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बच्चों की सेहत के लिए जानलेवा है वायु प्रदूषण

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वायु प्रदूषण पर वैश्विक संगठनों की चेतावनियों का भारत पर कोई असर नहीं पड़ा है। वायु प्रदूषण का खतरा बच्चे से बुजुर्गों तक सामान रूप से मंडरा रहा है। भारत सहित विश्व के अनेक देश इसकी चपेट में है। वायु प्रदूषण से सबसे ज्यादा बच्चों की सेहत को नुकसान पहुंच रहा है। जहरीली हवा ने नौनिहालों को अपना शिकार बनाकर मौत के मुँह में धकेला है जो बेहद चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की वायु प्रदूषण और बच्चों पर जारी नई रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 15 साल से कम उम्र के 93 प्रतिशत बच्चे प्रदूषित हवा में साँस लेने को मजबूर है जिससे उनके स्वास्थ्य और विकास पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यूनिसेफ की एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि वायु प्रदूषण बच्चों के दिमाग को हमेशा के लिए नुकसान पहुंचा सकता है। दिल्ली-एनसीआर समेत देश के अधिकांश शहर गंभीर रूप से प्रदूषण से जूझ रहे हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2016 में वायु प्रदूषण से होने वाली श्वसन संबंधी बीमारियों की वजह से दुनियाभर में 5 साल से कम उम्र के 5.4 लाख बच्चों की मौत हुई है। 5 साल से कम उम्र के 10 बच्चों की मौत में से 1 बच्चे की मौत का कारण प्रदूषित हवा है। वायु प्रदूषण फेफड़ों और श्वसन प्रणाली और दिल की सेहत को बहुत अधिक प्रभावित कर रहा है । बच्चों को वायु प्रदूषण का खतरा सबसे ज्यादा है क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम और फेफड़े पूरी तरह से विकसित नहीं होते। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में 2016 में पांच साल से कम उम्र के 60,987 बच्चों को जहरीली हवा की वजह से जान गंवानी पड़ी है। यह दुनिया में सबसे ज्यादा है।

रिपोर्ट के मुताबिक इस आयु वर्ग में मारे गए बच्चों में लड़कियों की संख्या लड़कों से अधिक है. भारत में 2016 में 32,889 लड़कियों की मौत इसी कारण से हुई है। वहीं, पांच से 14 साल के 4,360 बच्चों को वायु प्रदूषण के कारण जान गंवानी पड़ी है। सभी उम्र के बच्चों को मिलाकर देखें तो वायु प्रदूषण से करीब एक लाख दस हजार बच्चों की मौत हो गई है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अब करीब 20 लाख लोगों की मौत प्रदूषण की वजह से हुई है जो पूरी दुनिया में इस कारण से हुई मौतों का 25 प्रतिशत है। वयस्कों की तुलना में बच्चे वायु प्रदूषण के आसानी से शिकार बन रहे हैं। वे अपने विकासशील फेफड़ों और इम्यून सिस्टम के चलते हवा में मौजूद विषैले तत्वों को सांस से अपने अंदर ले रहे हैं और अधिक जोखिम का शिकार बन रहे हैं। कुछ बच्चे दूसरों की तुलना में अधिक संवेदनशील होते हैं और ऐसे में वे अधिक जोखिम में हैं।

स्वीडन की ऊमेआ यूनिवर्सिटी की नई रिसर्च कहती है कि वायु प्रदूषण से इंसानी जीवन का बहुत बड़ा खतरा है क्योंकि इसका सीधा घातक असर दिमाग पर होता है, इसकी चपेट में बच्चे और किशोर सीधे आते हैं जो कि बच्चों के दिमाग पर बुरा असर डालता है और इस कारण कभी-कभी बच्चे मानसिक रोगों के शिकार भी हो जाते हैं। ग्रीनपीस ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि भारत के 4.70 करोड़ बच्चे ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां हवा में पीएम10 का स्तर मानक से अधिक है । इसमें अधिकतर बच्चे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली के हैं। इस 4.70 करोड़ के आंकड़ें में, 1.70 करोड़ वे बच्चे हैं जो कि मानक से दोगुने पीएम10 स्तर वाले क्षेत्र में निवास करते हैं। वहीं उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली राज्यों में लगभग 1.29 करोड़ बच्चे रह रहे हैं जो पांच साल से कम उम्र के हैं और प्रदूषित हवा की चपेट में हैं।

एक अनुमान है कि हर साल अकेले पंजाब-हरियाणा के खेतों में कुल तीन करोड़ 50 लाख टन पराली जलाई जाती है। एक टन पराली जलाने पर दो किलो सल्फर डाईआॅक्साइड, तीन किलो ठोस कण, 60 किलो कार्बन मोनोआॅक्साइड, 1460 किलो कार्बन डाईआॅक्साइड और करीब 200 किलो राख निकलती हैैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब कई करोड़ टन फसल अवशेष जलते हैैं तो वायुमंडल की कितनी दुर्गति होती होगी। हानिकारक गैसों एवं सूक्ष्म कणों से परेशान दिल्ली वालों के फेफड़ों को कुछ महीने हरियाली से उपजे प्रदूषण से भी जूझना पड़ता है। विडंबना है कि परागण से सांस की बीमारी पर चर्चा कम ही होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार पराग कणों की ताकत उनके प्रोटीन और ग्लाइकॉल प्रोटीन में निहित होती है, जो मनुष्य के बलगम के साथ मिलकर अधिक जहरीले हो जाते हैं। ये प्रोटीन जैसे ही हमारे खून में मिलते हैैं, एक तरह की एलर्जी को जन्म देते हैं।

यह एलर्जी इंसान को गंभीर सांस की बीमारी की तरफ ले जाती है। चूंकि गर्मी में ओजोन परत और मध्यम आकार के धूल कणों का प्रकोप ज्यादा होता है इसलिए पराग कणों के शिकार लोगों के फेफड़े क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। लिहाजा ठंड शुरू होते ही दमा के मरीजों का दम फूलने लगता है।हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है वायु में पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) के स्तर में वृद्धि होना । हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 60 और पीएम10 की मात्रा 100 होने की मात्रा पर इसे सुरक्षित माना जाता है । लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद ही नुकसान दायक माना जाता है ।

बाल मुकुन्द ओझा

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