तीन ताकत एक मौज (हम थे, हम हैं, हम ही रहेंगे)

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Shah-Satnam-Singh-Ji-Mahara

सर सूखे पंछी उड़े, औरन देस सिधाए, दीन मीन बिन पंख के, कहु ‘रहीम’ कहँ जाहिं?

रहीम जी कहते हैं जब ग्रीष्म ऋतु में गर्मी के कारण सरोवर सूखने लगते हैं, तो आस पास रहने वाले सभी जीव उस स्थान से पलायन कर जाते हैं लेकिन मीन कहां जाए ? रहीम जी कहते हैं कि सभी जीवों के लिए जल एक मात्र आवश्यकता है। यदि कुछ समय के लिए न भी मिले, तो वे जीवित रह सकते हैं, परन्तु मछली के तो जीवन का आधार ही जल है।

जल नहीं तो मीन नहीं! कुछ ऐसा ही नाता है डेरा सच्चा सौदा के 6 करोड़ अनुयायियों का अपने ‘गुरु ’ से। जो किसी भी परिस्थित में अपने पूर्ण सतगुरु से विलग होकर रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते। ये करोड़ों शिष्य आज अपने गुरु ‘पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज का 102वां पावन अवतार दिवस’ पूरे विश्व में मना रहे हैं। सर्वधर्म संगम डेरा सच्चा सौदा संस्था स्थापित कर पूज्य सतगुरु जी ने रूहों को मालिक से मिलवाने का बीड़ा उठाया तथा इंसानियत का संदेश जन-जन तक पहुंचाया। आज भी पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के रूप में परम पिता शाह सतनाम जी महाराज व बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज स्वयं कार्य कर रहे हैं।

नरेंद्र इन्सां ने कर दिया गुर्दादान

सरसा दरबार में पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज से नामदान लेने के बाद सहीं अर्थों में जीने का अर्थ समझ आया। एक दिन मुझे जब पता चला कि हिमाचल प्रदेश के जिला धर्मशाला निवासी केके शर्मा को गुर्दे की आवश्यकता है तो पूज्य सतगुरु जी की पावन शिक्षा पर चलते हुए मैंने पलभर में गुर्दादान करने का फैसला कर लिया और 28 अप्रैल 2017 को  गुर्दादान कर उनकी जान बचाई। आॅप्रेशन सफल होने के बाद उन्होंने ने मुझे बहुत दुआएं दी। लेकिन मैं अपने पूर्ण सतगुरु का आभार जता रहा था जिनकी बदौलत मैं इंसानियत के काम आ सका।
नरेंद्र चहल (जन्मतिथि 21-12-1976), पिहोवा, कुरुक्षेत्र।

बुराइयों से मिला छुटकारा

शराब पीकर गाली देना, बुरे काम करना, अपनी जीभा के स्वाद के लिए मांस-अंडा खाना, ये सब मेरी आदत बन चुके थे। चारों तरफ फैली बुराई व गंदी संगति से मैं शायद ही निकल पाता। लेकिन मैं आज शुक्रगुजार हूँ उस परमात्मा का, जिसने परम पिता जी को अपना रूप बनाकर इस कलयुग में भेजा। सन् 1988 में जब पूर्ण मुर्शिद के दर्शन किए तो सब बुराइयों से मेरा छुटकारा हो गया। नामदान लेने के बाद जिन्दगी ऐसी बदली कि मानों यहीं स्वर्ग हो।
रमेश चंद चावला, पानीपत।

नूरी स्वरूप व सत्संग से हुआ प्रभावित, फिर कभी नहीं लगाया शराब को हाथ

1985 में बरनावा आश्रम में पूज्य परम पिता शाह सतनाम जी महाराज से नामदान की अनमोल दात प्राप्त हुई। इससे पहले मैं नशा करता था। दिन हो या रात शराब पीना और पिलाना मेरा शौक था। मुझे समझ नहीं आ रहा था मैं शराब को पीता हूँ कि शराब धीरे-धीरे मुझे पी रही है। छोड़ने की कोशिश भी की लेकिन सबकुछ नाकाम था। परम पिता जी के बारे काफी सुना था कि जो भी उनका सत्संग सुनता है वो नशा छोड़ देता है। मैं भी बरनावा आश्रम में सत्संग सुनने गया और नामदान भी लिया। मैं पूज्य परम पिता जी के नूरी स्वरूप व सत्संग से इतना प्रभावित हुआ कि फिर कभी शराब को हाथ तक नहीं लगाया। मैंने अपने परिवार, गांव वालों व रिश्तेदारों को भी डेरा सच्चा सौदा से जोड़ा और गुरुमंत्र दिलाया।
देशराज (आयु 85) पुत्र रूमाल सिंह,
मुजफरपुर, गांव कमाला(यूपी)।

ऐसा चढ़ा नाम का रंग, पति ने छोड़ दिया नशा

सन् 1985 में मैंने शाह मस्ताना जी धाम में पूज्य परम पिता जी से नामदान लिया था। जब नामदान लिया तब पूज्य परम पिता जी हमारे बिल्कुल पास ही बैठे थे। जिस घर में मेरी शादी हुई वो बिल्कुल नर्क था। सभी शराब पीते थे, मांस-अंडा खाते थे। मेरा पति हरि सिंह शराब में अकसर डूबा रहता था। शराब पीने के कारण वो बीमार रहने लगे। मैं किसी तरह करके उन्हें डेरा सच्चा सौदा आश्रम में लेकर आई जहां पूज्य परम पिता जी से गुरुमंत्र दिलाया। जिसके बाद उनपर सत्संग व सेवा का रंग ऐसा चढ़ा की आज मेरा पूरा परिवार, तीन पुत्र व पुत्रवधू सब डेरा सच्चा सौदा से जुड़कर मानवता भलाई कार्यों में लगे हुए हैं।
कृष्णा देवी (आयु 56 वर्ष), करनाल।

नाम लेने के बाद छोड़ दिया नशा व मांस

मांस और शराब का शैतान मुझ पर इस कदर हावी हो चुका था कि मैं शायद ही इनकेचंगुल से निकल पाता। परिवारिक सदस्य भी चिंतित थे। लेकिन जुलाई-1987 में डेरा सच्चा सौदा सरसा दरबार से नामदान लेने व परम पिता जी के सत्संग में अनमोल वचन सुनने के बाद मेरी जिन्दगी बदल गई। जो असंभव था वो संभव हो गया। नशा छोड़ने के बाद मेरे साथ मेरा परिवार भी स्वर्ग बन गया। आज मैं स्वयं मानवता भलाई कार्यों में बढ़ चढ़कर भाग लेता हूँ और दूसरों को भी रामनाम से जोड़ रहा हूँ।
बलबीर रंगा, पिहोवा (जन्मतिथि 7-7-1956)

प्रेम निशानी के रूप में दी अंगूठी

सन् 1972 की बात है जब पंजाब में सत्संग था। परम पिता जी के सत्संग से प्रभावित होकर मैंने नामदान ले लिया। इससे पहले मैं रामलीला में श्रीराम के किरदार की भूमिका अदा करता था, मुझे शुरू से ही भजन और साज बजाने का बड़ा शौक था। एक बार संत्सग के दौरान पूज्य परम पिता जी ने मुझसे हारमोनियम बजवाई। जिसके बाद पूज्य परम पिता जी बहुत खुश हुए और मुझे प्रेम निशानी के रूप में अंगूठी भेंट की।
हंसराज(जन्मतिथि 3-10-1944), कुरुक्षेत्र।

…आपके जवाब

पूज्य परम पिता जी ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उतर प्रदेश में सन् 1960 से 1991 तक बहुत से संत्सग फरमाए। इस दौरान सत्संगियों ने पूज्य परम पिता जी से अनेक प्रश्न पूछे। जिनका जवाब देकर पूज्य परम पिता जी ने सत्संगियों की जिज्ञासा को शांत किया। जिनमें से कुछ प्रश्न आज सच कहूँ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं।

प्रश्न: कर्म किसे कहते हैं? इसका हमारे ऊपर क्या प्रभाव पड़ता है?
उतर: इंसान मन, वचन या अपनी इंद्रियों से जो भी अच्छे एवं बुरे कार्य करता है वे सभी कर्म कहलाते हैं। यदि हम बुरा कर्म करते हैं तो हमें दु:ख भोगने पड़ते हैं और यदि हम अच्छे कर्म करते हैं तो इसके परिणाम हमारे लिए सकारात्मक होते हैं। इंसान के लिए सर्वोत्तम कर्म मालिक के नाम का जाप करना हैं, जो जन्म-मरण की कैद से आजाद करवाता है।

प्रश्न: अगर हम जीव-जंतुओं को नारा लगाकर या सुमिरन करके खाना दें तो क्या उस खाने से उनके कर्म कटते हैं?
उतर: जैसा खाए अन्न, वैसा होए मन, इंसान जैसे विचारों से किसी जीव को भोजन खिलाता है तो खाने वाले जीव पर उसका वैसा ही प्रभाव पड़ता है। इसलिए यदि हम परमात्मा का सुमिरन करके या नारा लगाकर किसी जीव को कुछ खिलाते हैं तो उस जीव के कर्मों का भार अवश्य ही हल्का हो जाता है।

प्रश्न: यदि संत-महात्मा जन्म-मरण के चक्कर से आजाद होते हैं तो इस मृत्युलोक में बार-बार जन्म क्यों लेते हैं?
उतर: संत-महात्मा जन्म-मरण के चक्कर से आजाद होते हैं तथा वे मालिक का ही एक रूप होते हैं। उनका जन्म संचित कर्मों के कारण नहीं होता बल्कि वे तो जीवों की करूण पुकार को सुनकर, उनका उद्धार करने के लिए मनुष्य रूप में अवतार धारण करते हैं। संत-पीर जीवों को जन्म मरण की कैद से आजाद करने के लिए इस मृत्यु लोक में बार-बार अवतार धारण करते हैं।

प्रश्न: क्या पूर्ण सतगुरु, इंसान को उसके पिछले कर्मों के बारे में बता सकता है?
उतर: हां, पूरा सतगुरु इंसान को उसके पिछले कर्मों के बारे में बता सकता है क्योंकि वह परमात्मा से अभेद होता है। संत चाहें तो इंसान के इस जन्म व पूर्व जन्मों के सभी अच्छे व बुरे कर्मों के बारे में बता सकते हैं लेकिन वे किसी का पर्दा नहीं उठाते।

प्रश्न: यदि कोई ऐसा इंसान जिसने नाम प्राप्त कर रखा हो और वह आत्महत्या कर लेता है तो क्या उसकी मुक्ति संभव है?
उतर: ‘आत्म हत्या महापाप है’ पूर्ण रूहानी फकीरों के वचनानुसार अपनी आत्मा का खुद घात करने वाले आत्म हत्यारे को दोनों जहानों में सुख नहीं मिलता। यदि वह कोई पूरे गुरु की संस्कारी रूह है तो उसके लिए सारा परिवार एक साथ बैठकर डेढ़ दो महीने लगातार सुबह-शाम दो-दो घंटे सुमिरन करें व परम पिता परमात्मा से उसकी माफी के लिए अरदास करें तो वह दया का सागर अपनी दया मेहर, रहमत करके उसे माफ भी कर सकता है। अन्यथा उसे रूहानी मंडलों में भयंकर सजा भुगतनी ही पड़गी है।

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