सम्पादकीय

केंद्रीय रिजर्व बैंक पर सरकार की तकरार

Central, RBI

केन्द्र सरकार व देश के केंद्रीय रिजर्व बैंक के बीच टकराव से संवैधानिक मर्यादा को ठेस पहुुंची है। सरकार पर बैंक के लिए निर्देश जारी कर दबाव बनाने के आरोप लग रहे हैं। सीबीआई व सीवीसी में दखलअन्दाजी की रिर्पोेटों के बाद केंद्रीय बैंक के साथ तकरार, सरकार की साख को प्रभावित कर रही है। दरअसल नीरव मोदी, विजय माल्या सहित कई अन्य घपलेबाजों के कारण देश के बैंकों का डूबा कर्ज 150 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। ऐसी हालत में केंद्रीय बैंक का देश के बैंकों को खुले हाथों से कर्ज बांटने से रोकना आवश्यक हो गया था।

केंद्रीय बैंक के अधिकारियों की ओर से सार्वजनिक समारोहों में पेश किए गए विचारों से यह बात समझ आती है कि सरकार बैंकों को अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए अपने हिसाब से चलाना चाहती है। केंद्रीय बैंक के डिप्टी गर्वनर विरल आचार्य ने एक समारोह में कहा है कि जब सरकार बैंकों के काम में दखलअन्दाजी करती है तो देश को वित्तीय संकट का सामना करना पड़ता है। इस संबंधी उन्होंने अर्जेन्टीना की मिसाल भी दी है। स्पष्ट है बैंक अधिकारी सरकार के नोटबन्दी वाले निर्णय के साथ सहमत नहीं थे। केंद्रीय बैंक के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने स्पष्ट कहा था कि वह उस समय के हालातों में नोटबन्दी के खिलाफ थे। दरअसल हमारे देश की सरकारी संस्थाओं का राजनीतिकरण हो चुका है।

सरकार व पार्टी की नीतियों व कार्यक्रमों के बीच की रेखा को अलग कर पाना मुश्किल हो गया है। चुनावों में जीत हासिल करने के लिए संबंधित संस्थाओं से निर्णय राजनैतिक स्वार्थों के अनुसार करवाए जाते हैं। खास कर वित्तीय मामले में ऐसा करना देश की अर्थ व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है, जहां तक रिजर्व बैंक एक्ट के सैक्शन-7 का संबंध है, सरकार कोई भी निर्देश गर्वनर की सलाह के बिना जारी नहीं कर सकती। मौजूदा माहौल इस बात की गवाही देता है कि केंद्रीय बैंक की मनमानी के साथ राजनैतिक छेड़छाड़ की तकरार का कारण बन रही है। बैंकिंग का काम वित्तीय विशेषज्ञों ने देखना है। सरकार इनकी निगरानी कर सकती है परंतु इनको राजनैतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल करना पूरे आर्थिक ताने -बाने को उलझाना है। सरकार देश के हित में निर्देश जारी करने का अधिकार रखती है जो जनहित में होना जरूरी है, न कि चुनावी हित के लिए संवैधानिक परम्पराओं के सम्मान के साथ ही जनता का सरकार पर विश्वास बढ़ता है और देश तरक्की करता है। सरकार को बैंकिंग मामले में संवैधानिक मर्यादाओं के सम्मान को बरकरार रखने के लिए वोट राजनीति से ऊपर उठ कर कार्य करने की आवश्यकता है।

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