लेख

डिप्रेशन की शिकार आज की युवा पीढ़ी

युवाओं में तेजी से बढ़ती डिप्रेशन की बीमारी को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन का हालिया अध्ययन न केवल चेताने वाला है अपितु गंभीर चिंता का विषय भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार 2020 आते आते डिप्रेशन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी बीमारी हो जाएगी। हांलाकि पहली बड़ी बीमारी हार्ट की बीमारी का एक कारण डिप्रेशन भी है। बदलती जीवन शैली और भागम भाग की जिंद्गी में आज का युवा डिप्रेशन का शिकार होता जा रहा है।
एक रिपोर्ट के अनुसार कार्य क्षेत्र पर अत्यधिक दबाव और टारगेट आधारित वेतन भत्तों के चलते कारपोरेट क्षेत्र में काम करने वाले युवा डिप्रेशन की च΄ोट में सबसे अधिक आ रहे हैं। कारपोरेट क्षेत्र के करीब 42 फीसदी युवा तेजी से डिप्रेशन का शिकार होते जा रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य दिवस पर जारी एक रिपोर्ट न केवल चेताने वाली है अपितु कार्यक्षेत्र में बढ़ते दबाव के कारण युवाओं में पनप रही कुंठा और निराशा भी दर्शा रही है। आज की युवा पीढ़ी खेलने-कूदने के दिनों में जिस तरह से डिप्रेशन का शिकार हो रही है वह किसी भी देश की भावी पीढ़ी के लिए उचित नहीं माना जा सकता है। सबसे मजे की बात यह है कि ग्लेमर या मोज मस्ती की मानी जानी वाली नोकरियों में ही सर्वाधिक डिप्रेशन का शिकार होना पड़ रहा है। यह सब तो तब है जब आज की युवा पीढ़ी स्वास्थ्य और खान-पान के प्रति अधिक सजग होने लगी है। जिम जाना या भोजन में कोलेस्ट्रोल, प्रोटिन, काबोर्हाईड्रेट या अन्य तत्वों की अधिक जानकारी रखते हुए पर बाहरी खासतौर से फास्टफूड स्वास्थ्य का बुरी तरह से प्रभावित कर रहा है।
गैलप की भी सर्वे रिपोर्ट ने विकास की ओर तेजी से बढ़ते भारत के नियंताओं को सोचने को मजबूर कर दिया है। गैलप की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार देशवासियों खासतौर से ग्रामीणों में निराशा की भावना अधिक बढ़ रही है। बदलते सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने के कारण निराशा बढ़ना स्वभाविक भी लगती है। एक समय था तब हमारा आदर्श साधा जीवन-उच्च विचार होता था। जीवन की सीमित आवश्यकताओं के कारण जीवन जीने का अलग ही अंदाज होता था। आदमी दिखाने में कम विश्वास रखता था। दैनिक आवश्यकताएं एक सीमा तक होती थी। दिखावे को सराहा नहीं जाता था बल्कि व्यंग के रुप में देखा जाता था। साद्गी की पहचान होती थी। व्यक्ति की पहचान उसके विचारों के आधार पर होती थी। आज स्थिति इसके उलट हो गई है। अमीर व गरीब के बीच की खाई बढ़ने के साथ ही अमीर व अमीर के बीच ही दिखावे की अंतहीन प्रतिस्पर्धा होने लगी है। तेरी कमीज मेरी कमीज से अधिक उजली कैसे ? इसी में मरे जा रहे हैं हम आज।
नए रोजगार की तलाश के कारण शहरों की ओर पलायन, बढ़ती महंगाई की तुलना में सीमित आय व जीवन स्तर में बदलाव के कारण निराशा अधिक बढ़ रही है। गॉंवों में पारंपरिक उद्योग अब नहीं रहे हैं, उनकी जगह नए उद्योगों ने ले ली है। परपंरागत कार्योंं से युवाओं द्वारा मुंह मोड़ लेने से युवा अब रोजगार के लिए दूसरे पर निर्भर होने लगे हैं हालांकि परपंरागत कार्यों को प्रोत्साहन नहीं मिलना और समयानुकूल बदलाव नहीं होने के कारण भी युवा इससे दूर होते जा रहे हैं।
सरकार यदि योजनाओं को ग्राम केन्द्रीत बनाती है, ग्रामीण युवाओं को इनसे जोड़ने के प्रयास करती है और गांवों में आधारभूत सुविधाओं का विस्तार करती है तो इससे ग्रामीण युवाओं में व्या΄त निराशा से कुछ हद तक निजात मिल सकती है। इसके अलावा आय के साधन विकसित होने व गॉंव में आधारभूत सुविधाओं के विस्तार से युवाओं का शहरों की ओर पलायन रुकने के साथ ही शहरों पर अंधाधुंध बढ़ रहे दबाव को भी कम किया जा सकता है।
कारपोरेट कार्मिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रतिस्पर्धा के कारण तनाव में रहना है। एकल परिवार, कार्यक्षेत्र परिवार से दूर होने के कारण अकेले रहने, लिव इन रिलेशनशिप, बाजार में प्रतिस्पर्धा और ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की संस्कृति के कारण तनाव बढ़ रहा है। आज घर की परिभाषा ही बदल गई है। अब तो परिवार के भी मानक बदल गए हैं। रिश्ते नाते पीछे चले गए हैं, डिप्रेशन रिलीज नहीं होने के कारण मस्तिष्क के किसी कोने में तनाव के अंश सुशु΄त अवस्था में रह जाते हैं और इससे कुंठा, अनिंद्रा, झुंझलाहट, ब्लडप्रेशर और ना जाने कितनी ही बीमारियों को पाल लेते हैं। ऐसे में आज की पीढ़ी के भविष्य को देखते हुए डिप्रेशन का कारगर समाधान खोजना होगा नहीं तो सामाजिक विघटन को कोई नहीं रोक पाएगा। राजेन्द्र शर्मा

लोकप्रिय न्यूज़

To Top