आखिर कैसे रूकेंगी बलात्कार की घटनाएं!

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हैदराबाद के ‘निर्भया कांड’ को लेकर देश आंदोलित है। इस बार भी ‘निर्भया’ सामूहिक बलात्कार की शिकार हुई और उसे जला कर मार दिया गया। दिल्ली में निर्भया के साथ जो कुछ हुआ था वो सारे देश ने देखा और सुना। बेटियां लगातार दरिंदों की हवस का शिकार हो रही हैं। उन्हें जला कर राख किया जा रहा है, ताकि साक्ष्य ही मिट जाएं। नारियों को पूजने वाले देश में बेटियों के साथ बढ़ती बलात्कार की घटनाएं सारे समाज को सोचने पर मजबूर करती हैं। पिछले एक दशक के आंकड़ों पर गौर करें तो ऐसा लगता है जैसे देश में बलात्कार की बाढ़ आ गई है। हर दूसरी खबर ऐसी ही है। ऐसा क्यों हो रहा है? लड़कियों की रक्षा के लिए पुलिस है, महिला पुलिस है, राष्ट्रीय महिला आयोग से लेकर राज्यों के महिला आयोग हैं, महिलाओं के लिए काम करने वाले संगठन हैं, स्वयंसेवी संगठन हैं, महिला विकास और बाल कल्याण मंत्रालय है, महिलाओं की मदद करने के लिए तरह-तरह के कानून हैं, मगर उनके प्रति अपराध फिर भी नहीं थम रहे हैं। हर बार जब कोई ऐसी घटना होती है, तो कहा जाता है कि कानून लचर है।

कुछ लोग तो यह सलाह भी देते हैं कि बलात्कारियों को चैराहे पर फांसी पर लटकाया जाए। हैदराबाद निर्भया कांड के बाद देश की संसद में भी उबाल है। महिला सांसदों ने भी कड़े कानून की वकालत की है। सपा की राज्यसभा सांसद जया बच्चन ने तो बलात्कारियों को आज बलात्कार के मामले में बेहद कठोर कानून हैं, फिर भी क्या वजह है कि बलात्कार नहीं रूक रहे हैं? बलात्कार स्त्री के प्रति किया गया सबसे घृणास्पद अपराध है।

इसके बीज हमारी उस संस्कृति में छिपे हैं, जहाँ एक तरफ स्त्री को देवी कहा जाता है, मगर दूसरी तरफ उसे हमेशा ही एक सेक्स आॅब्जेक्ट की तरह देखा जाता है और उसे पुरुष के उपभोग और उपयोग की चीज समझा जाता है। क्या हम यह मानें कि बलात्कार बढ़ते ही जा रहे हैं या यह कहें कि आजकल ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग बहुत बढ़ी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में बलात्कार के मामले 2015 की तुलना में 2016 में 12.4 फीसदी बढ़े हैं। 2016 में 38,947 बलात्कार के मामले देश में दर्ज हुए। मध्य प्रदेश इनमें अव्वल है, क्योंकि बलात्कार के सबसे ज्यादा- 4,882 मामले मध्य प्रदेश में दर्ज हुए। इसके बाद दूसरे नंबर पर उत्तर प्रदेश आता है, जहां 4,816 बलात्कार के मामले दर्ज हुए. बलात्कार के 4,189 दर्ज मामलों के साथ महाराष्ट्र तीसरे नंबर पर रहा।

भारत में बलात्कार के मामले में फांसी की आखिरी सजा अब से 15 साल पहले दी गयी थी। मामला पश्चिम बंगाल का था। इस मामले में भी 15 साल तक मुकदमा चला था। कोलकाता में एक 15 वर्षीय स्कूली छात्रा के साथ बलात्कार और उसकी हत्या के मुजरिम धनंजय चटर्जी को 14 अगस्त 2004 को तड़के साढ़े चार बजे फांसी पर लटका दिया गया था। करीब डेढ दशक तक चले मुकदमे और विभिन्न अपीलों और याचिकाओं को ठुकराए जाने के बाद धनंजय को कोलकाता की अलीपुर जेल में फांसी दे दी गई थी। सवाल यह है कि इस तरह के प्रावधान से देश में बलात्कार की घटनाएं थम जाएंगी? क्या विकृत मानसिकता के लोगों में सजा के डर से परिवर्तन आ जाएगा?

एक अच्छी बात यह हुई है कि अब माता-पिता भी लड़की को यह शिक्षा नहीं देते कि वह अब किसी भी अपराध को छिपाए, इसलिए वे अपनी लड़की का साथ देते हैं। आगे बढ़कर पुलिस में शिकायत करते हैं। पहले लड़की की तथाकथित इज्जत जाने के डर से माता-पिता लड़की को चुप रहने और अपने प्रति किए गए अपराध को छिपाने की सलाह देते थे। पहले समाज का नजरिया भी ऐसा था कि लड़की ने अपराध नहीं किया है, फिर भी उसे अपराधी मान लिया जाता था और अपराध करने वाले छुट्टा घूमते थे। दिल्ली के निर्भया कांड के बाद उम्मीद थी कि लड़कियों के प्रति अपराध में कुछ कमी आएगी, कठोर कानून के डर से लोग लड़कियों के प्रति अपराध करने से बचेंगे, मगर ऐसा हुआ नहीं। हर दूसरी खबर ऐसी ही है। ऐसा क्यों हो रहा है? हालांकि अब भी बलात्कार की शिकार हुई कुछ लड़कियां समाज का सामना करने की हिम्मत नहीं जुटा पातीं और आत्महत्या करने की कोशिश करती हैं। उत्तर प्रदेश, राजस्थान और अन्य राज्यों में भी इस तरह की काफी घटनाएं हो चुकी हैं।

पहली जरूरत तो यह है कि शिक्षक, समाजसेवी, मीडिया, और नेता लोगों का नजरिया बदलने की कोशिश करें। यदि किसी लड़की के साथ कोई अत्याचार हो, तो लोग उसे ही दोषी न ठहराने लगें। उसी से सवाल न पूछे जाएं कि वह अकेली क्यों गई थी? किसी लड़के के साथ उसका क्या काम था? लड़कियां यदि सीमा में नहीं रहेंगी तो उनके साथ ऐसे हादसे तो होंगे ही! इन विचारों से तो यही पता चलता है कि लड़कियां चाहे जितनी भी पढ़-लिख जाएं, अपने पैरों पर खड़ी हो जाएं, लोग उनसे ही सवाल पूछेंगे।

लड़कियों को अक्सर नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले उन्हें सताने वालों से आखिर कोई सवाल क्यों नहीं पूछते? अपराधियों का मुकदमा फास्टट्रैक कोर्ट में चलाने की जरूरत है। अपराधियों को उनके अपराध की तत्काल सजा दिये जाने की जरूरत है। अगर किसी बलात्कारी को दंड दिये जाने में वर्षों लगेंगे, तो स्वाभाविक है कि कानून के प्रति लोगों का विश्वास टूटेगा और गुनहगारों के बच निकलने की उम्मीद बनेगी। बेटियां सुरक्षित होंगी तभी देश सही मायनो में विकास के रास्ते पर आगे बढ़ पाएगा।
-राजेश माहेश्वरी

 

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