सम्पादकीय

पराली न जलाने को जागरूक बनें किसान

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धान की कटाई के बाद किसानों द्वारा पराली जलाने के कारण हवा में बेहद प्रदूषण फैल रहा है, जो चिंता का विषय बन चुका है। इसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है। इसका ज्यादा असर जहां पराली जलाई जाती है, वहां के गांवों और वहां के बच्चों तथा अन्य लोगों पर देखा जाता है। हरियाणा-पंजाब की सरकारों ने पराली न जलाने की अपीलें की हुई है, साथ ही पराली जलाने वाले किसानों पर कानूनी कार्रवाई तक करने के आदेश हैं, बावूजद इसके किसान मानने को तैयार नहीं हैं।

लेकिन किसानों को यह बात समझ में नहीं आ रही कि इसके भविष्य में परिणाम बेहद खतरनाक साबित हो सकते हैं। आमतौर पर प्रदूषण का स्तर सौ से ऊपर नहीं जाना चाहिए, परन्तु पराली जलाने के दिनों में यह बढ़कर सवा तीन सौ से ऊपर चला जाता है। आज के वैज्ञानिक युग में जबकि मशीनों ने कृषि के धंधे को बड़ी सीमा तक आगे बढ़ाया है, उस समय ऐसी बड़ी समस्या को हल करने के लिए रास्ते निकालने मुश्किल तो हो सकते हैं, परन्तु असम्भव नहीं हैं।

नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सरकारों को इस संबंधी कड़े निर्देश दिये थे। वर्ष 2015 में उसने पंजाब सरकार को इसलिए कटघरे में भी खड़ा किया था और यह भी कहा था कि पराली को संभालने के लिए कोई ठोस और प्रभावशाली प्रबंध किये जाएं। इसलिए किसानों को पर्याप्त मशीनें मुहैया करवाई जाएं, ताकि वह पराली को जलाने का कार्य न करें।

परन्तु सरकार ने उस समय इतना बड़ा खर्च करने से अपनी असमर्थता जाहिर कर दी थी। परंतु प्रत्येक वर्ष भारी मात्रा में पराली जलाई जाती है, जिससे स्थिति और भी गम्भीर हो जाती है। कृषि यूनिवर्सिटी अपने तौर पर अपने सीमित साधनों से किसानों को पराली न जलाने के लिए जागृत करने की कोशिश कर रही है, परन्तु इसका किसानों पर ज्यादा असर नहीं हो रहा।

इसलिए किसान जो उपयुक्त मशीनरी चाहते हैं, वह उनको मुहैय्या नहीं करवाई जा रही। जहां तक पराली का संबंध है, यदि इसका अच्छा उपयोग किया जाए तो इससे बहुत सारे लाभ हासिल किये जा सकते हैं।

इससे कार्ड-बोर्ड और कागज व गत्ता भी बनाये जा सकते हैं। इससे गैस तैयार की जा सकती है और पर्याप्त बिजली भी पैदा की जा सकती है, परन्तु यह सब कुछ करने के लिए बड़ी धनराशि के साथ-साथ बड़े प्रयासों की भी जरूरत होगी और इसके लिए अच्छी योजनाबंदी की भी जरूरत है।

हम यह बात विश्वास से कह सकते हैं कि यदि सरकार इस गम्भीर मामले के बारे में प्रतिबद्ध होती तो अब तक इसके कई तरह के हल निकाले जा सकते थे। परन्तु ऐसा कर सकने से वह असमर्थ रही है। इस संबंधी किसान भी लापरवाह रहा है, उसने भी अपने तौर पर पराली को संभालने का कोई प्रयास नहीं किया, जिस कारण अब सारा खेल बिगड़ गया नजर आ रहा है।

परन्तु कोई नकारात्मक अमल जब सीमा से बढ़ जाता है, उस समय स्थिति को सुधारने के लिए कोई न कोई बड़ा कदम उठाया जाना आवश्यक हो जाता है। अत: यदि इसके प्रति लापरवाही और सुस्त कार्रवाई ही रही, तो आगामी समय में पर्यावरण प्रदूषण का खतरा और अधिक बढ़ना तय है।

 

 

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