एक दाना और

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गल्ले के व्यापारी ने पहली बार छोटे से बेटे को थड़े पर चढ़ाया। बोला-‘‘देख ले, यह है तेरा ठीहा। उठाले तराजू औरये बाट। जाँच-परख ले डंडी… कान-खोट तो नहीं है? अब एक पल्ले में रख सौ ग्राम का बाट और दूसरे में गेहूँ का एक-एक दाना डालना शुरू कर दे। ध्यान रखना, कोई भी दाना इधर-उधर न गिरे। जब डंडी बराबर हो जाए तो थम जाना।’’ बेटा शुरु हो गया-‘‘एक…दो…तीन…’’ और देखते-देखते डंडी एक सार हो गई। बेटा चहर उठा-‘‘लो बापू, हो गई बराबर।’’
‘‘शाबाश बेटा! अब एक दाना और डाल।’’ व्यापारी ने निर्देश दिया। बेटे ने एक दाना और डाल दिया, पर कुछ ठिठक गया। कहने लगा-‘‘दाने वाला पल्ला तो थोड़ा-सा झुक गया बापू।’’
‘‘बस, यही बात याद रखना।’’ व्यापारी ने मंत्र दे दिया-‘‘एक दाना ज्यादा तोल देना, पर कम नहीं। अपना यही ईमान रहेगा तो ग्राहक जरूर आएगा लौट-लौट कर… तुझे मन से आशीष देने। अभी से गांठ बांध ले।’’ और वह जलते दीए के सन्मुख माथा टेक कर गद्दी पर जा बैठा।

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