सम्पादकीय

राजनीति को न बनाएं शैतानों की शरणस्थली

Big contradictions in these general elections

इन आम चुनावों में बड़े विरोधाभास दिख रहे हैं। एक बड़ा विरोधाभास है राजनीतिक घोषणाओं एवं आश्वासनों का, जो तमाम अंधेरों के बीच चांद उगाने की कोशिशें कर रहा है। इन सबके बीच आप और हम उन चार अंधों को मिले हाथी की तरह है, जो अपने मापदंडों के साथ अपना-अपना सच परखने में जुटे हैं कि इर्द-गिर्द जो घट रहा है, वह सही है या गलत? अनेक प्रश्न जहन में उभर रहे हैं। सबसे बड़ा प्रश्न तो यही है कि आज भी भारत में राष्ट्रीय भावना और देशभक्ति की भावना को मानकर नहीं चला जा सकता। राजनीति की बन चुकी मानसिकता में आचरण की पैदा हुई बुराइयों ने पूरे तंत्र और पूरी व्यवस्था को प्रदूषित कर दिया है। स्वहित और स्वयं की प्रशंसा में ही लोकहित है, यह सोच हमारी राजनीति में घर कर चुकी है।

यह रोग राजनीति की वृत्ति को इस तरह जकड़ रहा है कि हर दल और नेता लोक के बजाए स्वयं के लिए सब कुछ कर रहा है। भ्रष्ट आचरण और व्यवहार अब हमें पीड़ा नहीं देता। सबने अपने-अपने निजी सिद्धांत बना रखे हैं, भ्रष्टाचार की परिभाषा नई बना रखी है। हम जो हर दिन आंख खोलते और बन्द करते हुए चौबीस घंटे की जिन्दगी पूरी करते हैं, उसमें कुछ भी राजनीति से अछूता नहीं है। हम और हमारा जीवन राजनीति में लिप्त है और वही राजनीति आम चुनावों में यहां एक अलग तरह का माहौल पैदा कर रही है जिसमें राजनीतिक दल और राजनेता एक दूसरे को मयार्दाएं सिखा रहे हैं, एक तरह से राजनीति में दूसरे को मर्यादा का पाठ पढ़ाने का खेल चल रहा है। जबकि स्वयं की सीमा और संयम किसी को भी याद नहीं है।

सिर्फ दूसरों की कमियों को गिनाना एक खतरनाक खेल है, अपनी अनदेखी करने की यह आदत भारतीय राजनीति की एक ऐसी विडंबना बनती जा रही है जो न केवल राजनीतिक दलों के लिए घातक होगी बल्कि राष्ट्र को भी कमजोर बनाएगी। मयार्दाएं और संयम सबके लिए समान है और यही आदर्श स्थिति भी है। यह ऐसा खेल है जिसमें हर खिलाड़ी दूसरे की सीमा अपने ढंग से तय करता है। कोशिश यह दिखाने की रहती है कि दूसरा गलत खेल रहा है। अपने लिए तो सभी यह मानकर चलते हैं कि उनसे गलती हो ही नहीं सकती।

हमारी राजनीति के इस चरित्र को समझने की जरूरत सिर्फ राजनेताओं को ही नहीं है, सामान्य नागरिकों के लिए भी यह समझना जरूरी है कि वह इस खेल को समझें। संभवत भारत के लोग इस खेल को समझने के साथ-साथ एक नये जिम्मेदारीपूर्ण अहसास को भी समझ रहे हैं। राजनीतिक परिपक्वता और समय का तकाजा है कि हम दूसरों की ही नहीं अपनी मयार्दाएं भी समझें और उसके अनुरूप आचरण करें। यह भी जरूरी है कि हम अपने को दूसरों से अधिक उजला समझने की प्रवृत्ति से भी बचें। हमें यह भी एहसास होना चाहिए कि जब हम किसी की ओर एक उंगली उठाते हैं तो शेष उंगलियां हमारी स्वयं की ओर उठती हैं। हम स्वयं को दर्पण में देखने की आदत डालें। दूसरों को दागी बताने से पहले अपने दागों को पहचानें। नैतिकता की मांग है कि सत्ता के लालच अथवा राजनीतिक स्वार्थ के लिए हकदार का, गुणवंत का, श्रेष्ठता का हक नहीं छीना जाए। राजनीति को शैतानों की शरणस्थली मानना एक शर्मनाक विवशता है। लेकिन कतई जरूरी नहीं कि इस विवशता को हम हमेशा ढोते ही रहें।

 

 

 

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