लेख

महिला सुरक्षा पर चुप्पी खतरनाक

अमेरिका के गांधी के रूप में जाने जाने वाले डॉक्टर मार्टिन लूथर किंग कहा करते थे कि हमारे जीवन का अंत उस दिन शुरू हो जाता है जिस दिन हम उन मुद्दों के बारे में चुप हो जाते हैं जो आम समाज के लिए मायने रखता है। अगर हम डॉक्टर साहब के इस कथन पर विचार करें तो हमारा देश अनेक मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए है या यूं कह लीजिए कि विभिन्न कारणों के कारण अपेक्षानुरूप प्रगति नहीं कर पा रहा है, जो समाज के लिए बहुत मायने रखता है। शिक्षा, बेरोजगारी, गरीबी इन्हीं मुद्दों में शामिल है। लेकिन सबसे प्रमुख मुद्दा है देश की आधी आबादी यानी महिलाओं की वर्तमान स्थिति का, जिनकी चुप्पी के परिणाम के रूप में हाल ही में आई एक रिपोर्ट ने आईना दिखाया है।

थॉमसन रायटर्स फाउंडेशन ने गत दिनों महिलाओं के मुद्दों पर 500 एक्सपर्ट का एक सर्वे जारी किया है सर्वे जारी करते हुए उन्होंने कहा कि भारत महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से सबसे खतरनाक देश है! हालांकि इस रिपोर्ट पर सवालिया निशान जरूर लगाए जा रहे हैं लेकिन महिला सुरक्षा के मोर्चे पर हमारा देश उत्तरोत्तर प्रगति नहीं कर रहा है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। अगर हम अपने ही गृह क्षेत्र और सबसे विश्वसनीय आंकड़े यानी नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो पर नजर डालें तो 2015 की तुलना में 2016 में महिलाओं पर हो रहे अपराधों में 3 फीसद के लगभग वृद्धि हुई है। जो बहुत चिंता की बात है।

महिला सुरक्षा की यह स्थिति सोचने पर विवश करती है कि आखिर इतने वर्षों के संवैधानिक अधिकारों और शासन प्रशासन द्वारा किए गए तमाम प्रयासों के बावजूद यह स्थिति क्यों? क्या इस स्थिति से निपटने की कुंजी अधिकारों का दायरा बढ़ाने और प्रयासों में संवेदनशीलता में छिपी है या फिर इसके अतिरिक्त भी कुछ करने की आवश्यकता है?

अधिकारों का महत्व : निश्चित रूप से शक्ति व अधिकार किसी व्यक्ति से लेकर समाज, राष्ट्र और यहां तक कि विश्व तक को अपने अस्तित्व का बोध कराता है। कल्पना करें कि अगर हमारे मौलिक अधिकार न हो तो क्या होगा! कल्पना करें कि अगर हमारी विदेश नीति में अखंडता और संप्रभुता का सिद्धांत विद्यमान न होता! निश्चित ही आपका उत्तर यही होगा कि स्थिति बहुत भयावह होती। अधिकारों का प्रभाव क्षेत्र अपने अस्तित्व के बोध कराने तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह हमारे अंदर छुपी हुई कुछ करने की ताकत को भी अवसर प्रदान करता है। इसीलिए बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। वे जानते थे कि इस अधिकार रूपी भावना का लोगों को अनुभूति कराए बिना स्वंत्रता नहीं प्राप्त की जा सकती।

गौरतलब है कि इन दिनों संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत निक्की हेली भारत की यात्रा पर हैं। कितने गर्व की बात है ना कि एक तरफ तो अमेरिका अमेरिका फर्स्ट की नीति पर चल रहा है वही हमारे देश की एक महिला उसी राष्ट्रपति की किचन कैबिनेट में काम करती है । सोचिए अगर किसी देश के नागरिक को दूसरे देश में जाने का अधिकार ही नहीं होता तो क्या जिस गर्व की अनुभूति हम वर्तमान में कर रहे हैं वह कर पाते?

लेकिन सीमाओं को भी समझना होगा: यह ठीक है कि अधिकार व शक्ति व्यक्ति और राष्ट्र को अपने अस्तित्व का बोध कराते हैं लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इनकी भी अपनी सीमाएं होती हैं। यह सीमा ठीक वैसी ही है जैसी पाकिस्तान में आतंकवाद की स्थिति। समूची वैश्विक बिरादरी मानती है कि आतंक को पनाह देने वाला देश कोई और नहीं बल्कि पाकिस्तान है। इसके बावजूद इस पनाह को जड़ से खत्म करने के लिए कोई भी देश ठोस कदम नहीं उठा सकता, जब तक कि पाकिस्तान स्वयं वैश्विक चुनौती बनी इस सच्चाई को स्वीकार ना कर ले।
हमारे संविधान निर्माताओं ने देश को समतामूलक बनाने के लिए अनेक नियम कानून बनाए।

मसलन समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार इत्यादि इत्यादि लेकिन इसके बावजूद हमारे वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक में 144 देशों में 108 वां स्थान क्या बतलाता है? क्या यह नियमों की सीमाओं को बताने के लिए काफी नहीं है? एक तरफ तो हमारा समाज एक नूर ते सब जग उपजा जैसे दर्शनशास्त्र और आडंबर के घनघोर विरोधी और समतामूलक समाज के बहुत बड़े समर्थक कबीरदास को पूजता है, उसकी जयंती बनाता है वहीं दूसरी ओर स्वयं आडंबरों-पाखंड के साथ-साथ असमतामूलक समाज के निर्माण में लगा है।

आगे की राह: दरअसल यही वह दोहरा रूप है जो समाज में व्याप्त महिलाओं की स्थिति के लिए जिम्मेदार है। जिस दिन हम इस दोहरे रूप से निजात पा लेंगे, कोई संदेह नहीं कि इससे महिलाओं की स्थिति में सुधार होगा। आवश्यक है कि समाज का प्रत्येक जन महिलाओं के प्रति असहिष्णुता का भाव पैदा करे। इसके लिए शिक्षा एक महत्वपूर्ण टूल साबित हो सकता है। नीति निर्माताओं का चाहिए कि हमारी शिक्षा में महिलाओं संबंधी योगदान को उल्लेख करें ताकि बचपन से ही बच्चों के मन में महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव पैदा हो सके। सम्मान का भाव पैदा करने में परिवारों की भी अपनी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है।

इसके अतिरिक्त जरूरी है कि हम अपने प्रयासों में संवेदनशीलता लगातार बरतें क्योंकि यह बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ जैसे फ्लैगशिप प्रोग्राम में संवेदनशीलता का ही परिणाम है कि हरियाणा जो कभी परंपरागत समाज के रूप में जाना जाता था आज वही से गीता फोगाट जैसी लड़कियां इतिहास रच कर देश को गौरवान्वित महसूस करा रही हैं। बात यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि देश की सबसे कठिन परीक्षा माने जाने वाली सिविल सेवा परीक्षा में अनु कुमारी का भी उसी क्षेत्र से आना समाज के लगातार बदलने का द्योतक तो है ही साथ ही हमारे प्रयासों की संजीदगी का परिणाम भी है।

पाकिस्तान में आतंकवाद की स्थिति, संविधान में विभिन्न अधिकारों का होने और एक नूर ते सब जग उपजा जैसी संस्कृति के बावजूद महिलाओं की वर्तमान सुरक्षा हालत के आधार पर कहा जा सकता है कि कानूनों की अपनी एक सीमा होती है। वर्तमान समय की सख्त आवश्यकता है कि समाज का प्रत्येक जन जल्द से जल्द इस सीमा को समझें और छोटा बड़ा समझने वाले सामंती मानसिकता से उबरने करने का प्रयास करें। कहीं ऐसा ना हो कि जलवायु परिवर्तन की भांति महिला सुरक्षा भी एक आपदा का रूप धारण कर ले।

मुझे लगता है कि अगर हम इस प्रयास में सफल हुए तो न सिर्फ जिस दो डिजिट की आर्थिक वृद्धि दर का हम संकल्प लिए हैं वह पूरा हो सकेगा बल्कि भीमराव अंबेडकर जी के सपनों के अनुरूप भी प्रगति कर सकेंगे जिसमें वे कहा करते थे कि ‘‘मैं किसी समुदाय की प्रगति महिलाओं ने जो प्रगति हांसिल की है उससे मापता हूँ।’’

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