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सुनहरा अवसर है कायाकल्प का

Round, Daughters, Come Again, Nupur Gautam, Haryana

साल भर में कुछ पर्व ऐसे होते हैं, जो मन-बुद्धि और शरीर को पवित्र करने और नवीन ताजगी भरने के लिए ही आते हैं। सदियों से मौसम और प्रकृति के परिवर्तनों के अनुरूप सृष्टि के जीवों खासकर इंसान को परिष्कृत और शुद्ध-बुद्ध करने के लिए कुछ-कुछ समय के अन्तराल में ऐसे उत्सव, पर्व और त्योहारों का निर्धारण किया गया है, जिनके माध्यम से इंसान के नवीनीकरण का पूरा और पक्का विधान चला आ रहा है।
पुराने जमाने से यही सब कुछ विधान चलता आ रहा है और इसी से इंसान की जीवनीशक्ति, ओज-तेज और सभी प्रकार की शक्तियों का पुनर्भरण होता रहा है। हमारे पुरखों के पास वे सब नुस्खे थे, जिनको अपनाकर वे शतायु और इससे भी अधिक काल तक पूरी जीवन्तता के साथ ऐतिहासिक एवं युगीन व्यक्तित्व के रूप में अपनी यादगार छाप छोड़ने में समर्थ हुआ करते थे।
हर प्राणी के लिए यह जरूरी होता है कि वह अपने मन और बुद्धि से पवित्र रहे, शरीर को शुचिता से भरा रखे, तभी वह ऊर्ध्वगामी हो सकता है। ऊपर के लोकों की प्राप्ति के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि हम उस स्तर को प्राप्त करें, जोकि पूर्ण शुचिता से भरा और शुद्ध-बुद्ध हो। इसके लिए यह नितान्त जरूरी है कि हमारे भीतर उन तत्वों का पूर्ण सफाया हो जिनकी वजह से किसी न किसी प्रकार के भार का अनुभव हो। हर प्रकार के पदार्थ यानि की पृथ्वी तत्व से उत्पन्न वस्तु या मिश्रण का अपना स्वाभाविक भार होता है। इस भार को साधना या उपवास के माध्यम से जलाया जाकर न्यूनतम स्तर तक लाया जा सकता है।
हमें यदि किसी पर्वत शिखर का आरोहण करना हो तो उसके लिए यह नितान्त जरूरी होता है कि हमारे पास कम से कम भार हो। इस स्थिति को भांप कर हम अपने साथ कम से कम सामान रखते हैं ताकि आसानी से पहाड़ पर चढ़ा जा सके। इसके ठीक विपरीत यदि हमें यदि मैदानी इलाकों का वाहन द्वारा सफर करना हो, तो हम बहुत सारा सामान गाड़ी मेंं रखकर चलते हैं और उन सभी प्रकार की वस्तुओं और कपड़ों-लत्तों को साथ रखते हैं, जिनकी हमें आवश्यकता होती है। बहुधा अपनी फैशनी वस्तुओं को भी साथ ले जाते हैं, क्योंकि इसका भार हमें वहन करने की जरूरत नहीं होती, बल्कि वाहन का सुख प्राप्त रहता है।
लेकिन जब हम ईश्वरीय अनुकंपा, दैवत्व और दिव्यत्व की प्राप्ति करने की यात्रा का मार्ग चुनते हैं तब हमें सांसारिक पदार्थों से लेकर विचारों तक को अपने से दूर रखने के प्रयास करने की आवश्यकता होती है।
इसी प्रकार नवरात्रि व आगे आने वाले पर्व दशहरा, दीपावली भी अपने आप में दिव्यताओं को पाने का वह मौका है, जिसमें हमें शरीर की शुद्धि के साथ ही मन के विकारों और दिमाग की हलचलों को पूर्णत: समाप्त कर अपने आपको दैवीय चिंतन और दिव्य ऊजार्ओं को पाने का अवसर मिलता है। यह हम पर निर्भर है कि हम इन त्यौहारी दिनों को सामान्य दिनों की तरह लेकर वैसे ही टाईमपास जिन्दगी जीते रहें या शक्ति तत्वों से भरपूर इन दिनों का पूरा-पूरा फायदा उठाएं।
आजकल भारीपन आम आदमी समस्या होता जा रहा है। कोई पतला हो या मोटा अथवा किसी भी कद-काठी का हो, उसकी समस्या यह है कि शरीर स्वाभाविक भार को भूलकर अस्वाभाविक रूप से भारी-भारी लगता है। इन लोगों के लिए हल्कापन लाने का सर्वाधिक अवसर है नवरात्रि। इसके माध्यम से व्रतोपवास करते हुए जहां शरीर के भीतर जमा अनावश्यक तत्वों का दहन होता है, वहीं साधना और उपासना आदि मन-मस्तिष्क के विकार दूर होते हैं और अलग ही तरह की ताजगी प्राप्त होती है।
व्रतोपवास का यह अर्थ नहीं कि फलाहार के रूप में हम ठूंस-ठूंस कर खाते-पीते रहें और अपने आपको महान व्रती समझते रहें।
शरीर के शुद्धिकरण के लिए जो कुछ जरूरी है, उसका पूरा-पूरा ध्यान रखें और स्वयं के तमाम प्रकार के भारीपन को दूर करते हुए जीवन को आनंददायी बनाएं। अत: इन त्यौहारी दिनों में अपने तन व मन को स्वस्थ व पवित्र बनाने का अवसर है। उचित यही होगा कि इसका भरपूर लाभ उठाया जाए।

डॉ. दीपक आचार्य

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