सम्पादकीय

‘आरक्षण’ में आ रही वोट बटोरने की बू

Buying the votes coming in 'Reservation

केन्द्र की मोदी सरकार ने जनरल वर्ग को 10 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है। यह एक ऐतिहासिक निर्णय है। लंबे समय से स्वर्ण जातियों द्वारा आरक्षण की मांग की जा रही थी। इससे यह विचारधारा उभरकर सामने आया था कि पूरे जनरल वर्ग की बजाय जरनल वर्ग के केवल आर्थिक तौर पर कमजोर लोगों को आरक्षण दिया जाए। दलित नेता भी इस विचार से सहमत थे। केंद्र से पूर्व गुजरात में भी उच्च जातियों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की जा चुकी है। सैद्धांतिक तौर पर यह पहल मोदी सरकार ने की है लेकिन इस निर्णय को लागू करने के पीछे बड़ी चुनौती आरक्षण पर उच्चतम न्यायलय का निर्णय भी है। इसी रूलिंग के कारण केन्द्रीय आरक्षण सहित कई राज्यों में आरक्षण के मामले अदालतों में अटके पड़े हैं।

राजस्थान में आरक्षण की तय सीमा से अधिक होने के कारण पेंच फंसा हुआ है। केंद्र सरकार को निर्णय लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा, दूसरी ओर इस निर्णय को राजनैतिक चाल चलने से इंकार नहीं किया जा सकता। चार वर्ष तक इस मामले में चुप रहने के बाद यह फैसला अब लिया गया है जब लोक सभा चुनावों में महज तीन महीने का समय बाकी है। सरकार की मंशा स्पष्ट है कि जनरल वर्ग के वोट बटोरने के लिए सरकार संविधान में संशोधन करने के लिए तैयार है। जहां तक वोट नीति का संबंध है सत्ता में बैठी पार्टियां आरक्षण को वोट की फसल काटने के अस्त्र के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। सरकार का ध्यान रोजगार स्थापित करने की तरफ कम और पहले से स्थापित सीमित रोजगार को जातियों के आधार पर बांटने की तरफ ज्यादा है। पहले ही देश में आरक्षण के पक्ष व विरोध में अलग-अलग विचारधाराएं हैं। एक विचार पहले से ही आरक्षण के विरोध में है और आरक्षण नीति को तर्क संगत बनाने की मांग की जा रही है। वास्तव में सरकार आरक्षण के मामले में बेबस और वोट बटोरने की अधेड़बुन में है।

आरक्षण को तर्क संगत बनाने की बजाय ‘जो भी आरक्षण मांगें उसे दे दो या वोट के लिए कुछ भी करो’ की नीति पर चलते हुए इसे अनुदान बांटने की परंपरा बना दिया गया है। भले ही सरकार की आर्थिक कमजोरी का तर्क वजनदार है लेकिन लंबे समय के लिए आरक्षण का मामला चुनावी साल में लागू होने की प्रक्रिया में मुश्किलों भरा है। सरकार के फैसले ने यह भी साबित कर दिया है कि राजनैतिक पार्टियां वोट के लिए अच्छे शासन की अपेक्षा अधिक घोषणाओं को सत्ता प्राप्ति के लिए जरूरी मानतीं हैं। सरकार का मौजूदा फैसला भी परंपरागत राजनीति का ही दोहरा मापदंड है। सरकार उच्च जातियों को आरक्षण देकर अपने चुनावी उद्देश्य के कारण अलोचना से पीछा नहीं छुड़ा सकती।

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