार साल में 1़6 प्रतिशत की वृद्घि रही है, जो कि 4 प्रतिशत के लक्ष्य से कोसों दूर है। हां, विगत वर्षों से कृषि का उत्पादन जरुर बढ़ा है लेकिन इसके बाद भी किसानों की आर्थिक स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया है।

आज की तारीख में देश के 9 करोड़ किसान परिवारों में से 52 प्रतिशत कर्ज में डूबे हैं और प्रत्येक किसान पर तकरीबन 47 हजार रुपए कर्ज है। आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में कृषि और संबंद्घ क्षेत्रों की वृद्घि दर 2़1 प्रतिशत रहने का अनुमान है जबकि पिछले वित्त वर्ष में यह 4़9 प्रतिशत थी। ये आंकड़े बताने के लिए काफी हैं कि भारत में कृषि की स्थिति कितनी बदतर हो चुकी है।

अगर ऐसे में कृषि क्षेत्र से जुड़े लोग रोजी-रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं तो सरकार को चाहिए कि कृषि को रोजगारपरक बनाने की दिशा में ठोस पहल करे।

रीता सिंह

 

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