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त्रिपुरा-मिजो समझौता संपन्न; असमंझस में राजस्थान भाजपा

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केजरीवाल और उनकी टीम को एक बड़ी जीत मिली है। उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी सरकार और उपराज्यपाल के बीच शक्तियों के बंटवारे को लेकर चली आ रही तू-तू, मैं-मैं पर विराम लगा दिया है।

बुधवार को पांच न्यायधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया है कि उपराज्यपाल निर्वाचित सरकार की सहायता और सलाह से कार्य करने के लिए बाध्य हैं और उसने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को पलट दिया है। सरल शब्दों में कहें तो अब दिल्ली में निर्णय लेने की वास्तवकि शक्ति केजरीवाल और उनके मंत्रिमंडल के पास है और उपराज्यपाल बैजल के पास स्वतंत्र शक्ति नहीं है।

सिवाय उन ममालों के जो अनुच्छेद 249 के अंतर्गह हैं या राष्ट्रीय राजधानी सरकार क्षेत्र के अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। यही नहंी खंड पीठ ने यह भी निर्देश दिया कि दोनों पक्षों के बीच छोटे-मोटे मुद्दों पर मतभेद को निर्णय लेने के लिए तब तक राष्ट्रपति के पास नहीं भेजा जा सकता है जब तक वे राष्ट्रीय महत्व के न हों। न्यायालय ने कहा कि यह संवैधानिक खंडपीठ अपने कर्तव्य को पूरा नहीं करेगी यदि निर्वाचित सरकार बिना किसी शक्ति के मात्र औपचारिक सरकार बनी रहे।

भाजपा शासित केन्द्र उपराज्यपाल के माध्यम से यही कर रहा था। वह नौकरशाहों की नियुक्ति, स्कूल अध्यापकों की नियुक्ति या मोहल्ला क्लीनिक कर्मचारियों की नियुक्ति आदि में दिल्ली सरकार के निर्णयों पर रोक लगा रही थी। उच्चतम न्यायलय ने दिल्ली सरकार की मदद की है और केन्द्र को आगाह किया है। क्या केन्द्र सरकार ने इससे कुछ सबक सीखा है यह समय ही बताएगा।

त्रिपुरा-मिजो समझौता:

त्रिपुरा और मिजोरम दोनों के लिए खुशखबरी है। पूर्वोत्तर के इन दोनों राज्यों ने केन्द्र और मिजोरम ब्रू स्टेट्स पीपुल्स फोरम के साथ एक ऐतिहासिक समझौता किया है। त्रिपुरा में शरणार्थियों के रूप में रह रहे ब्रू जनजाति के लोग अंतत: अपने गृह राज्य मिजोरम वापस जाएंगे। वर्षों की मेहनत के बाद त्रिपुरा में 60 शरणार्थी शिविरों में रह रहे 5407 परिवारों के 25876 लोग 30 सितंबर से पूर्व मिजोरम भेजे जाएंगे।

इन परिवारों के पुनर्वास के लिए केन्द्र सरकार एकमुश्त चार लाख रूपए, दो साल तक प्रति माह 5 हजार रूपए और मकान बनाने के लिए डेढ लाख रूपए तथा दो वर्ष तक नि:शुल्क राशन की सहायता देगा।

साथ ही केन्द्र राज्य सरकार के साथ सहयोग कर इन लोगों की सुरक्षा, शिक्षा, आजीविका सुनिश्चित करेगी। मिजो राष्ट्रवाादी समूहों द्वारा ब्रू जनजाति को मिजोरम का मूल निवासी नहीं माना जाता है और उन्हें मिजोरम से विस्थापित होने के लिए बाध्य किया गया। अब अगले तीन माह में इस जनजाति का पुनर्वास होना है। क्या उनकी घर वापसी का वायदा पूरा किया जाएगा?

राजस्थान में भाजपा असमंजस में:

असमंजस की स्थिति में फंसी भाजपा राजस्थान में पार्टी को हुए नुकसान की भरपाई का प्रयास कर रही है। राज्य में इस वर्ष के अंत में विधान सभा चुनाव होने हैं और यह भविष्यवाणी की जा रही है कि मतदाता मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उनका मार्ग दिखा देंगे इसलिए राज्य सरकार राजपूत, गुज्जर, आदि समुदायों को मनाने में व्यस्त है जो पार्टी का परंपरागत वोट बैंक है।

सोमवार को राज्य सरकार ने दो निर्णय लिए। पहले निर्णय में पिछले वर्ष जुलाई में नागौर जिले में पुलिस मुठभेड के विरुद्ध राजपूत नेताओं द्वारा किए गए विरोध प्रदर्शन के बाद फैली हिंसा में 24 राजपूतों के विरुद्ध मामले वापस लिए गए। राज्य सरकार ने फिर से आदेश जारी किए हैं कि गुज्जर सहित पांच जातियां अन्य पिछडे वर्ग के अंतर्गत 21 प्रतिशत आरक्षण प्राप्त करने की हकदार हैं। इसके अलावा 1 प्रतिशत कोटा अति पिछडे वर्गों को दिया गया है।

यह निर्णय गुज्जर समुदाय द्वारा आज प्रधानमंत्री मोदी की जयपुर यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन करने की धमकी के बाद लिया गया है। सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्री ने सभी विभागों को निर्देश जारी किए हैं कि इस नीति के अंतर्गत सभी विभागों और शैक्षणिक संस्थानों में लंबित नियुक्तियों को भरा जाए। उसके बाद इस समुदाय ने अपना विरोध प्रदर्शन वापस लेने का निर्णय किया है। अब सभी की निगाहें मोदी पर लगी हुई हैं कि वे क्या वायदा करते हैं।

राज्यों को उच्चतम न्यायालय की चेतावनी:

उच्चतम न्यायालय ने सभी राज्यों को चेतावनी दी है कि वे भीड़ द्वारा लोगों की हत्याओं और भीड़ द्वारा हिंसा को रोकने के लिए बाध्य हैं और एसी घटनाएं नहंी होनी चाहिए। न्यायालय गोरक्षकों द्वारा हमले के बारे में याचिका की सुनवाई कर रहा था। याचिका में कहा गया था कि राज्य भीड़ द्वारा लोगों की हत्या किए जाने के बारे में न्यायालय द्वारा पहले दिए गए निदेर्शों पर राज्य सरकारों द्वारा पालन न किया जाना न्यायालय की अवमानना है। मुख्य न्यायधीश मिश्रा ने स्पष्टत: कहा कि भीड़ द्वारा हत्याओं के विरुद्ध कानून है या नहीं। किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहंी दी जा सकती है।

अगर ऐसा होता है तो उसके लिए राज्य सरकारों को जिम्मेदार ठहराया जाएगा। उन्होंने व्यापक निर्णय को आरक्षित रखा है। मई के माह से महाराष्ट्र, त्रिपुरा और असम सहित देश के विभिन्न भागों में भीड़ द्वारा 22 लोगों की हत्या की गयी है। न्यायालय इस बात पर विचार करेगा कि क्या केन्द्र को अनुच्छेद 256 के अंतर्गत ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए राज्यों को निर्देश देने के लिए कोई योजना बनानी चाहिए और पीडित व्यक्तियों को मुआवजा देने का प्रावधान किया जाना चाहिए। भगवान के डर से न सही किंतु क्या उच्चतम न्यायालय के डर से राज्य सरकारें इस दिशा में कदम उठाएंगी या कानून के शासन का मजाक बनाती रहेंगी?

कर्नाटक के किसानों की समस्या:

कर्नाटक के किसान दुविधा में हें। क्या कुमारास्वामीा सरकार उनके कल्याण पर ध्यान दे रही है या उन्हें सब्जबाग दिखा रही है? गुरूवार को विधान सभा में प्रस्तुत बजट में जेडी(एस)-कांग्रेस सरकार ने पिछले वर्ष 31 दिसंबर तक जिन किसानों ने अपने फसल ऋण का भुगतान नहंी किया था उनका ऋण माफ कर दिया है। किंतु यह इतना आसान नहंी है।

बजट में ऋण माफी के लिए अनेक शर्तें थोपी गयी हैं। इसमें पहली शर्त यह है कि अधिकतम मूल ऋण दो लाख तक माफ किया जाएगा और इसके लिए 24 हजार करोड रूपए का प्रावधान किया गया है। सहकारी बैंकों और सरकारी कर्मचारियों के परिवार तथा किसान जिन्होंने पिछले तीन वर्ष में आयकर का भुगतान किया है वे इस ऋण माफी के लिए पात्र नहीं होंगे।

साथ ही यह भी घोषणा की है कि जिन किसानों ने अपना ऋण का भुगतान कर दिया है उनके 25 हजार रूपए पूरी ऋण राशि जो भी कम हो उसका भुगतान सरकार द्वारा किया जाएगा ताकि जिन किसानों ने ऋण का भुगतान कर दिया है उन्हें प्रोत्साहन मिले और वे नए ऋण ले सके। राज्य के किसान ऋण माफी योजना को समझने में व्यस्त हैं और राज्य सरकार को भी अपने खजाने का जायजा लेना पडेगा कि क्या उसके पास इतना पैसा है।

उत्तराखंड पशुओं के लिए स्वर्ग:

यदि पशु कोई इच्छा व्यक्त कर सकते तो वे उत्तराखंड में रहने की इच्छा व्यक्त करते। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने बुधवार को घोषणा की है कि नभ चर और जल चर सहित सभी पशु कानूनी इकाइयां हैं और उन्हें जीवित व्यक्ति के समान अधिकार, कर्तव्य और उत्तरदायित्व प्राप्त हैं। उच्च न्यायालय ने 2014 में दायर जनहित याचिका पर यह आदेश दिया है।

इस जनहित याचिका में न्यायालय से यह निर्देश देने की मांग की गयी थी कि भारत और नेपाल के बीच बनवासा और चंपावत के घोड़ा गाडी की आवाजाही पर रोक लगा दी जाए। यह भी मांग की गयी थी कि घोड़ों सहित किसी भी भारवाही पशु पर अधिक वजन न रखा जाए। पूरे राज्य में पशुओं को हांकने के लिए धारदार उपकरण का उपयोग न किया जाए।

यदि गर्मियों में तापमान 37 डिग्री से अधिक हो तो सुबह 11 से शाम 4 बजे तक और यदि सर्दियों में तापमान 5 डिग्री से कम हो तो रात 10 बजे से सुबह 5 बजे तक किसी भी पशु का उपयोग गाडी खींचने के लिए न किया जाए। किसी भी मालगाडी में छह से अधिक पशुओं को न ले जाया जाए और प्रत्येक मालगाडी में एक परिचारक हो।

इंफा

 

 

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