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    2020: नर्सों और मिडवाइफ का वर्ष

    2020 Year of nurses and midwife
    जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वर्ष 2020 को नर्सो और मिडवाइफ का वर्ष घोषित किया तो इसके 184 सदस्य देशों ने इस बात का अंदाजा नहीं लगाया होगा कि इस वर्ष के दौरान उन पर भारी जिम्मेदारी आने वाली है। अन्य व्यवसायों के साथ साथ नर्सों को अब कोरोना योद्धा कहा जा रहा है और वे भारत तथा विश्व के अन्य देशों में कोविड-19 से निपटने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।
    वर्ष 2020 आधुनिक नर्सिंग की संस्थापक फ्लोरेंस नाइटेंगेल की 200वीं जन्म सदी है। फ्लोरेंस नाइटेंगेल ने तुर्की में क्रीमियाई युद्ध के दौरान ब्रिटेन और मित्र देशों के सैनिकों को निस्वार्थ सेवा शुरू की थी और आज कोरोना महामारी का मुकाबला करने में हम हजारों कोरोना योद्धाओं के प्रति आभारी हैं। नर्सें स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं में सेतु का कार्य करती हैं। किसी भी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। स्वास्थ्य देखभाल में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में उनकी केन्द्रीय भूमिका है। उनके कार्यों में रोग निवारण, निदान, उपचार, देखभाल, पुनर्वास आदि शामिल हैं। वे सभी उम्र के व्यक्तियों, परिवारों, समूहों, समुदायों, रोगी और निरोगी सभी की देखभाल करती हैं।
    वस्तुत: वे डाक्टरों से अधिक रोगियों और लोगों के संपर्क में रहती हैं। लोक स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण में नर्सों और रोगियों के बीच संवाद महत्वपूर्ण होता है। सार्वभौम स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में नर्सें और मिडवाइफ अपरिहार्य हैं। जब वर्ष 2020 को नर्सो का वर्ष घोषित किया गया तो कोविड – 19 दूर दूर तक नहीं था और यह कार्य उनकी सेवाओं को ध्यान में रखकर किया गया था। स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की श्रम शक्ति में नर्सों की संख्या 50 प्रतिशत से अधिक है। भारत में कई ग्रामीण क्षेत्रों में नर्सें एकमात्र स्वास्थ्य सेवा प्रदाता है और भारत में स्वास्थ्य देखभाल श्रम शक्ति में उनकी संख्या 30.5 प्रतिशत है। विश्व स्वास्थ्य संगठन 2016 के आंकडों के अनुसार ओडिशा, नागालैंड और मेघालय में स्वास्थ्य कर्मियों में नर्सों की संख्या 50 प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश में 17.95 प्रतिशत, हरियाणा में 18.6 प्रतिशत और बिहार में 19 प्रतिशत है।
    एक आंकलन के अनुसार भारत में 6 लाख डाक्टरों की कमी है। देश में नर्स और रोगी अनुपात 1:483 है। इसका तात्पर्य है कि देश में 20 लाख नर्सों की कमी है। भारत में नर्सों की संख्या कोरोना प्रभावित चीन और इटली से कम है और अधिकतर नर्सें शहरी क्षेत्रों में कार्यरत हैं जिसके चलते भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र सुविधाओं और मानव संसाधन के संकट का सामना कर रहा है। केरल जैसे प्रगतिशील और कामगार संवेदनशील राज्य में भी नर्सों की संख्या पर्याप्त नहीं है जबकि केरल अन्य राज्यों और अन्य देशों को नर्सिंग श्रम शक्ति उपलब्ध करा रहा है। भारतीय नर्सिंग संघ की स्थापना 2011 में की गयी थी। यह बताता है कि नर्सों के हितों की रक्षा और उनके व्यवसाय स्थिति में सुधार के लिए वे एकजुट नहीं थी। यदि विश्व सार्वभौम स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के सहस्राब्दि लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता है तो संपूर्ण विश्व में 90 लाख नर्सों और मिडवाइफ की कमी को दूर किया जाना चाहिए। साथ ही उनके व्यवसाय को सम्मान दिया जाना चाहिए ताकि स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में सुधार हो, लिंग समानता को बढ़ावा मिले और आर्थिक विकास में तेजी आए।
    कोरोना वायरस और इसके रोगियों की स्थिति अन्य रोगियों से अलग है क्योंकि कोरोना पीडितों के पास उनके परिजन तक भी नहीं जा सकते हैं। इसलिए नर्सों पर अतिरिक्त दायित्व पड जाता है। किंतु नर्स के रूप में उनकी सेवाओं को मान्यता नहीं मिलती है। रोगी और उनके रिश्तेदार उनकी सेवाओं में कमियां निकालते रहते हैं। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा कोरोना की स्थिति में लोगों की देखभाल कर रहे डाक्टरों और नर्सों के लिए ताली बजाकर आभार व्यक्त करना केवल एक प्रतीक नहीं बना रहना चाहिए। सभी देशों में नर्सों में महिलाओं की संख्या अधिक है। ऐतिहासिक दृष्टि से नर्सिंग को महिला व्यवसाय कहा गया है। इसका कारण यह है कि महिलाओं में सेवाभाव अधिक होता है और इसलिए नर्सों की स्थिति और कार्य दशाओं में सुधार लिंग समानता की दिशा में भी एक कदम होगा। अमरीका में एक सुदृढ स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली के बावजूद अमरीकन फेडरेशन ऑफ़ स्टेट काउंटी और म्यूनिसिपल एम्पलाईज के अनुसार इस राष्ट्रीय संकट के समय में लोक स्वास्थ्य कर्मी हमारी देखभाल कर रहे हैं और वे अत्यंत जटिल स्थितियों में कार्य कर रहे हैं। उनके पास न तो महत्वपूर्ण उपकरण हैं न ही उन्हें अल्पकालिक या दीर्घकालिक आर्थिक सहायता उपलब्ध करायी गयी है।
    फेडरेशन के अध्यक्ष के अनुसार इस संकट में कार्यरत स्वास्थ्य देखभालकर्मी और अन्य कर्मचारियों के पास आवश्यक उपकरण नहीं हैं। कुशल नर्सों को भी मास्क तक उपलब्ध नहीं हैं। भारत में भी डाक्टरों के समूह ने उन्हें सुरक्षा किट उपलब्ध कराने की मांग की है क्योंकि अनेक डाक्टरों में इस बीमारी का संक्रमण हो गया है। डाक्टरों और नर्सों को मास्क, दस्ताने तथा हजमत सूट पहनने की सलाह दी गयी है किंतु यह सूट भारत की दशाओं के लिए उपयुक्त नहीं है इसलिए भारत में निर्मित व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण निर्मित किए जाने चाहिए। स्वास्थ्य देखभाल कर्मियों को हमेशा अन्य कर्मियों की तुलना में कम वेतन और अधिक कार्य घंटे की समस्या का सामना करना पडता है। वे अत्यधिक दबाव में कार्य करते हैं और उन्हे हमेशा संक्रमण का भय बना रहता है। घर में उन्हें अन्य लोगों से अलग रहना पडता है। वे हमेशा भौतिक और मानसिक दबाव में रहते हैं। वस्तुत: सभी स्वास्थ्य देखभालकर्मी युद्ध के समय में सैनिकों की तरह कार्य कर रहे हैं।
    कोरोना रोगियों की देखभाल कर रहे डाक्टरों और नर्सों के सामाजिक बहिष्कार और मकान मालिकों द्वारा उनसे मकान खाली कराने के मामले भी सामने आए हैं और इसका एक कारण इन कोरोना योद्धाओं के पास पर्याप्त सुरक्षा उपकरण न होना भी है। भारत सरकार ने कोरोना का मुकाबला कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों के लिए 50 लाख रूपए के स्वास्थ्य बीमा की घोषणा की है। इसमें सफाई कर्मी, डाक्टर, आशा कार्यकर्ता, अर्ध चिकित्साकर्मी और नर्सें शामिल हैं। हमारा राष्ट्र इस अदृश्य दुश्मन का सामना कर रहे इन योद्धाओं का ऋणी है। देश की जनता को एकजुट होकर उनकी रक्षा करनी चाहिए और उन्हें पुरस्कृत करना चाहिए।

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