सम्पादकीय

टूट रहा समाज

Breaking society

भारतीय समाज में रिश्तों में दरार आने के साथ-साथ हिंसा की प्रवृत्ति भी बड़े स्तर पर बढ़ रही है। आए दिन परिवारिक सदस्यों द्वारा परिवार के ही किसी सदस्य की हत्या करने वाली खबरें सुनने को मिल रही हैं। धार्मिक विचारधारा वाले लोग इसे घोर कलियुग कह देते हैं। मोटे तौर पर इन घटनाओं के पीछे जमीन-जायदाद, अवैध रिश्ते, ज्यादा गुस्सा, नशा व परिवारिक कलह ही कारण होते हैं। आम तौर पर इन घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस प्रबंध मजबूत करने की बात कही जाती है, लेकिन सामाजिक संबंधों में आ रही गिरावट की जड़ टटोलने की बजाय उस पर चर्चा भी नहीं होती।

भारतीय संस्कृति प्यार, मोहब्बत, दया-रहम, सब्र व माफी जैसे गुणों से भरपूर थी, लेकिन आज टीवी चैनलों व इंटरनेट से विभिन्न प्रकार की हिंसक सामग्री देखने से बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। बड़े होकर यही बच्चे दुश्मनी जैसी भावनाओं के शिकार हो जाते हैं। पारिवारिक मामलों के नाम पर बनाए जाते टीवी सीरियलों में भी शत्रुता इस कद्र हावी हो गई है कि देवरानी-जेठानी, ननद-भाभी, भाई-बहन व सास-बहू भी एक दूसरे को सबक सिखाने के लिए साजिश करते दिखाए जाते हैं।

यह कहना भी गलत नहीं होगा कि फिल्मों के मुकाबले टीवी सीरियलों में ज्यादा हिंसा दिखाई जा रही है। सरकारों व पुलिस के द्वारा अपराधियों को सजा दिलवाना ही कर्त्तव्य पूरा कर लेना है, लेकिन जो दिन-प्रतिदिन संचार के स्त्रोत हिंसा को धीमे जहर तरह परोस रहे हैं उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। केंद्र स्तर पर सरकार ने देश की संस्कृति नीति बनाने की घोषणा की थी, लेकिन यह भी कागजी घोषणा बनकर रह गई। मीडिया का भी कोई अर्थ ही नहीं रह गया। समाचार-पत्रों व टीवी चैनलों की विज्ञापनबाजी ने भी अश्लीलता की सारी हदें पार कर दी है। समाज को बचाने के लिए केवल कानूनी कार्रवाई नहीं बल्कि सरकारी नीतियों में व सामाजिक प्रयासों में भारतीय संस्कृति को स्थान देना होगा।

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