महात्मा बुद्ध को मानो तो सही

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Buddha Purnima

भारत-नेपाल के बीच बढ़ रहा राजनीतिक संघर्ष नदियों के पानी से आगे निकलकर अब धार्मिक बयानबाजी तक पहुंच गया है। विगत दिवस भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के कार्यक्रम में भारत के विदेश मंत्री जयशंकर यह कह बैठे कि महात्मा बुद्ध महान भारतीय हुए हैं, बस इतना कहने के बाद ही नेपाल का पारा चढ़ गया कि भारत ने बुद्ध को भारतीय कहा तो कहा कैसे। उन्होंने कहा कि बुद्ध का जन्म तो नेपाल के लुम्बिनी में हुआ है। नेपाल ने यह तर्क भी दिया कि भारत के महान सम्राट अशोक द्वारा लुम्बिनी में लगाई गई लाठ (पत्थर का खंभा) भी इस बात का प्रमाण है। भारत के विदेश मंत्रालय ने मौका संभालते हुए सफाई दी कि नेपाल ही महात्मा बुद्ध की जन्म भूमि है।

खैर, यह विवाद तो निपट गया और इस बात की खुशी भी है कि भारत और चीन दोनों देशों ने अहिंसा के प्रचारक और शान्ति दूत महान शख्सियत महात्मा बुद्ध पर गर्व किया है लेकिन दुख की बात है कि दोनों देश ही जिस बुद्ध की प्रशंसा करते नहीं थकते उसी बुद्ध की शिक्षा पर चलने की हिम्मत नहीं कर सके। हमारा देश भी कहता है कि हमने युद्ध नहीं दुनिया को बुद्ध दिया है लेकिन बुद्ध जिसका पहला नियम ही यह था कि जीव हत्या कभी नहीं करनी चाहिए, कोई भी देश उनके इस नियम को नहीं मान रहा। हमारे देश में पशुवधशालाओं की कोई कमी नहीं। सरकार की मंजूरी से हर साल लाखों पशु काटे जाते हैं। हालांकि 20 राज्यों ने गऊ हत्या पर जरूर पाबंदी लगाई है लेकिन अन्य पशुओं को बेरहमी से काटा जा रहा है, जो प्राकृति और मानवीय जीवन के नियमों के विपरीत है।

यही हाल नेपाल का है, जहां गढ़ीमाई मंदिर नजदीक मेला ही पशुओं की बलि के लिए लगाया जाता है, पांच सालों में कई बार लगने वाले इस मेले में तीस हजार के लगभग पशु काटे जाते हैं और अंधविश्वास के कारण उन्हें पुण्य का कार्य बताया जाता है। भारत और नेपाल दोनों देशों में हिंदू धर्म के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं और हिंदू धर्म कभी भी कुर्बानी (जीवहत्या) की अनुमति नहीं देता। मांस खाना और जीव हत्या मानव के दिल में बेरहमी, रोष, अहंकार और कई अन्य बुराईआं पैदा करता है। मानव शाकाहारी है और बहुत सी बीमारियां मासांहार के कारण ही फैल रही हैं।

कोरोना वायरस इसकी ताजा मिसाल है, यूं भी देखा जाए प्राचीन काल से पशु मनुष्य का साथी और मददगार रहा है जिसने दूध, ऊन के अलावा मानव की कई आवश्यकताओं को पूरा किया है। प्राचीन समय में केवल हमलावर और आदमखोर जानवर को आत्मरक्षा के लिए ही मारा जाता था। भैंस, भेड़, बकरी से समाज को कोई खतरा नहीं। नेपाल और भारत दोनों देश यदि महात्मा बुद्ध पर गर्व करते हैं तब दोनों देशों को ही जीव हत्या पर पाबंदी लगाने की पहल करनी चाहिए।

 

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