अकाली दल का अजीब निर्णय

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Strange-Decision
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शिरोमणी अकाली दल ने राष्ट्रीय नागरिकता संशोधन कानून में मुस्लमानों को शामिल न करने के विरोध में दिल्ली विधान सभा चुनाव न लड़ने का निर्णय लिया, जो अजीबो-गरीब निर्णय है। भले ही अकाली दल इसके पीछे पार्टी के सिद्धांतों का दावा करता है लेकिन राजनीतिक नफे-नुक्सान में सिद्धांतों की बात हजम होना मुश्किल है। देश के गृहमंत्री व भाजपा नेता अमित शाह बार-बार कह चुके हैं कि वह सीएए से पीछे हटने वाले नहीं। अकाली दल के निर्णय के बाद उन्होंने लखनऊ रैली में फिर दोहराया,‘मैं डंके की चोट पर कह रहा हूँ कि सीएए वापिस नहीं होगा।’

अमित शाह के इस बयान के बाद अकाली दल का अगला कदम क्या होगा इसको लेकर अकाली दल चुप है। हैरानी वाली बात यह है कि सीएए पर सहमति न होने के बावजूद अकाली-भाजपा केंद्र सरकार की हिस्सेदार भी हैं, यहीं नहीं पंजाब में भी अकाली दल-भाजपा का गठबंधन बरकरार है। संसद में भी सीएए बिल पास होने के दौरान अकाली दल ने समर्थन किया था। वास्तव में अकाली दल ने भी बिहार में जनता दल (यू) की तरह चाल चली है। सीएए के साथ असहमत जनता दल राज्य में भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहा है और दिल्ली में भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहा है। जहां तक पंजाब में अकाली दल की भाजपा को लेकर रणनीति का सवाल है, अकाली दल भाजपा को दिल्ली के माध्यम से कड़ा संकेत दे गया है। दिल्ली चुनाव अकाली दल के लिए कोई प्रतिष्ठा का सवाल भी नहीं हैं।

अकाली दल का आधार पंजाब में ही है जहां पार्टी तीन बार भाजपा के सहयोग के साथ सरकार बना चुकी है। यहां भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद अकाली दल का सरकार में दबदबा रहा है। पिछले दिनों पंजाब के कुछ वरिष्ठ भाजपा नेताओं ने 2022 की विधान सभा चुनाव में भाजपा की सीटों का हिस्सा बढ़ाने के बयान दिए थे। अकाली दल के पास दिल्ली चुनाव से बड़ा कोई मौका नहीं था जब उसने सीएए के नाम पर भाजपा को दिखा दिया कि भविष्य में अकाली दल भाजपा के प्रति सख्त रवैया भी अपना सकता है। इस पैंतरे से अकाली दल पंजाब में सीएए का खुला समर्थन करने से भी पीछे हट गया है और ज्यादा हिस्सा लेने का सुर पकड़े हुए पंजाब भाजपा को भी संकेत दे दिया। यूं भी अब राजनीति में सिद्धांतों के प्रति स्पष्टता कम व सत्ता के लिए पैंतरेबाजी ज्यादा है। अकाली दल केंद्र में मंत्री पद भी नहीं छोड़ना चाहता और सीएए के विरोध का राग भी अलाप रहा है। यह कहना उचित होगा कि राजनीति में सिद्धांतों की पालना की अपेक्षा सिद्धांतों का शोर ज्यादा है।

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