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लोकतंत्र के यज्ञ में एक आहुति मेरी भी

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पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों का अंतिम चरण

पिछले करीब दो माह से चल रहे पांच राज्यों की विधानसभा चुनावों का अंतिम चरण आ गया है ( assembly elections of five states) । अंतिम चरण में राजस्थान व तेलंगाना में 7 दिसंबर को मतदान होने जा रहा है। इससे पहले छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और मिजोरम में मतदान हो चुका है। सभी पांचों राज्यों मं मतगणना 11 दिसंबर को एक साथ होगी। राजस्थान विधानसभा के लिए 200 विधायकों को चुनने का मतदान पर्व आ गया है। हांलाकि एक प्रत्याषी के निधन के कारण अब 199 सीटों के लिए ही 7 दिसंबर को मतदान होगा। चुनाव आयोग ने चुनाव की आवश्यक सभी तैयारियां करते हुए निष्पक्ष व निर्भिक होकर मतदान का अवसर उपलब्ध कराया है। इस बीच एक बड़ा बदलाव नए मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा द्वारा दो दिसंबर को कार्यभार संभालना और निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव की प्रतिवद्धता जाहिर की है।

आज प्रदेश में करीब 4 करोड़ 72 लाख मतदाता हैं।

युवावर्ग देश का नया भाग्य विधाता बन रहा है। आज प्रदेश में करीब 4 करोड़ 72 लाख मतदाता हैं। इनमें भी युवाओं की संख्या ढ़ाई करोड़ के आसपास है। देश के अन्य हिस्सों से प्राप्त मतदान प्रतिशत के आंकड़ों से साफ होता जा रहा है कि अब इन युवा मतदाताओं का योगदान अधिक है। यह भी सही है कि बदलाव की इस बयार का श्रेय भी युवाओं को ही जा रहा है। युवा मतदाताओं के कारण ही मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी हो रही है। युवा और महिलाएं मतदान के लिए आगे आ रही है। दूसरी और तथाकथित वुद्धिजीवी वर्ग मतदान के इस पर्व पर शब्दों की जुगाली तक ही सीमित होता जा रहा है।

जो वोट नहीं देते उन्हें सरकार से कुछ सवाल पूछने या सरकार को दोष देने का हक भी नहीं है।

आखिर ऐसा क्यों होता जा रहा है? क्या वौद्धिक वर्ग सोशियल मीडिया पर कमेंट चस्पा करने, दूसरों की कमियां गिनाने, और जब स्वयं को मतदान करना है तो दूर बैठे खेल देखने में ही विश्वास क्यों रखता है? क्या इस वुद्धिजीवी वर्ग का मतदान करने का दायित्व नहीं है। यह इस कारण से कहा जा रहा है कि एलिट क्लास के मतदान केन्द्रों पर ही मतदान का प्रतिशत कम देखने को मिलता रहा है। यहां देश के सर्वोच्चय न्यायालय की यह टिप्पणी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है कि जो वोट नहीं देते उन्हें सरकार से कुछ सवाल पूछने या सरकार को दोष देने का हक भी नहीं है। यह वास्तव में लोकतंत्र का मजाक उड़ाने वालों के गाल पर बड़ा तमाचा है। जब सरकार चुनने का अवसर आता है तो तथाकथित बुद्धिजीवी टीका टिप्पणियों मे तो आगे रहते हैं पर मतदान केन्द्र तक जाकर मताधिकार के उपयोग से दूर रहते हैं।

मतदान का प्रतिशत कम से कम 90 प्रतिशत तो होना ही चाहिए

दुनिया को सबसे बड़े लोकतंत्र का दावा करते हैं तो फिर मतदान का प्रतिशत कम से कम 90 प्रतिशत तो होना ही चाहिए। 90 प्रतिशत भी क्यों सभी मतदाताओं को अपने मताधिकार का प्रयोग करने आगे आना चाहिए। यह कोई बौद्धिक खेल का मैदान नहीं है कि हम केवल शब्दों की जुगाली में तो आगे रहे पर मतदान के लिए मतदान केन्द्र तक नहीं पंहुचे। दरअसल जो अपने आपको तथाकथित बुद्धिजीवी कहते हैं, बहसों में लंबे-लंबे वक्तव्य देते हैं, एलिट वर्ग के कहलाने में गर्वित महसूस करते हुए उन्हीं का मतदान के प्रति सबसे कम रुझान होता है। मतदान के आंकड़े इसी ओर इशारा करते हैं। पॉश कॉलोनियों का मतदान का स्तर सबसे कम होता है। जबकि सेमिनारों, गोष्ठियों और चर्चा में यही वर्ग आगे आकर वोट नहीं का अधिकार, चुनाव प्रक्रिया में सुधार, चुनाव प्रक्रिया में कमियों और ना जाने क्या क्या गिनाने में आगे रहता है।

जनीतिक दलों के चुनाव प्रचार का दौर लगभग अंतिम चरण में पहुंच गया है।

वेबसाइट पर सारी जानकारी उपलब्ध कराने के बावजूद वोटर लिस्ट में नाम नहीं होने या अन्य इसी तरह के आरोप लगाना बेमानी हो जाता है। निर्वाचन विभाग के जागरुकता प्रयासों की जितनी सराहना की जाए उसे कम ही कहा जाएगा। राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार का दौर लगभग अंतिम चरण में पहुंच गया है। प्रत्याशियों की तस्वीर सामने आ चुकी है। प्रमुख दलों के घोषणा पत्र सामने आ चुके हैं। अपने सही व्यक्ति को चुनने का समय आपके सामने आ गया है। चुनाव आयोग द्वारा आसानी से मतदान की सभी व्यवस्थाएं चाकचोबंद कर दी गई हैं। आओ संकल्प करे, घर से बाहर निकलें केवल दस मिनट का समय निकालें, 7 दिसंबर को बीच मतदान केन्द्र पर जाकर अपने दायित्व का निर्वहन करें, मतदान करें, दूसरों को मतदान के लिए प्रेरित करें। लोकतंत्र के महापर्व में अपना मतदान कर आहुति प्रदान करें। यह हमारा दायित्व है, कर्तव्य है और देश के नागरिक होने का फर्ज है कि हम मतदान अवश्य करे।

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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