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मोटर व्हीकल एक्ट से बढ़ता विवाद

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मोटर व्हीकल एक्ट इन दिनों केंद्र और राज्यों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। हाल ही में केंद्र सरकार ने 1988 के मोटर व्हीकल एक्ट में कुछ नए प्रावधानों को जोड़ा है। जिसमें लाइसेंसिंग सिस्टम में सुधार, तकनीकी का प्रयोग, दुर्घटना में घायलों की मदद करने वालों को सुरक्षा और विशेषकर ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारी भरकम जुर्माने आदि कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं। जिनमें भारी भरकम जुर्माने विवाद के केंद्र में है। इससे असहमत होकर कुछ राज्यों में इस कानून को अपने यहां लागू करने से मना कर दिया है। जिसमें मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब और राजस्थान शामिल हैं। इनके अतिरिक्त कुछ बीजेपी शासित राज्य भी हैं, जो इस कानून पर अपनी असहमति व्यक्त कर चुके हैं।

भारत में एक संघीय ढांचा है जिसके द्वारा केंद्र और राज्य में विधाई शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है। जिसके लिए संविधान में तीन सूचियों की चर्चा की गई है। जिसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची प्रमुख हैं। केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची द्वारा प्राप्त शक्तियों के माध्यम से मोटर व्हीकल एक्ट में नए प्रावधानों को जोड़ा है। समवर्ती सूची के अंतर्गत राज्य और केंद्र दोनों ही सूची में अंकित विषयों पर कानून बना सकते हैं। लेकिन यदि एक ही विषय पर केंद्र और राज्य दोनों ने कानून बनाया है। तो केंद्र का कानून लागू होगा और राज्यों का कानून शून्य माना जाएगा। लेकिन यहां पर राज्यों के लिए भी कुछ प्रावधान किए गए हैं। जिनके माध्यम से राज्य केंद्र द्वारा बनाए गए कानूनों पर एक नया कानून बना सकते हैं।

लेकिन इसकी प्रक्रिया जटिल है। इसके लिए राज्य सरकारों को सर्वप्रथम किए गए संशोधनों को विधानसभा में पास कराने के बाद केंद्र सरकार को भेजना होगा और केंद्र सरकार विवेचना के बाद उसको राष्ट्रपति के पास भेजेगी। यदि राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तो राज्यों द्वारा बनाया गया कानून अस्तित्व में आ जाएगा। इस मोटर व्हीकल कानून में कुल 93 प्रावधान हैं। जिसमें 63 केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन द्वारा ही राज्यों पर लागू हो जाते हैं। बाकी के प्रावधान तभी लागू हो सकेंगे जब राज्य सरकारें उसके लिए नोटिफिकेशन जारी करेंगी। जो विवादित विषय कठोर जुमार्ने का है। वह तभी लागू हो सकता है जब राज्य सरकारें उसके लिए नोटिफिकेशन जारी करें। राज्य सरकारों ने इसको ना लागू करने के लिए अपने तर्क दिए हैं। जिनमें भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुख है। संविधान विश्लेषकों को यह विरोध राजनीति से प्रेरित लगता है। क्योंकि लगभग एक माह पहले ही इसके लागू करने की तिथि की घोषणा की जा चुकी थी उस समय इसका विरोध नहीं किया गया।

लेकिन यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि जुर्माने राशि के बढ़ने से जरूरी नहीं है की सभी इसको स्वीकार करने लगे। यदि आप जुमार्ने की राशि बढ़ाते हैं तो सड़कों की गुणवत्ता भी अच्छी होनी चाहिए। हाईवे पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता उच्च होनी चाहिए। इसके साथ सभी राज्य एक जैसे नहीं हैं। कुछ राज्य अभी भी काफी पिछड़े हुए हैं। जहां पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, लोग अपनी दैनिक जरूरतों को भी पूरा करने में असमर्थ हैं। ऐसे में भारी-भरकम जुर्माने सभी राज्यों में तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। केंद्र सरकार का तर्क है कि दिन प्रतिदिन सड़कों पर दबाव बढ़ रहा है, गाड़ियां बढ़ रही हैं। इसलिए ऐसा करना आवश्यक था। यह तर्क भी सभी राज्यों के लिए सही नहीं है। क्योंकि पिछड़े राज्यों में अभी भी कनेक्टिविटी का अभाव है, सड़कों पर दबाव और गाड़ियों की संख्या अभी भी वहां पर विकसित राज्यों की तुलना में कम है। इसलिए कठोर जुमार्ने के प्रावधानों को चरणबद्ध तरीके से सर्वप्रथम विकसित राज्यों से शुरू करना तर्कसंगत था। मौजूदा समय में जिस प्रकार से सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा तकनीकी का प्रयोग करना होगा हमें चालान में मैनुअल चालान को समाप्त करना होगा। इसके साथ कई अन्य आवश्यक कदम भी उठाने होंगे।

सड़क परिवहन मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि राज्यों के पास मोटर व्हीकल कानून को लागू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अन्यथा उनको आर्थिक पाबंदियो से गुजरना होगा और कैग आॅडिट के माध्यम से जुमार्ने ना लगाने से हुई आर्थिक हानि के बराबर केंद्र सरकार रेवेन्यू शेयर में कटौती कर सकती है। यहां यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि पेनाल्टी नियमित आय का साधन नहीं है। यदि इस विषय पर राज्य और केंद्रों के बीच मतभेद हैं तो केंद्र सरकार को पहल करनी चाहिए और बातचीत के माध्यम से राज्य सरकार की चिंताओं को दूर किया जाना चाहिए। इसके साथ यदि राज्य सरकारें इस विषय पर अपना कानून बनाना चाहती हैं तो उनके पास भी संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं, जिनका उन्हें प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि नागरिकों को सुरक्षित परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य है। जिससे समस्त नागरिक एक स्वस्थ और सुरक्षित माहौल में अपने गंतव्य स्थल तक जा सके।
-कुलिन्दर सिंह यादव

 

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