अफरीदी के बोल उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा

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Afridi's words his political ambition
इन दिनों पाकिस्तान के नामी क्रिकेटर शाहिद अफरीदी की एक वीडियो वायरल हो रही है, जिसमें वह भारत के प्रधानमंत्री पर बेहुदा टिप्पणी कर रहा है। गौतम गंभीर, युवराज सिंह, हरभजन सिंह और शिखर धवन जैसे क्रिकेटरों ने शाहिद अफरीदी के बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है और कहा है कि वो ऐसे शब्द कभी स्वीकार नहीं कर सकते। गौतम गंभीर ने तो ट्वीट के माध्यम से बड़े सख्त शब्दों में जवाब दिया कि पाकिस्तान की सात लाख फौज को 20 करोड़ लोगों का समर्थन, ये कहना है 16 साल के आदमी शाहिद अफरीदी का। फिर भी 70 साल से कश्मीर के लिए भीख मांग रहे हैं। गौतम गंभीर ने अफरीदी, पाकिस्तान के पीएम इमरान खान और सेनाध्यक्ष बाजवा को जोकर तक कह दिया और ये भी कहा कि वे पाकिस्तान की जनता को मूर्ख बना रहे है। वे यही नहीं रूके उन्होंने तो यहां तक बोल दिया कि उन्हें कश्मीर कभी नहीं मिलेगा। उन्हें बांग्लादेश याद रखना चाहिए। यह घटनाक्रम तनावपूर्ण माहौल में दोनों देशों के लिए चिंताजनक है।
लेकिन यह सवाल भी अहम है कि जब कोरोना महामारी के दौर में दोनों देशों के नेता अपने विवादित मामलों पर चुप है तब पाक का एक क्रिकेटर अचानक राजनीतिक बयानबाजी कैसे शुरू कर देता है। दरअसल अफरीदी ने महामारी के दौर में अपनी राजनीति में जगह बनाने की फिराक में छक्का लगाने का प्रयास किया है। आज नहीं तो कल अफरीदी भी किसी न किसी पार्टी में शामिल होकर संसद या विधान सभा की सीढ़ियां चढ़ने की ताक में है। पाकिस्तान में राजनीति में माईलेज पाने का एक आसान सा रास्ता है, भारत का विरोध और विशेष तौर पर कश्मीर का मुद्दा। पाकिस्तान के कट्टर संगठन व आतंकवादी हमेशा उस नेता का समर्थन करते हैं जो भारत के खिलाफ जहर उगलता है। इमरान खान खुद इसका उदाहरण हैं। 22 वर्षों के राजनीतिक संघर्ष के बाद वे देश की हुकूमत पर काबिज हुए। इमरान भी अफरीदी की तरह क्रिकेटर है। क्रिकेट इस वक्त भारत और पाकिस्तान की सबसे बड़ा खेल है।
भारत-पाक का मैच दोनों देशों के दर्शकों में जंग जैसी भावना पैदा करता रहा है इसीलिए जब पाकिस्तान का कोई क्रिकेटर भारत के खिलाफ राजनीतिक बयान देता है तब उसकी चर्चा छिड़ना स्वभाविक है। इमरान खान ने आम चुनाव से पहले कश्मीर के मुद्दे पर खूब राजनीति की और तालिबान संगठनों को भी खुश किया। फिर क्या था तालिबानों ने इमरान को राजनीतिक समर्थन दिया। अफरीदी भी इसी रास्ते पर चलते हुए नजर आ रहा है। भले अफरीदी का राजनीतिक उद्देश्य कभी ना कभी पूरा हो जाए, लेकिन नफरत की जिस सीढ़ी पर चढ़कर वे राजनीतिक पद बनाने का प्रयास कर रहा है, वह दोनों देशों में नफरत को युद्ध में बदल सकती है। अफरीदी की नफरत पाकिस्तान के हित में नहीं है।

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