लेख

मध्यप्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेतना का उभार

Tribal Consciousness Emerges In Madhya Pradesh Politics

मध्यप्रदेश में जयस यानी जय आदिवासी युवा शक्ति जैसे संगठन की सक्रियता दोनों पार्टियों को बैचैन कर रही है। डेढ़ साल पहले आदिवासियों के अधिकारों की मांग के साथ शुरू हुआ यह संगठन आज अबकी बार आदिवासी सरकार के नारे के साथ 80 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है। जयस द्वारा निकाली जा रही आदिवासी अधिकार संरक्षण यात्रा में उमड़ रही भीड़ इस बात का इशारा है कि बहुत ही कम समय में यह संगठन प्रदेश के आदिवासी सामाज में अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहा है. जयस ने लम्बे समय से मध्यप्रदेश की राजनीति में अपना वजूद तलाश रहे आदिवासी समाज को स्वर देने का काम किया है। आज इस चुनौती को कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियां महसूस कर पा रही हैं और उन्हें नए सिरे से रणनीति बनानी पड़ रही है। 2013 के विधानसभा चुनाव में आदिवासियों के लिए आरक्षित 47 सीटों में भाजपा को 32 तथा कांग्रेस को 15 सीटों मिली थी।

2013 में ही डॉ. हीरा लाल अलावा द्वारा जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) का गठन किया गया था जिसके बाद इसने बहुत तेजी से अपने प्रभाव को कायम किया है। पिछले साल हुये छात्रसंघ चुनावों में जयस ने एबीवीपी और एनएसयूआई को बहुत पीछे छोड़ते हुए झाबुआ, बड़वानी और अलीराजपुर जैसे आदिवासी बहुल जिलों में 162 सीटों पर जीत दर्ज की थी। आज पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों अलीराजपुर, धार, बड़वानी और रतलाम में जयस की प्रभावी उपस्थिति लगातार है यह क्षेत्र यहां भाजपा और संघ परिवार का गढ़ माना जाता था।

जयस की विचारधारा आरएसएस के सोच के खिलाफ है, ये खुद को हिन्दू नहीं मानते हंै और इन्हें आदिवासियों को वनवासी कहने पर भी ऐतराज है। खुद को हिंदुओं से अलग मानने वाला यह संगठन आदिवासियों की परम्परागत संस्कृति के संरक्षण और उनके अधिकारों के नाम पर आदिवासियों को अपने साथ जोड़ने में लगा है। यह संगठन आदिवासियों की परम्परागत पहचान, संस्कृति की संरक्षण व उनके अधिकारों के मुद्दों को प्रमुखता उठता है। जयस का मुख्य जोर 5वीं अनुसूचि के सभी प्रावधानों को लागू कराने में हैं, दरअसल भारतीय पांचवी अनुसूचि की धारा 244(1) के तहत आदिवासियों को विशेषाधिकार दिए गये हैं जिन्हें सरकारों ने लागू नहीं किया है।

मध्यप्रदेश में आदिवासी की स्थिति खराब है, शिशु मृत्यु और कुपोषण सबसे ज्यादा आदिवासी बाहुल्य जिलों में देखने को मिलता है, इसकी वजह यह है कि सरकार के नीतियों के कारण आदिवासी समाज अपने परम्परागत संसाधनों से लगातार दूर होता गया है, विकास परियोजनाओं की वजह से वे व्यापक रूप से विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर हुए हैं और इसके बदले में उन्हें विकास का लाभ भी नहीं मिला, वे लगातार गरीबी व भूख के दलदल में फंसते गये हैं. भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट आफ द हाई लेबल कमेटी आन सोशियो इकोनामिक, हैल्थ एंड एजुकेशनल स्टेटस आफ ट्राइबल कम्यूनिटी 2014 के अनुसार राष्ट्रीय स्तर पर आदिवसी समुदाय में शिशु मृत्यु दर 88 है जबकि मध्यप्रदेश में यह दर 113 है, इसी तरह से राष्ट्रीय स्तर पर 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर 129 है वही प्रदेश में यह दर 175 है, आदिवासी समुदाय में टीकाकरण की स्थिति चिंताजनक है।

दूसरी तरफ स्थिति ये है कि पिछले चार सालों के दौरान मध्य प्रदेश सरकार आदिवासियों के कल्याण के लिए आवंटित बजट में से 4800 करोड़ रुपए खर्च ही नहीं कर पायी है। 2015 में कैग द्वारा जारी रिपोर्ट में भी आदिवासी बाहुल्य राज्यों की योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठाए गए थे। उपरोक्त परिस्थितियों ने जयस जैसे संगठनों के लिये जमीन तैयार करने का काम किया है। इसी परिस्थिति का फायदा उठाते हुए जयस अब आदिवासी बाहुल्य विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने की तैयारी में है। इसके लिये वे आदिवासी समूहों के बीच एकता की बात कर रहे हैं जिससे राजनीतिक दबाव समूह के रूप में चुनौती पेश की जा सके। डॉक्टर अलावा कहते है कि जयस एक्सप्रेस का तूफानी कारवां अब नही रुकने वाला है। हमने बदलाव के लिए बगावत की है और किसी भी कीमत पर बदलाव लाकर रहेंगे।

‘जयस’ ने 29 जुलाई से आदिवासी अधिकार यात्रा शुरू की है जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग जुड़ भी रहे हैं। जाहिर है अब ‘जयस’ को हलके में नहीं लिया जा सकता है, आने वाले समय में अगर वे अपने इस गति को बनाये रखने में कामयाब रहे तो मध्यप्रदेश की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। वहीं कांग्रेस भी आदिवासियों को अपने खेमे में वापस लाने के लिये रणनीति बना रही है। आने वाले समय में मध्यप्रदेश की राजनीति में आदिवासी चेतना का यह उभार नए समीकरणों को जन्म दे सकता है और इसका असर आगामी विधानसभा चुनाव पर पड़ना तय है। बस देखना बाकी है कि भाजपा व कांग्रेस में से इसका फायदा कौन उठता है या फिर इन दोनों को पीछे छोड़ते हुये सूबे की सियासत में कोई तीसरी धारा उभरती है। जावेद अनीस

 

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