लेख

असम में वोट बैंक की राजनीति

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कल तक किसी ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर का नाम भी नहीं सुना होगा। आज इसने एक बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्ष इस मुद्दे पर संसद में हंगामा कर रहा है तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस मुद््दे पर खूनखराबे और गृह युद्ध की धमकी दे रही है और यह सब असम के राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के अंतिम प्रारूप में शामिल करने के लिए आए 3.29 करोड़ आवेदनों में से 40 लाख लोगों को शामिल न किए जाने को लेकर है। राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को लेकर राजनीतिक गर्मागर्मी बढ़ गयी है किंतु शायद कम लोगों को पता होगा असम में पहला राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर 1951 में तैयार किया गया था और तब पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में लोग वहां आए थे। इसे 1970 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी जिसने इसे नागरिकता के लिए साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहंी किया। फिर 1985 में आसू ने आंदोलन किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अवैध अप्रवासी की पहचान और उन्हें वापस भेजने के बारे में असम समझौता किया।
लगभग तीन दशक से यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा में रहा और अंतत: 2015 में उच्चतम न्यायालय ने सरकार को निर्देश दिया कि वह नागरिकता, नागरिकों का पंजीकरण और राष्ट्रीय पहचान पत्र जारी करना नियम 2003 के अंतर्गत समयबद्ध ढंग से राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर को अद्यतन बनाए। इसकी प्रक्रिया 2016 में भाजपा सरकार ने शुरू की। भाजपा इस मुद्दे से राजनीतिक लाभ लेना चाहती है और कांग्रेस को हाशिए पर ले जाना चाहती है तथा तूणमूल कांग्रेस अध्यक्षा पर आरोप लगाना चाहती है कि वह अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है। मोदी और शाह की जोड़ी राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के मुद्दे को असम से बाहर भी ले जाना चाहती है और इससे कई संदेश देना चाहती है। पहला, पार्टी कठोर निर्णय ले सकती है। दूसरा, कृषि संकट, अर्थव्यवस्था, बेरोजगारी से ध्यान हटाकर राजनीतिक चर्चा को पुन: सांप्रदायिक एजेंडा की ओर ले जाना चाहती है। भाजपा इसे विपक्ष की छवि खराब करने के लिए भी उपयोग करना चाहती है और इसे बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक का मुद्दा भी बनाना चाहती है। कुल मिलाकर इस मुद्दे में उचतम न्यायालय का रूख अंतिम होगा।

मराठाओं के लिए अन्य पिछडे वर्ग का दर्जा?

महाराष्ट्र हिंसक आंदोलन की जकड़ में है। मराठा चाहते हैं कि उन्हें शैक्षिक संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण मिले। राज्य में मराठाओं की जनसंख्या 33 प्रतिशत है। राज्य में अगले वर्ष विधान सभा चुनाव होने हैं और मुख्यमंत्री फडनवीस अपनी नैया डगमगाने नहंी देना चाहते हैं। इसलिए उन्होंने मराठाओं के लिए 16 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की थी किंतु बाद में इस आदेश को पलट दिया। जिसके बाद मराठाओं ने मराठा क्रांति मोर्चा के झंडे तले अन्य पिछडे वर्ग का दर्जा प्राप्त करने के लिए आंदोलन चलाया क्योंकि वे जानते हैं कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहंी बढ़ायी जा सकती है। इसलिए उन्हें यदि एक बार अन्य पिछडे वर्ग का दर्जा मिल जाएगा तो उन्हें स्वत: ही आरक्षण का लाभ मिलने लगेगा। फडनवीस की चिंता यह है कि यह आंदोलन न केवल हिंसक हो गया है अपितु शिव सेना, कांग्रेस और राकांपा इस आंदोलन को और भडका रहे हैं। देखना यह है कि इस रस्साकस्सी में किसकी जीत होती है मराठाओं की, फडनवीस की या विपक्ष की।

बिहार शर्मसार:

बिहार के मुजफ्फरपुर की घटना ने नीतीश कुमार सरकार को शर्मसार कर दिया है। मुजफ्फरपुर में बालिका आश्रय गृह में लडकियों के यौन उत्पीड़न और प्राधिकारियों द्वारा उसे नजरंदाज किए जाने की जांच की जा रही है। 34 अल्पवयस्क बालिकाओं में से 29 बालिकाओं का कई महीनों तक यौन उत्पीडन किया गया, उन्हें नशीली दवाएं दी गयी और उन्हें पीटा गया। जबकि पिछले नवंबर में इस मामले की ओर जिला मजिस्टेÑट का ध्यान भी आकर्षित किया गया था। राज्य में और संसद में विपक्ष इस मुद्दे को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है। नीतीश सरकार ने इस मामले में सीबीआई जांच के आदेश दिए हैं। उच्चतम न्याायलय ने भी इस मामले में राज्य सरकर और केन्द्र सरकार को नोटिस जारी किया है। राज्य सरकार का कहना है कि उसने इस मामले में त्वरित कार्यवाही कर 10 लोगों को गिरफ्तार किया है जिनमें आश्रय गृह का मालिक ब्रजेश ठाकुर भी शामिल है और आश्रय गृह को बंद कर दिया है। जांच से यह पता चलेगा कि राज्य सरकार ने अप्रैल में टीआईएसएस की रिपोर्ट को नजरंदाज क्यों किया तथा मंत्री सहित प्रशासन ने किसी को जवाबदेह क्यों नहंी ठहराया। क्या इसका कारण ब्रजेश ठाकुर का राजनीतिक प्रभाव था? दोषी व्यक्तियों को पनाह नहीं दी जा सकती।
महिला अधिकारों पर खतरा: मेघालय में खासी महिलाएं सरकार का द्वार खटखटा रही हैं और उनका कहना है कि उनके अधिकारो को वापिस नहीं लिया जाना चाहिए। वे इस मांग को कोनार्ड संगमा सरकार के समक्ष उठा रही हैं। वे खासी जनजातीय सासी निकाय द्वारा पिछले माह पारित विधेयक को रद्द करवाना चाहती हैं जो उन्हें आदिवासी दर्जा और अधिकार जिनमें गैर-खासी व्यक्ति से शादी करने पर भूमि का स्वामित्व अधिकार भी शामिल है से वंचित करेगा। पूर्वोत्तर क्षेत्र के इस राज्य में खासी सहित दो अन्य जनजातियां मातृ सत्तात्मक समाज हैं जहां पर बच्चे के नाम के साथ मां का नाम जुड़ता है और मां से बेटियों को संपत्ति का अधिकार प्राप्त होता है। खासी पर्वतीय स्वायत्त जिला परिषद का कहना है कि इस विधेयक का उद्देश्य इस जनजाति की पहचान को बचाना है तथापि अनेक सामाजिक कार्यकतार्ओं का कहना है कि यह विधेयक खासी महिलाओं से भूमि का अधिकार छीन लेगा। फिर भी खासी महिलाएं बहुत पुराने समय से अंतर जातीय विवाह करती रही हैं। क्या सरकार महिलाओं की मांग पर ध्यान देगी और इस विधेयक को पारित

होने से रोकेगी या पुरूष प्रधान सोच हावी होगी?

आंध्र प्रदेश में रोजगार सृजन: यदि बेरोजगार युवाओं को विकल्प दिया जाए तो वे आंध्र पद्रेश का रूख करेंगे। किंतु यह योजना केवल दक्षिणी राज्य के लोगों के लिए है। भारी वित्तीय घाटे के बावजूद चन्द्रबाबू नायडू की तेदेपा सरकार ने हजार रूपए प्रति माह के बेरोजगारी भत्ते की घोषणा की है। उनके आलोचक इसे एक छोटी सी राशि कहेंगे किंतु इससे राज्य के खजाने पर आठ हजार करोड़ रूपए का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। इस योजना से नायडू को भारी लाभ मिल सकता है क्योंकि अगले वर्ष राज्य में लोक सभा चुनावों के साथ विधान सभा चुनाव भी होने हैं। यह योजना उन बेराजगार युवकों के लिए है जिनके पास डिग्री या डिप्लोमा है और जिनकी आयु 22 से 35 वर्ष के बीच है। इस राशि को सीधा लाभार्थी के बैंक खाते में जाम किया जाएगा तथा एक परिवार में चाहे कितने भी बेरोजगार हों सबको यह राशि दी जाएगी। केन्द्र ने राज्य को विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा नहंी दिया किंतु नायडू अपने 2014 के चुनाव घोषणा पत्र में किए गए वायदे को पूरा कर रहे हैं। सही कहा गया है कि देर आए, दुरूस्त आए।

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