जन-आकांक्षाओं पर खरा उतरे बजट!

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Budget met the people's aspirations - sach kahoon

प्रत्येक बजट में सरकार शिक्षा पर एक बड़ी धनराशि घोषित करती आई है। शिक्षा के बिना देश की उन्नति संभव नहीं है। देश में प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा की स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता है। चंद रोज पहले आई ‘असर’ रिपोर्ट से यह तथ्य पुन: उजागर हुआ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित सरकारी स्कूलों और वहां पढ़ रहे बच्चे गुणवत्ता में कमी से जूझ रहे हैं। कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, तो कहीं बच्चों की उपस्थिति ही संतोषजनक नहीं है।

सुधीर कुमार

आगामी वित्तीय वर्ष (2020-2021) के लिए आम बजट प्रस्तुत करने की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। गत दिनों ‘हलवा-रस्म’ की परंपरागत अदायगी के साथ बजट दस्तावेजों के औपचारिक प्रकाशन की शुरूआत भी हो चुकी है। बजट के साथ समाज के हरेक वर्ग की आशाएं जुड़ी होती हैं, लिहाजा सरकार से उम्मीदें रखना स्वाभाविक जान पड़ता है। वास्तव में बजट न सिर्फ सरकार के सालभर के आय-व्यय का लेखा-जोखा होता है, अपितु इसके माध्यम से सरकारें अगले एक वर्ष के लिए देश के विकास के अपने दृष्टिकोण व प्रतिबद्धता को भी जाहिर करने का प्रयास करती हैं। इस दौरान, सत्तारुढ़ सरकार के लिए एक ऐसा बजट पेश करने की चुनौती होती है, जो देश के सभी वर्गों की उम्मीदों पर खरा उतरे। आमतौर पर देखा जाता है कि सरकारें नागरिकों को खुश करने के लिए बजट में बड़े-बड़े वायदे जरूर करती हैं, लेकिन उचित क्रियान्वन के अभाव में बहुत सारी घोषणाएं ढाक के तीन पात साबित हो जाती हैं!

आगामी बजट नरेंद्र मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल का दूसरा बजट होगा। 2019-2020 का पिछला बजट ग्रामीण व कृषि विकास पर केंद्रित था। किसानों व खेती की उन्नति के लिए मौजूदा सरकार ने ढेर सारे कदम उठाए थे। इधर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ऐसे समय बजट पेश करने जा रही है, जब आर्थिक मोर्चे पर देश कई सवालों से जूझ रहा है। एक तरफ विकास दर में लगातार गिरावट से मंदी जैसे हालात बन गए हैं, तो दूसरी तरफ बेरोजगारी के आंकड़ों में तेजी से इजाफा हो रहा है, जिससे युवाओं में काफी रोष है। वित्त मंत्री के समक्ष ऐसा बजट पेश करने की चुनौती है, जो समाज के सभी वर्गों के लोगों के हितों का प्रतिनिधित्व करे। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि इस बजट में सरकार कृषि विकास व किसानों की उन्नति के लिए क्या कदम उठाती हैं! कृषि प्रधान देश के किसानों की नजरें फसलों की उचित कीमत मिलने, पंचायत स्तर पर भंडारण और विपणन की सुविधा उपलब्ध होने, कृषि आगतों की कीमतें कम होने तथा अपनी आय दोगुणी करने के सरकार के प्रयासों और घोषणाओं पर टिकी है।

देश में सरकारी अस्पतालों की चिकित्सा व्यवस्था दम तोड़ती नजर आ रही है। एक तरफ निजी अस्पतालों और डॉक्टरों ने चिकित्सा को लूट का माध्यम बना रखा है, तो दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों की माली हालत गरीबों के लिए अभिशाप बनती जा रही है। आलम यह है कि प्रखंड और जिला स्तरीय अस्पतालों में आवश्यक दवाओं तथा आधुनिक चिकित्सा यंत्र की अनुपलब्धता की वजह से ‘रेफर सिस्टम’ के बढ़ते चलन ने आमजन के जीवन को कीमतहीन बना दिया है। सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक उपचार केंद्रों के प्रति लोगों का विश्वास बना रहे, इसके लिए उचित बजटीय आवंटन कर उन्हें सुधारने की एक बड़ी चुनौती सरकार के समक्ष है। इसके अलावे देश में आबादी के हिसाब से डॉक्टरों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इस मामले में हम संयुक्त राष्ट्र के निर्धारित मानक से काफी पीछे हैं। पिछले दिनों राजस्थान और गुजरात के अस्पतालों में मासूम बच्चों की मौत से पूरा देश मर्माहत हुआ। ऐसे में नौनिहालों को कैसे बचाया जाए? इसके लिए भी प्रयास करने होंगे। देश में टीबी, एड्स, कुष्ठ रोग और पोलियो जैसी बीमारियों के उन्मूलन के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। उसके लिए भी फंड बढ़ाया जाना चाहिए ताकि समय रहते इन बीमारियों के फैलाव को रोका जा सके और लोगों को जागरूक किया जा सके।

प्रत्येक बजट में सरकार शिक्षा पर एक बड़ी धनराशि घोषित करती आई है। शिक्षा के बिना देश की उन्नति संभव नहीं है। देश में प्रारंभिक से लेकर उच्च शिक्षा की स्थिति में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता है। चंद रोज पहले आई ‘असर’ रिपोर्ट से यह तथ्य पुन: उजागर हुआ है कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित सरकारी स्कूलों और वहां पढ़ रहे बच्चे गुणवत्ता में कमी से जूझ रहे हैं। कई स्कूलों में पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, तो कहीं बच्चों की उपस्थिति ही संतोषजनक नहीं है। सरकार ने कक्षा में शिक्षक-छात्र का जो अनुपात तय किया है, वह भी शायद ही देखने को मिलता है। हालांकि, शिक्षा व्यवस्था से देश के अंतिम व्यक्ति को जोड़ पाना आज भी किसी चुनौती से कम नहीं है। दुखद है कि संविधान लागू होने के लगभग सात दशक बाद भी एक बड़ी आबादी शिक्षा तक नहीं पहुंच पायी है। शिक्षा के अभाव में विभिन्न स्तरों पर उनका शोषण हो रहा है। आशा है, गुणवत्तापूर्ण तथा रोजगारपरक शिक्षा के विकास के लिए इस बार भी अच्छी धनराशि आवंटित होगी, जिससे शिक्षा व्यवस्था से कोसों दूर रह रहे लोगों को इससे जोड़ पाने में सफलता मिल पाएगी।

बजट में नये संस्थान खोलने की पेशकश भले ना हो, किंतु विद्यालय और विश्वविद्यालयों में आधारभूत संरचनाएं दुरुस्त करने और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए सतत प्रयास की रूपरेखा निश्चित रूप से तय की जानी चाहिए।महिला सुरक्षा को लेकर बजट से बहुत आशाएं हैं। बजट में वित्तमंत्री को महिला सशक्तिकरण पर विशेष फोकस करना चाहिए। आज देश में महिलाओं की सुरक्षा किसी चुनौती से कम नहीं है। कमोबेश हरेक दिन महिलाओं से दुराचार की खबरें संचार माध्यमों में तैरती रहती हैं। अत: बजट द्वारा लोगों की मानसिकता तो नहीं बदली जा सकती है, लेकिन महिला सुरक्षा के लिए अनके मोर्चों पर विशेष प्रयास किए जा सकते हैं। मसलन निर्भया फंड की राशि बढ़ाई जा सकती है। नयी फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना, भीड़-भाड़ वाली जगहों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने, बसों और ट्रेनों में सुरक्षा तंत्र का विकास तथा निर्भया फंड की राशि बढ़ाने की घोषणा की जानी चाहिए।

बहरहाल आम बजट से समाज के सभी वर्गों की ढेर सारी उम्मीदें बंधी होती हैं। आशा है, विभिन्न वर्गों के उत्थान से जुड़ी योजनाओं के बजटीय आवंटन में कटौती नहीं की जाएगी। सरकार समावेशी विकास को केंद्र में रखकर लोकप्रिय तथा लोकलुभावन घोषणाओं से इतर छोटे किंतु प्रभावी कदम उठाने पर जोर देगी। इसके साथ ही सरकार अपने मंत्र ‘सबका साथ, सबका विकास’ को भी बजट के माध्यम से व्यवहृत करने की कोशिश करे तो खुशी होगी।

 

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