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    अफगानिस्तान में अल्पसंख्यकों पर हमले

    Attacks on minorities in Afghanistan
    गत दिवस काबुल के एक गुरुद्वारा में हुए आतंकी हमले में 25 श्रद्धालुओं की मौत होना, एक निंदनीय व दुखद घटना है। इस देश में अल्पसंख्यकों पर हुए अब तक का सबसे बड़ा हमला है। आतंकी संगठन आईएसआईएस ने जिस प्रकार हमले की जिम्मेवारी ली है, उससे आतंकियों के भविष्य के मंसूबों का अंदाजा लगाया जा सकता है। इससे पहले भी 2018 में इसी आतंकी संगठन ने हिंदू-सिखों के एक कार्यक्रम पर हमला किया था, जिसमें 17 लोगों की मौत हो गई थी। हमले में देश के एक बड़े सिख नेता की भी मौत हो गई थी। ताजा हमले से यह स्पष्ट हो गया है कि आईएसआईएस धर्म के आधार पर अल्पसंख्यकों को निशाना बना रहा है।
    दरअसल अफगानिस्तान के हिन्दू व सिख लोगों के बुरे दिन 1992 के गृहयुद्ध से ही शुरू हो गए थे। गृहयुद्ध में तब कई गुरुद्वारों को भी निशाना बनाया गया व हिन्दू-सिख दहशत के कारण देश को छोड़ गए थे। 1980 से पहले सिख लोगों की गिनती लगभग 50 हजार थी, जो घटकर तीन हजार के करीब रह गई। हजारों लोग इंग्लैंड व अन्य देशों में जाकर बस गए। कुछ लोग भारत में आकर रहने लगे। चिंता वाली बात यह है कि अफगानिस्तान सरकार व अन्य पार्टियां जनता की सुरक्षा करने में नाकाम रही हैं। राजनीतिक पार्टियां सत्ता के नशे में चूर है, जिसका नतीजा पिछले दिनों देखने को मिला जब चुनावों में जीतने वाले अशरफ गनी व हारने वाले नेता अब्दुल्ला एक ही समय में राष्ट्रपति पद की शपथ भी ग्रहण कर गए। दोनों ने अलग-अलग भाषण भी दिए। ऐसे नेताओं से देश में अमन-शांति की उम्मीद करना मुश्किल है।लंबे समय तक अमेरिकी सेना व वित्तीय सहायता पर निर्भर रहने के कारण इन नेताओं के पास हालातों को नियंत्रण करने की न तो योग्यता है और न ही क्षमता है।
    अफगानिस्तान के हिन्दू व सिखों सहित सभी लोगों के लिए यह बुरा वक्त है, क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तालिबान के साथ शांति समझौता करने के बाद अमेरिकी सेना की वापिसी का निर्णय भी स्थित को और बिगाड़ सकता है। लंबे समय तक आतंकी दहशत में गुजार चुके हिन्दू-सिखों ने अफगानिस्तान को दिल से प्यार किया है। कई लोगों ने परिवार के 15-15 सदस्य गंवा देने के बावजूद भी देश को न छोड़ने का निर्णय लिया था, लेकिन अब हालात पहले वाले नहीं रहे, जो अब बदल चुके हैं। भारत सरकार व सिख संगठन एक सीमा में रहकर ही अफगानिस्तान सरकार पर दबाव बना सकते हैं, इसीलिए अब यह हिन्दू-सिख समुदाय के लोगों पर भी निर्भर करता है कि वे इन हालातों में क्या निर्णय लेते है? यूं भी भारत सरकार ने नागरिक संशोधन कानून के तहत अफगानी हिन्दू सिखों को नागरिकता देने का निर्णय लिया है। यदि अफगानिस्तान सरकार इतनी बड़ी घटना के बाद भी कोई सीख नहीं लेती तब इन हिन्दू-सिखों का भारतीय नागरिकता लेने के सिवाय कोई चारा नहीं है व न ही इससे बड़ा कोई सहारा है।

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