सम्पादकीय

शहीदों पर तुच्छ राजनीति

यह बेहद दुखद बात है कि अब शहीदों को क्षेत्र, जाति, भाषा नजर से देखने का रूझान बढ़ता जा रहा है। इस बार यह उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कर रहे हैं। सरकार से बेदखल हो चुके अखिलेश ने नया काम पकड़ लिया है, वह शहीदों को बांट रहे हैं। अखिलेश का यह कहना कि सब शहीद यूपी के हैं गुजरात का क्यों नहीं? ये शहीदों की शहादत को छोटा करना है।

शहीद पूरे वतन के होते हैं, वह सबके होते हैं। ऐसा ही इनके वरिष्ठ नेता आजम खान भी कारगिल शहीदों को लेकर कर चुके हैं कि कारगिल में एक धर्म के लोग ज्यादा शहीद हुए। ऐसी राजनीति की घोर भर्त्सना की जानी चाहिए। क्षेत्रवाद, सांप्रदाय विशेष की राजनीति देश विरोधी ताकतों को मजबूत करती है।

देश पहले ही कश्मीर व छत्तीसगढ़ में आतंक से बुरी तरह से जूझ रहा है, अत: बात आतंकवाद की चुनौती से निपटने की हो। अखिलेश यादव भले ही अब यूपी सरकार में नहीं है, लेकिन वह अभी भी यूपी के एक मजबूत नेता हैं। उन्हें विपक्ष की भूमिका जोरदार तरीके से निभानी चाहिए। यूपी में भाजपा प्रचंड बहुमत से आई है।

ऐसे में भाजपा सरकार या इसके नेता अपनी तानाशाही या हठधर्मिता भी चलाने की कोशिश करेंगे। ऐसे में मीडिया व विपक्षी राजनेता ही आमजन की ढाल बन सकते हैं, जोकि बनना भी चाहिए। अखिलेश यावद युवा नेता हंै ऐसे में उन्हें युवाओं की शैली अपनी राजनीति में रखनी चाहिए। अवधि पार दवा जैसे बूढ़े नेताओं की तरह तोड़-फोड़ की ब्यानबाजी न अखिलेश के हित में है, न यूपी और देश के हित में है।

इस वक्त यूपी का समाजवादी परिवार पूरी तरह से बिखर चुका है, जिससे देश के विकास की, आमजन के कल्याण की एक राजनीतिक व आर्थिक विचार धारा समाजवाद मरणासन्न अवस्था में पहुंच गई है। समाजवाद किसान, मजदूर व व्यापारी वर्ग सबके लिए समानता की बात करता है। यहां पूंजीगत तरक्की की बजाए सबके लिए एक समान विकास की लड़ाई लड़ी जाती है। समाजवाद जैसी न्यायशील लड़ाई को यूपी व गुजरात के बीच कत्ल कर देना एक बहुत बड़ी भूल होगी।

 

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