सूदखोरी में टूटती जीवन की डोर

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सूदखोरों के दबाव में बिजली के तार को छूकर मौत को गले लगाने का मामला भले ही जयपुर का हो पर कमोबेस यह उदाहरण देश के किसी भी कोने में देखा जा सकता है। जयपुर में एशिया की सबसे बड़ी कालोनी मानसरोवर में इसी 29 मई को मुहाना के 43 वर्षीय बाबू लाल यादव ने अपने परिचित के घर से गुजर रही बिजली की लाइन के तार को छूकर अपनी इह लीला समाप्त कर ली।

बाबू लाल यादव ने अपने 2 पेज के सुसाइड नोट में लिखा कि दो करोड़ के लोन के बदले चार करोड़ चुकाने के बाद भी कर्जदारों के तकाजों से तंग आकर उसने मौत को गले लगा लिया। इससे कुछ समय पहले ही जयपुर में एक ही परिवार के सभी सदस्यों द्वारा सामूहिक आत्म हत्या व उससे पहले एक बिल्डर द्वारा नींद की गोलियां खाकर आत्म हत्या का प्रयासों से यह बात तो साफ हो जाती है कि प्रेमचंद की गोदान या पुरानी फिल्मों के सूदखोरों के आतंक हवाहवाई नहीं थे।

बल्कि देखा जाए तो यह सूदखोरों का सच था जो आज भी देखने को मिल जाता है। हांलाकि आत्महत्या के उल्लेखित उदाहरण सूदखोरों से लिए गए कर्जें को ना चुकाने के दबाव का है पर यह नहीं भूलना चाहिए कि गली-गली में खुली फायनेंस कंपनियों के बॉक्सरों द्वारा मारपीट कर दबाव बनाना या सामान उठा ले जाना आए दिन की बात है।

हमारी पारिवारीक व्यवस्था के बिखराव के साथ ही रातोंरात रईस बनने के सपने पहले तो ऐन केन प्रकारेण पैसे उधार ले लेना और फिर इसके बाद उधार चुकाने का दबाव बनने पर मौत को गले लगाने के संकेत साफ है कि हमारी सहन शक्ति का दायरा सीमित होता जा रहा है। दरअसल सहन शक्ति या यों कहें कि विपरीत परिस्थितियों से मुकाबिल होने का हौसला ही समाप्त होता जा रहा है।

हांलाकि सूदखोरों के लिए सरकार ने लाइसेंस व्यवस्था करने के साथ ही ब्याज दरों के निर्धारण तक के कानून कायदे बना रखे हैं पर जिस तरह से किराएदारों या घरेलू नौकरों की जानकारी पुलिस थानों में देना हम तौहीन समझते हैं उसी तरह से कानून कायदों की पालना नहीं करना हमारी आदत में शुमार नहीं हैं। एक दूसरा पक्ष यह भी है कि सरकार के कारिंदे भी कानून की पालना हो रही है या नहीं इसे देखने की जहमत नहीं उठाना चाहते हैं। नियमानुसार बिना लाइसेंस के सूदखोरी अपराध है पर इसकी पालना संभवत: नहीं के बराबर ही हो रही है।

इस सबका का एक बड़ा कारण बाजार में अत्यधिक पैसे का आना, लोगों का रातोंरात रईस बनने का सपना, उंचे ख्वाब देखना ही तो है। मजे की बात यह है कि देश में बैंकिंग क्षेत्र में इतने विकास और आसान शर्तों पर कर्जें की सरकारी घोषणाओं के बावजूद सूदखोरों का जाल फैला हुआ है तो यह सरकार और समाज दोनों के लिए शर्मनाक स्थिति है।

आजादी के पहले के आंचलिक साहित्य और आजादी के बाद के जमाने की गोदान, दो बीघा जमीन जैसी फिल्मों के माध्यम से सूदखोरों के चंगुल में एक बार फसंने के बाद उनकी ज्यादतियों और कर्ज के जाल में पीढ़ी दर पीढ़ी फसंने की रोंगटे खड़ी करने वाली दास्तानें यदि आज भी देखने को मिलती है तो फिर आजादी का कोई मायना नहीं हो सकता।

हांलाकि इसके लिए केवल सरकार को दोष नहीं दिया जा सकता बल्कि ज्यादा दोष तो समाज के बदलते मानकों को जाता है। एक समय था जब समाज में इज्जत ही सबकुछ होती थी ठीक इसके विपरीत आज पैसा ही सबकुछ होने लगा है। ऐसे में लोगों का ज्यादा से ज्यादा धन जल्दी से जल्दी बटोरने की धुन सवार होती है और इसके लिए उल्टे सीधे कामों के साथ ही कर्ज के जाल में फंस कर जीवन दूभर करना भी शामिल है।

यहां दो बातें और विचारणीय है। एक और सरकार ने रोजगार के लिए ऋण देने की अनेक योजनाएं चला रखी है। पर दुर्भाग्यजनक स्थिति यह है कि बैंकों की ऋण देने की प्रक्रिया इतनी थका देने वाली है कि लोग साहूखोरों के चंगुल में फंस ही जाते हैं। इसी तरह से क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों का मकड़जाल भी लाख प्रयासों के बावजूद टूट नहीं पाया है।

इनमें से कुछ सोसायटियों द्वारा किए जाने वाले फ्राड के चलते पूरा मूमेंट ही बदनाम होकर रह गया है। एक अन्य बात बांग्लादेश में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से माइक्रो फायनेंस का प्रयोग एक सीमा व कुछ समय तक सफल रहा और समूहों का बैंक तक संचालित होने लगा। हमारे देश में भी 90 के दशक में स्वयं सहायता समूहों का कंस्पेट तेजी से उभरा और आंध्रप्रदेश व बंगाल में इसी गरीबी के विरुद्ध लड़ाई का सशक्त हथियार माना जाने लगा। पर अब तो यह मॉडल भी अपने उद्देश्यों में विफल होता दिखने लगा है।

सूदखोरी के चलते आत्म हत्या के पीछे कहीं ना कहीं हमारी सामाजिक व्यवस्था के छिन्न भिन्न होने को भी दशार्ता हैं। उंचे ख्वाबों के चलते उधार पर उधार पर उधार लेते जाना और फिर जब चुकाने का अवसर आए तो फिर हताशा के अलावा और कोई चारा नहीं दिखाई देता हैं। टेलीविजन, लेपटॉप और मोबाईल संस्कृति ने जिस तरह से एकाकीपन को विस्तारित किया है बल्कि यों कहें कि सोशियल मीडिया द्वारा भी सोशियल के स्थान पर अनसोशियल बनाने का काम ही किया है।

वाट्रसएप, ट्विटर पर बिन मांगें प्रवचनों का ढे़र लगा रहता है पर जो धरातलीय स्थिति से कोसों दूर होता है। सामाजिकता के लिए दो आदमियों के बीच बैठना, दु:ख दर्द में भागीदार बनना, परेशानियों को परस्पर शेयर न करना आम होता जा रहा है। ऐसे में सामाजिक ताने-बाने को सशक्त बनाने की आज पहली आवश्यकता होती जा रही है। समाज विज्ञानियों को भी बढ़ती आत्महत्याओं के कारणों का निराकरण खोजना होगा। आजादी के बाद भी सूदखोरी के चंगुल से मजबूर लोगों को बचाने के प्रयास करने होंगे। सूदखोरों की अवैध गतिविधियों को भी बाधित करना होगा।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

 

 

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