जातिवाद नामक जहर ने ली फिर से एक जान

A poison called a caste called Lee again

जातिगत माहौल में किसी पार्टी का प्रचंड बहुमत आना इस बात का संकेत है कि जनता ने इस बार वोट जात पात से उठकर किया है जो मजबूत लोकतंत्र की छवि पेश करती है। कई लोगों का मानना है कि देश से जातिगत भेदभाव खत्म हो गए हैं, बढ़ती साक्षरता दर से जाती भेदवाद कम हो रहे हैं या शिक्षित लोग जातिवाद पर विश्वास नही करते हैं। भारत में विद्यमान जातिवाद ने न केवल यहाँ की आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक प्रवृत्तियों को ही प्रभावित किया अपितु राष्ट्र एकता को प्राभवित किया है। जहाँ जातिवाद कई सदियों से अपना पांव जमाये हुए हैं वहां की राष्ट्र एकता में कमी आती ही है साथ में हिंसा को भी जन्म देती है। बीते दिन 22 मई की घटना हमें फिर से जातिवाद ने चीखते चिल्लाते हुए दस्तक दी। एक सिलसिला जो जातीय भेदभाव से जूझ रहे हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला से शुरू हुआ था, वो आज मुंबई के एक अस्पताल की रेजिडेंट डॉक्टर पायल तड़वी की आत्महत्या तक पहुंच गया है। इन दोनों आत्महत्याओं के बीच में कई ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो सीधे तौर पर जातीय भेदभाव, जातीय हिंसा को उजागर करती है।

मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल और टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज की पोस्ट ग्रेजुएशन द्वितीय वर्ष की एक छात्रा डॉक्टर पायल तड़वी ने अपने हॉस्टल के कमरे में आत्महत्या कर ली। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार खुदकुशी की तारीख को दोपहर में पायल ने एक सर्जरी की थी, और उस दौरान उन्हें किसी उलझन में नहीं देखा गया था। जब उनकी दोस्तों ने उन्हें फोन किया तो कोई जवाब नहीं मिला। रात को जब वे लोग उनके कमरे में पहुंचे तो दरवाजा बहुत देर तक नहीं खुला। हड़बड़ी में जब सिक्योरिटी गार्ड को बुला कर दरवाजा तोड़ा गया तो देखा गया कि डॉक्टर पायल ने अपने कमरे के पंखे से लटक कर आत्महत्या कर ली थी।

पायल आदिवासी समुदाय से आती थीं और आरक्षण के तहत उनका इस कॉलेज में दाखिला हुआ था। पायल की मौत के बाद उनके परिवार ने बयान जारी करते हुए कहा कि उनकी बेटी जातीय भेदभाव की शिकार थी। पायल की मां ने बताया है कि पायल की तीन सीनियर डॉक्टर उसे जातिगत मामलों में प्रताड़ित करती थी। तीनों डॉक्टरों ने पायल को लगातार उनकी जाति की वजह से उन्हें प्रताड़ित करने का सिलसिला 2018 से ही शुरू कर दिया था। सोशल मीडिया पर उनके व्हाट्सएप चैट का एक स्क्रीनशॉट फैल गया है, जिसमें साफ तौर पर नजर आ रहा है कि तीनों डॉक्टरों ने किस कदर पायल को लगातार प्रताड़ित किया था, जिसकी वजह से वो आत्महत्या करने की स्थिति तक पहुँच गईं। चैट में उन डॉक्टरों द्वारा पायल से कहा गया है, तुम डिलीवरी मत किया करो, तुम बच्चों को अपवित्र कर देती हो।

इस घटना ने लोगों को ये सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिरकार लोग जाती भेदवाद कितनी भयानक करते हैं कि लोग आत्महत्या तक करने में मजबूर हो जाते हैं।पायल इतनी पढ़ी लिखी थी और वो अब डॉक्टर बनने वाली थी। हालांकि ये बात बिल्कुल सही है कि उन्हें वहां तक पहुँचने में कई जातिगत भेदभाव देखने मिले होंगे लेकिन वो लगातर आगे बढ़ती रही लेकिन उनके सीनियर ने उन्हें इतना ज्यादा प्रताड़ित किया कि वो नही लड़ पाई और आखिरकार उसने मौत को गले लगा लिया।

इस घटना से आदिवासी समाज से आगे बढ़ रही बेटियों के मन में क्या परिवर्तन हुआ होग? क्या वो ये नही सोच रही होगी कि आगे चलकर उनके साथ भी वही होगा जो पायल के साथ हुआ? बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारों ने ये बताया है कि बेटियों को पढ़ाना जरूरी है लेकिन पढ़ने की कोशिश कर रही बेटियों को जातिवाद में घेर कर मार देना ये कहाँ से जायज है? पढ़ाई कर आगे जाने की ललक रखने वाली नीचे तबके की बेटीयों को काफी मेहनत करना होता है तब जाके वो ये मुकाम पाती है लेकिन देश और समाज में फैले जातिवाद उसे बेड़ियों में जकड़ लेती है। क्योंकि ये मामला काफी पढ़े लिखे लोगों से जुड़ा है तो सवाल उठना लाजमी है कि क्या आज भी शिक्षा महज व्यापार का साधन बना हुआ है या फिर जा सी मानवता इसमें जिंदा है?

भारत जैसे देश में आज भी जातिवाद सक्रिय है यह सुनकर बड़ा दुख होता है। देश में कई महापुरुष और समाज सुधारक के रूप में आए जिन्होंने बहुत सारी समाजिक कुरीतियों को जड़ से हटाया और एक आदर्श देश बनाने की कोशिश की पर सारे समाज सुधारकों के सामने जाति व्यवस्था की कुप्रथा सामने आकर रास्ते को रोड़ा बनी और आज भी जाति व्यवस्था ही समाजिक कल्याण में रोड़ा बनकर सामने आ रही है। जातिवाद को सरकार भी खत्म नहीं कर सकती है यह आपस के सोच विचार का विषय है और मानवता का विषय है।

 

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