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    दिल्ली एनसीआर की डेढ़ फीसदी आबादी भिखारी

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    सड़कों पर भीख मांगता बचपन

    नई दिल्ली (एजेंसी)। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की करीब डेढ़ प्रतिशत आबादी भिखारियों की है, जिससे रोजाना आम लोगों का पाला पड़ता है, लेकिन यह जानकर हैरानी होगी कि इनमें से ज्यादातर की स्थिति उन डिग्रीधारी नौकरी पेशा लोगों से काफी अच्छी है, जो मेहरबानी कर उनके कटोरे में एक रुपये का सिक्का डाल आगे बढ़ जाते हैं।

    देश में कुल कितने भिखारी हैं, इसके सही आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। ‘नारीजन’ नामक एक स्वयंसेवी संस्था ने एक सर्वे में बताया है कि एनसीआर की तीन करोड़ आबादी में डेढ़ प्रतिशत भिखारी हैं। यह आबादी शरीर ढकने वाला वस्त्र भी भिक्षा पात्र से हासिल करती हैं। चिंताजनक बात यह भी है कि दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगता बचपन या तो नशीली दवाओं का शिकार हो रहा है या अपराधियों की गिरफ्त में आ रहा है।

    गुलाब के फूलों के साथ नोएडा सेक्टर 15 मेट्रो स्टेशन के पास भीख मांगने बैठा बिहार के शिवहर जिले का 26 वर्षीय सुनील साहनी कहता है, ‘मेरे लिए कोई व्यवसाय महत्व नहीं रखता है, क्योंकि इससे भीख मांगने का मेरा काम बाधित होता है। मैं रोजाना दो शिफ्ट में 1200 से 1500 रुपये कमा लेता हूँ।’

    यह कोई सम्मानजनक काम नहीं

    सुनील इस पेशे से हर महीने 36 से 45 हजार रुपये कमा लेता है, जो उन्हें चंद सिक्के देने वाले नौकरी पेशा लोगों की कमाई से अधिक है। सुनील बचपन में पोलियो का शिकार हो गया था और फिलहाल वह दोनों पांव से लाचार है। उसके कंधों पर माँ के अलावा छोटे भाई-बहन का जिम्मा है। वह कतई नहीं चाहता कि उसके छोटे-भाई को यह दिन देखना पड़े। वह कहता है, ‘यह कोई सम्मानजनक काम नहीं है, जब चाहे कोई भी हमें धमकाकर चला जाता है।’

    कुछ भिखारी अपना नाम-पता जाहिर नहीं करना चाहते। गत दो वर्षों से एक मेट्रो स्टेशन के बाहर बैठने वाले दोनों हाथों से दिव्यांग अशोक (नाम परिवर्तित) इसकी वजह बताते हुए कहते हैं, ‘एक तो मैं ब्राह्मण हूँ, ऊपर से बहन की शादी भी करनी है। अगर सही पता ठिकाना छप गया तो मेरी बहन से शादी कौन करेगा?’ वैसे अशोक जहां बैठता है, वहां सामान्य दिनों में एक घंटे की आमदनी 70 से 100 रुपये है। कोई सात-आठ साल पहले थ्रेसर में हाथ चले जाने और बाद में संक्रमण के कारण उसे अपने दोनों हाथ गंवाने पड़े। इलाज में छह बीघा जमीन बिक गई और पौने 12 लाख रुपये खर्च हो गए, इसके बावजूद उसके हाथ बच नहीं सके। उसे पेट पालने के लिए भीख मांगने का विकल्प ही बेहतर नजर आया।

    कोई किसी की मदद नहीं करता

    अशोक ने अपनी मदद के लिए गांव के ही एक बेरोजगार युवक को बुलाया है। नारायण नामक युवक अब अशोक की हर जरूरत पूरी करता है और बदले में उसे मुफ्त में रहने के लिए कमरा मिला हुआ है। बीच के समय में वह अपनी रेहड़ी से कुछ कमाई भी कर लेता है। नारायण ने कहा, ‘मैं तो पूरी तरह संतुष्ट हूं। रोज 100 से 200 रुपये कमा लेता हूँ, सो अलग।

    इन भिखारियों से बातचीत से पता चलता है कि उन्हें परिवार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती, जिसके कारण उन्हें इस धंधे की ओर रुख करना पड़ता है। जन्म से अष्टावक्र दिव्यांग इरफान मलिक ने कहा, ‘हम चार भाई हैं, लेकिन कोई किसी की मदद नहीं करता। सभी अपनी-अपनी जिम्मेदारी उठा रहे हैं।’ कुछ भिखारी ऐसे भी हैं, जो अपने पूरे परिवार के साथ भीख मांगते हैं। इनमें कई महिलाएं भी होती हैं, जो प्रतिदिन 250 से 300 रुपये कमा लेने का दावा करती हैं।

    एनसीआर की तीन करोड़ आबादी में डेढ़ प्रतिशत भिखारी हैं। यह आबादी शरीर ढकने वाला वस्त्र भी भिक्षा पात्र से हासिल करती है। चिंताजनक बात यह भी है कि दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगता बचपन या तो नशीली दवाओं का शिकार हो रहा है या अपराधियों की गिरफ्त में आ रहा है।

    नारीजन, स्वयंसेवी संस्था

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