बुरी स्वास्थ्य सुविधाएं

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Bad-Health-Facilities
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एक तरफ केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय व राज्य सरकारें कोरोना वायरस के साथ निपटने के लिए पूरे प्रबंधों का दावा कर रही हैं वहीं दूसरी तरफ पंजाब के फगवाड़ा के सिविल अस्पताल के ब्लड बैंक में मरीजों को गलत ग्रुप व एचआईवी पीड़ित रक्त चढ़ाने का मामला सामने आया है। अस्पताल की ये लापरवाही कितनी घातक हो सिद्ध हो सकती है इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं, यह सीधा मरीजों की जिंदगी के साथ जुड़ा सवाल है। चिंता वाली बात यह है कि देश में मेडीकल सेवाओं का ढ़ांचा ही अभी तक इस कार्य में सक्षम नहीं हो पाया कि पीड़ित मरीज को सुरक्षित व सही ग्रुप का रक्त मुहैया करवाया जाए।

कभी देश में रक्तदान की कमी रहती थी, जिसे समाज सेवी संस्थाओं ने दूर करने में अहम योगदान दिया है। लेकिन अस्पतालों में जमा किए गए रक्त का सही प्रयोग ही ना हो पाना सरकार व स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों की नाकामी का ही परिणाम है। वैसे स्वास्थ्य मंत्रियों द्वारा अस्प्तालों में छापेमारी की खबरें प्रतिदिन ही आती रहती हैं। अस्पतालों में ईलाज में लापरवाहियों के जारी रहने से छापेमारी पर भी सवाल उठने स्वाभाविक है।

दरअसल सेवाओं में ऊपर से लेकर नीचे तक चूक न होना बहुत ही आवश्यक है। केवल छापेमारी ही समस्या का हल नहीं बल्कि उच्च अधिकारियों का निम्न स्तरीय अधिकारियों के कामकाज को दुरूस्त बनाना आवश्यक है। दरअसल सरकारी अस्पताल केवल गरीबों के अस्पताल बनकर रह गए हैं। इन अस्पतालों की कमियां तब ही सामने आती हैं जब कोई बड़ी घटना घटित हो जाए। ईमानदार व मेहनती कर्मचारियों को कोई शाबाशी नहीं दी जाती व सही तरीके से काम न करने वाले अधिकारी/कर्मचारी अपनी लापरवाही हमेशा जारी रखते हैं। अगर अस्पतालों के कामकाज की समय पर जांच होती रहे तब लापरवाही रोकी जा सकती है। जब किसी एक घटना के घटने पर कोई सबक नहीं लिया जाता या कुछ दिनों बाद ही घटना को भुला दिया जाता है तब फिर कोई न कोई नयी घटना घटित हो जाती है।

सरकारी भाषा में ‘जांच’ एक ऐसा शब्द है जो मामले को लम्बे समय तक लटकाकर लापरवाही करने वालो को ‘सुरक्षा कवच’ प्रदान करता है। सख्त सजाएं देंगे, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे जैसे शब्द घिस-पिट चुके हैं। महज सजाएं देना ही मामले का हल नहीं बल्कि सिस्टम में सुधार व माहौल बनाने की भी बड़ी आश्यकता है। कर्मचारियों-अधिकारियों में काम के प्रति जिम्मेवारी, लगन व सेवा भावना होनी चाहिए। जब डॉक्टर या मेडीकल अधिकारी यह समझेंगे कि उसकी छोटी सी लापरवाही या बुरे व्यवहार से किसी मरीज की जान जा सकती है और सही तरीके से काम करने पर किसी की जिंदगी बचा सकती है, तब यह सोच कभी भी गलती करने का मौका ही नहीं देगी। इससे सेवाएं बेहतर बनेंगी व राष्ट का विकास होगा।

 

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