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देश की उन्नति की चाबी युवा वर्ग के हाथ

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किसी भी देश का सौभाग्य होतें हैं उसके युवा और भारत दुनिया के सौभाग्यशाली युवा देशों में से एक है। दुनिया के विकसित देशों के विकास चक्र पर दृष्टि दौड़ाएं तो युवाओं का अहम रोल नजर आता है। युवा चाहें तो देश को विकास की बुलंदियों पर ले जाएं। अगर इन युवाओं की ऊर्जा और जोश को सही मार्गदर्शन ना मिले तो यही युवा विकास के मार्ग का रोड़ा बन जाते हैं।

आजादी के बाद समय समय पर देश पर हुए हमलों का देश के युवा वर्ग के जोश, जनून और होंसले के दम पर ही डट कर सामना किया है। पिछले कुछ सालों से यूं लगता है कि युवा वर्ग किसी ईमानदार प्रेरणास्रोत के अभाव में दिशाहीनता की और बढ़ता जा रहा है। आजकल के भौतिकवादी समय में जहां हर कोई जल्द से जल्द तरक्की कर के लखपति बन जाना चाहता है, वहां युवा भी अपवाद नहीं हैं।

युवाओं का पढ़ लिख कर देश की तरक्की में रोल निभाने और मातृभूमि की मिट्टी का कर्ज चुकाने की बजाय, कानूनी अथवा गैरकानूनी किसी भी ढंग से विदेश जाना जैसे उनकी जिंदगी का एक मात्र उद्देश्य बन गया हो। जो युवा अपने देश में अपनी योग्यता अनुसार नौकरी से कम कुछ भी मंजूर नहीं की मानसिकता रखता है, वही युवा विदेश में डॉलरों और पौंड की चमक से चौंधिया कर हर स्तर का काम और हर तरह के समझौते करने को तैयार रहता है।

विकसित देशों की उन्नति में उस देश के नागरिकों की अपने देश को अपना समझने की भावना का योगदान होता है। वहां के नागरिक देश की भलाई के लिए बने कानूनों की पालना दिल से करते हैं, पर दु:ख की बात है कि हमारे युवा उनकी ही भलाई के लिए बने ट्रैफिक नियमों की भी पालना नहीं करना चाहते। हमें रोजाना ही बालों में जैल लगाए, बाजू में हेलमेट टांगे, कानों में एयर फोन लगाए, ट्रैफिक हवलदार को चकमा देने के लिए गलियों में वाहन घुमाते युवा अकसर दिख जाते हैं।

अगर ट्रैफिक हवलदार लाइटों पर ना हो तो तेज गति से वाहन दौड़ातें, अपनी जान की कीमत न समझते हुए रैड लाईट जम्प करते युवा यह भी ख्याल नहीं रखते की दूसरी तरफ से उन जैसा ही जोशीला युवा उनसे भी दोगुनी स्पीड से वाहन उड़ाते हुए उसकी जान को जोखिम में डाल सकता है।

पहले जहां युवाओं की रुचियां सेहत बनाना, कब्बडी, घोल और कसरतें होते थे, अब वह रुचियां सोशल मीडिया ने खत्म कर दी हैं। बसों, ट्रेनों, पार्क और पब्लिक स्थानों पर युवा हाथों में मोबाइल पर उंगलियां चलाते किसी काल्पनिक दुनिया में खोए रहते हैं। घरों में भी मोबाइल गेमों और सोशल नेटवर्किंग में उलझे युवाओं से दिल की बात करने को मां-बाप तरसते रहते हैं।

फेसबुक, ट्विटर, वाट्सअप, स्नैपचेट और कई और इन्टरनेट ऐप्लिकेशन्स ने युवाओं का सारा समय ही चूस लिया है। रही सही कसर उलटे सीधे फैशनों ने पूरी कर दी है। विकसित देशों में कपड़े काम और मौसम देख कर पहने जाते हैं पर हमारा युवा वर्ग घिसी फट्टी लो वेस्ट जीन्स और अजीबोगरीब शब्दावली, डरावने कार्टून्स वाली टी शर्ट्स को ही फैशन समझ बैठा है। अजीब से बालों, दाढ़ी, मूछें और कलमों के स्टाइल के पीछे अच्छा दिखने की नहीं अलग दिखने की मानसिकता रहती है।

युवा वर्ग का रुझान अब पहले की तरह दूध, घी, मक्खन, लस्सी और पौष्टिक खाने में नहीं रहा और इसकी जगह अब पीजा, बर्गर, नूडल्स, मन्चूरियन, कोल्ड ड्रिंक और फास्ट फूड ने ले ली है। इसके लगातार सेवन से होने वाले नुकसानों से बेपरवाह युवाओं के झुंड शाम के समय फास्ट फूड कार्नर पर मंडराते नजर आते हैं। जंक फूड के बुरे प्रभाव युवाओं की बिगड़ती सेहत और घटते कद काठ में नजर आते हैं। युवाओं की फिल्मों और इंटरनेट में बढ़ती दिलचस्पी के कारण ही उनमें हिंसा और नशीले पदार्थों के प्रति झुकाव बढ़ा है।

फिल्मों और लचर पंजाबी गानों में लहराए जाते हथियारों के प्रदर्शन से प्रभावित युवा भी इनका प्रयोग करना शान समझते हैं। हिंसा में रोमांच ढूंढते युवा न तो सामने वाले की जान की परवाह करते हैं और न वारदात के बाद होने वाले अपने अंजाम की चिंता। फिल्मों के प्रभाव से, दोस्त मित्रों के उकसाने पर, उत्सुकतावश अथवा खुद ही शेखी मार कर दिलेरी दिखाने के चक्र में युवा नशे के दलदल में धँस जाते हैं। इस दलदल में फंसने के बाद वह अपने जिन्दगी के उद्देश्य से भटक जाते है।

नशे की लत पूरा करने के लिए गुनाह की दुनिया उन्हें अपने आगोश में ले लेती है। फिर कोई विरला ही नशे के जाल में से निकल पाता है। नशे के सेवन से काल के मुँह में जाती अनमोल जवानियाँ, बिलखते बचपन, जवान मौतों को कमजोर कंधों पर ढ़ोते बुढ़ापे और विलाप करती औरतों की सफेद चुनरियों के बारे में रोजाना अखबारों के पन्ने लहू लुहान रहते हैं।

युवा वर्ग की अपने बजुर्गों और शिक्षकों के तजर्बे के प्रति बेरुखी भी उनके विकास के रास्ते की रुकावट बन जाती है। बजुर्गों की तजर्बे से भीगी मीठी कड़वी नसीहतें सुनने का न तो उनके पास सब्र है और न ही समय। कॉलेजों में शिक्षकों से बेमतलब उलझते युवा और ‘सब कुछ जानते हैं’ की गलतफहमी उनके उज्वल भविष्य के कई रास्ते बंद कर देती है।

पुरानी पीढ़ी और शिक्षकों के प्रति सन्मान की भावना रखते हुए उनकी शिक्षाओं से मार्गदर्शन ले कर अपने होंसले, जोश और ज्ञान से देश को तरक्की की ऊँचाइयों पर ले जाए और देश की उन्नति पर लगे ताले को अपनी मेहनत और पसीने की चाबी से खोल दे।

कुलदीप शर्मा

 

 

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