सम्पादकीय

दलितों का उत्थान ही देश का भविष्य तय करेगा

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भाजपा दलित हितैषी होने के लिए उच्चतम न्यायलय के उस निर्णय के खिलाफ जिसमें एससी/एसटी वर्र्गाें के उत्पीड़न मामलों में स्वर्ण जातियों की तत्काल गिरफ्तारी पर रोक हो गई थी, को खत्म करने के लिए नया बिल ले आई है, जिससे कि दलित उत्पीड़न में स्वणों की तत्काल गिरफ्तारी तय हो। लेकिन भाजपा को सरकार बनाने देने के लिए जिस राज्य ने सबसे अधिक सीटें जिताई, यहां भाजपा की ही सरकार है वहां दलित उत्पीड़न थमने का नाम ही नहीं ले रहा।

उत्तर प्रदेश सरकार के हालिया आदेश में पुलिस अपनी रक्षात्मक ड्यूटी छोड़ कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा तो कर रही है लेकिन राज्य में दलित हिंसा के शिकार बना मौत के घाट उतारे जा रहे हैं, उनकी कोई सुनने वाला नहीं। उधर भाजपा है कि इस उधेड़-बुन में लगी हुई है कि दलितों के जो संगठन अपने हक के लिए संघर्ष कर रहे हैं उनके बढ़ते प्रभाव को कैसे कम किया जाए? आजादी के पहले से दलित बेवजह हो रहे अपने उत्पीड़न के विरुद्ध लड़ रहे हैं। आजादी के बाद डॉ. बीआर अम्बेडकर द्वारा रचे संविधान से दलितों को समानता की कुछ आस जगी थी, लेकिन देश में जातिवादी सोच की जड़े इतनी गहरी हैं कि आज 70 साल हो गए समानता का संविधान रचे हुए परन्तु दलित समाज आज भी उत्पीड़ित है। भाजपा के शासन में अल्पसंख्यकों व दलितों के उत्पीड़न के मामले बेतहाशा बढ़े हैं।

भाजपा का अभी दलित हितैषी बिल भी ऊपरी तौर पर एक स्वांग है, जबकि जमीनी सच्चाईयां बहुत कड़वी हैं। भाजपा शासित राज्यों में दलितों को कभी गाय, कभी उनका हक मांगने के लिए मौत के घाट उतारा जा रहा है, सरकारें हैं कि बस और ही और कामों में मश्गूल हैं। उत्तर प्रदेश में कावड़ियों पर बरसाए जाने वाले फूलों से स्पष्ट है कि यहां का लोकतंत्र व उसकी मशीनरी अब सांप्रदायिक कार्यों व अनुष्ठानों को पहले करेंगी बाकी देश या उसका कार्य कोई मायने नहीं रखता।

दलित वर्ग देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा है, जब तक दलित आबादी को शिक्षा, सुरक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सुलभ नहीं हो जाता देश के विकास का सपना पूरा नहीं होगा। दलितों को राजनीतिक, जातिवादी चश्में से देखा जाना बंद होना चाहिए। देश के हर संस्थान व सरकार को देश के इस पिछड़े वर्ग के उत्थान को ज्यादा से ज्यादा गति देनी चाहिए ताकि भारत विश्व के पूर्ण विकसित राष्टÑों में शुमार हो सके। दलितों का उत्थान सामाजिक व मानवीय तौर पर होना भी बेहद आवश्यक है, जिसे हजारों वर्षाें से अनदेखा किया जा रहा है, जो कि भविष्य के भारत में नहीं होना चाहिए।

 

 

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