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पर्यावरण सरंक्षण की अनोखी पहल: अब संस्कार के लिए पेड़ों पर नहीं चलेगी कुल्हाड़ी

Unique Initiative, Environmental Protection

सच कहूँ एक्सक्लूसिव स्टोरी

सच कहूँ/गुरजंट धालीवाल /जयपुर। देशभर में खपत होने वाली लकड़ी में से 70 फीसदी लकड़ी केवल शवों के अंतिम संस्कार के लिए जला दी जाती है। इसके लि पांच करोड़ पेड़ों को काट कर 4 मीलियन टन लकड़ी प्राप्त की जाती है और इसका सीधा असर वनों की कटाई पर पड़ता है। शव के अंतिम संस्कार से पर्यावरण पर किसी तरह का कोई प्रतिकूल असर न पड़े, इसके लिए गाय के गोबर की लकड़ी (गोकाष्ठ), कंडे व मोक्षकाष्ठ अब बेहतर विकल्प बन गए हैं। इस विधि से देश के 24 शहरों में शवों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया कारगर सिद्ध हुई है।

शवों के अंतिम संस्कार के लिए भारत में कटते हैं
सालाना पांच करोड़ पेड़

  • इसी सफलता का ही परिणाम है कि यह प्रक्रिया देशभर में अपनायी जा रही है।
  • जयपुर की पिंजरापोल गोशाला व श्रीनारायण धाम गोशाला में गोकाष्ठ का निर्माण किया जा रहा है।
  • राजस्थान प्रदेश के आधा दर्जन से अधिक शहरों में शवों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है।
  • प्रदेशभर के सभी शमशान घरों में गोकाष्ठ के इस्तेमाल को लेकर दोनों संस्थाएं जागरूकता अभियान चला रही हैं।

देश के 24 शहरों में गोकाष्ठ से अंतिम संस्कार शुरू

  • नागपुर
  • पूना
  • यवतमाल
  • अमलनेर
  • कोल्हापुर
  • सतारा
  • सांगली
  • झुलिया
  • हिंगनघाट (वर्धा)
  • बिहार के टाटानगर
  • उड़ीसा के राउरकेला
  • पश्चिम बंगाल के कोलकाता
  • मध्यप्रदेश के ग्वालियर
  • उत्तरप्रदेश के आगरा
  • मथुरा
  • बनारस
  • झारखंड के झरिया
  • धनबाद

राजस्थान में हुए 50 से ज्यादा अंतिम संस्कार

गोकाष्ठ से शवों के अंतिम संस्कार का सिलसिला राजधानी जयपुर में 29 अप्रेल-2017 को शुरू हुआ। जयपुर के चांदपोल स्थित शमशाम घाट पर गोकाष्ठ से प्रदेश का पहला अंतिम संस्कार हुआ। चांदपोल में अब तक 15 शवों का गोकाष्ठ से अंतिम संस्कार हो चुका है। इसके बाद राजधानी के विधाधरनगर सेक्टर-10 में तीन, सीकर रोड में छह, झालाना डूंगरी में तीन, लालकोठी में चार, त्रिवेणीनगर, गोपालपुरा बाइपास में दो, स्वर्णपथ, मानसरोवर व विश्वकर्मा रोड-17 के शमशान घाट में एक-एक शव का गोकाष्ठ से अंतिम संस्कार किया जा चुका है।

गो पर्यावरण समूह, जयपुर की जागरूकता के परिणाम स्वरूप जयपुर के बाद टोंक में आठ, जोबनेर (जयपुर) में दो, सवाईमाधोपुर में एक, चितोडगढ़ में दो, अलवर में 10 से ज्यादा अंतिम संस्कार गोकाष्ठ से किए जा चुके हैं। हैनिमेन चेरिटेबल सोसायटी व गो पर्यावरण समूह की प्रेरणा से जयपुर के अलावा टोंक की गांधी गोशाला, सवाईमाधोपुर की खेरदा गोशाला, अलवर की सार्वजनिक गोशाला व बीकानेर की एक गोशाला में गोकाष्ठ का निर्माण शुरू हो चुका है।

इन शहरों में जल्द शुरू होगा गोकाष्ठ का इस्तेमाल

राजस्थान के तीन शहरों श्रीगंगानगर, कुचामन सिटी, तारानगर व नसीराबाद शहर में जल्द ही गोकाष्ठ से शवों के अंतिम संस्कार का सिलसिला शुरू हो जाएगा। जयपुर की एक कंपनी ने अंतिम संस्कार के लिए लोहे के स्ट्रक्चर व गोकाष्ठ निर्माण करने वाली मशीन इन शहरों में भिजवायी है। राजस्थान के अलावा नासिक में भी गोकाष्ठ से अंतिम संस्कार का ट्रायल जल्द होगा।

60 किलो गोबर से बनेगी 15 किलो गोकाष्ठ

जानकारों के मुताबिक एक गाय चौबीस घंटों में लगभग 8-10 किलो गोबर करती है। मशीन के जरिए 60 किलो गोबर से 15 किलो गोबर की लकड़ी तैयार हो जाती है। पिंजरापोल गोशाला में करीब 1600 गोवंश है। हैनिमेन चेरिटेबल सोसायटी व सनराइज एग्रीलैंड डवलपमेंट एण्ड रिसर्च प्रा. लि., जयपुर ने गोशाला समिति के सहयोग से रोजाना करीब 4 क्विंटल गोकाष्ठ तैयार कर रही है।

एक अंत्येष्टि में तीन क्विंटल गोकाष्ठ की लागत

एक शव की अंत्येष्ठि में करीब पांच क्विंटल लकड़ी की लागत है जबकि तीन क्विंटल गोकाष्ठ से ही अंतिम संस्कार किया जा सकता है। लकड़ी से शव के अंतिम संस्कार पर करीब पांच हजार रुपए औसतन खर्च होता है। वहीं, गोकाष्ठ का प्रयोग किया जाए तो लगभग तीन हजार रुपए खर्चा आता है। ऐसे में आर्थिक बचत तो होगी ही, साथ ही सालाना लाखों पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है।

देश में 199.11 मिलियन पशुधन

19 वीं पशुधन गणना-2012 के अनुसार भारत में 118.59 मिलियन भैंस, 80.52 मिलियन गायें हैं। वहीं, बात सिर्फ राजस्थान की 2319 पंजीकृत गोशालाओं में कुल छह लाख 71452 गौवंश है, जबकि प्रदेश में 26.36 मिलियन गौधन व भैंसें है।

95 लाख शवों का सालाना अंतिम संस्कार

वर्ष-2011 की जनगणना के मुताबिक देश की कुल जनसंख्या 130 करोड़ है। स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक 1.2 प्रतिशत मृत्यु दर है। इस लिहाज से देश में हर साल 95 लाख शवों का दाह संस्कार किया जाता है। प्रत्येक शव के अंतिम संस्कार के लिए 15 साल के दो पेड़ काटने पड़ते हैं।

लकड़ी से इसलिए बेहतर है गोकाष्ठ

  • लकड़ी में 15 प्रतिशत तक नमी होती है, जबकि गोकाष्ठ/मोक्षकाष्ठ/ गोबर के कंडों में डेढ़ से दो फीसदी ही नमी रहती है।
  • लकड़ी को जलाने में 5 से 15 किलो घी या तेल का इस्तेमाल होता है,
  • जबकि गोकाष्ठ से शव को जलाने में महज एक किलो घी पर्याप्त है।
  • गोकाष्ठ/मोक्षकाष्ठ के इस्तेमाल से पेड़ों को बचाने में मदद मिलेगी।
  • गोकाष्ठ बनाने से गो-संरक्षण होगा।
  • लकड़ी धूंए से कार्बन डाई आॅक्साइड गैस निकलती है जबकि गोकाष्ठ या कंडे के जलने से चालीस फीसदी आॅक्सीजन निकलती है।
  • गोकाष्ठ में लैकमड मिलाया जाता है, जिससे ये ज्यादा समय तक जलती है।

गोबर से इन वस्तुओं का निर्माण भी संभंव

गोबर से लकड़ी के अलावा कंडे, गोबर के गमले, मच्छर भगाने वाली अगरबत्ती के साथ-साथ बहुउपयोगी जैविक खाद का निर्माण भी किया जा सकता है। इससे गोशालाओं की आय तो बढ़ायी जा सकती है बल्कि हजारों लोगों को भी रोजगार मिलेगा।

रोजाना चार क्विंटल गोकाष्ठ का निर्माण

पिंजरापोल गोशाला में गोकाष्ठ बनाने के लिए मशीन लगाई गई है। इस मशीन से रोजाना करीब 4 क्विंटल गोबर की लकड़ी का निर्माण हो रहा है।
-डॉ. अतुल गुप्ता, डायरेक्टर, सनराइज एग्रीलैंड रिसर्च एण्ड डवलपमेंट प्रा.लि., जयपुर

जनता में बढ़ रही है रुचि

गोकाष्ठ से अंतिम संस्कार करने को लेकर देश के 19 राज्यों में जनजागरण अभियान चलाया हुआ है। जनता में जागरूकता का ही परिणाम है कि अब तक 24 शहरों में गोकाष्ठ से अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। जल्द ही राजस्थान के चार व अन्य राज्यों के तीन और शहरों में इसका ट्रायल किया जाएगा।

-विष्णु अग्रवाल, सदस्य, गो पर्यावरण समूह

सरकार सहयोग करे तो बचेंगे लाखों पेड़

प्रदेश सरकारें स्थानीय निकायों के जरिए शवों के अंतिम संस्कार के लिए शमशान घरों में गोकाष्ठ के इस्तेमाल को लेकर निर्देशित करे तो न केवल गोशालाओं की आय बढ़ेगी बल्कि हजारों लोगों को भी इससे रोजगार मिल सकेगा। साथ ही सालाना लाखों को पेड़ों को कटने से बचाकर पर्यावरण प्रदूषण को रोका जा सकेगा।

मोनिका गुप्ता, सचिव, हैनिमेन चेरिटेबल मिशन सोसायटी, जयपुर

 

 

 

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