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सम्पूर्ण क्रान्ति के प्रणेता ‘लोकनायक जयप्रकाश नारायण’

भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रान्ति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं, क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं, जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, ह्यसम्पूर्ण क्रान्तिह्ण आवश्यक है। जुल्म के खिलाफ जब हर उपाय कारगर सिद्ध न हो, तो हथियार उठा लेना जायज है। यह बात हर युग एवं समय में सार्थक सिद्ध हुई है एवं जब भी इस रास्ते को अपनाया गया, एक परिवर्तन देखने को मिला। वाणी में जो शक्ति है वह किसी और चीज में नही। शायद इससे ही प्रभावित होकर जयप्रकाश नारायण ने 5 जून, 1975 को पटना के गांधी मैदान में सम्पूर्ण क्रांति की घोषणा की थी।
जयप्रकाश नारायण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे जिन्हें 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। वे पहले ऐसे समाज-सेवक थे, जिन्हें लोकनायक के नाम से भी जाना जाता है। जयप्रकाश नारायण का जन्म 11 अक्टूबर 1902 को बिहार में सारण जिले के सिताबदियारा गांव में हुआ था। पटना मे अपने विद्यार्थी जीवन में जयप्रकाश नारायण ने स्वतंत्रता संग्राम मे हिस्सा लिया। जयप्रकाश नारायण बिहार विधापीठ में शामिल हो गए, जिसे युवा प्रतिभाशाली युवाओं को प्रेरित करने के लिए डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और गांधी जी के एक निकट सहयोगी रहे सुप्रसिद्ध गांधीवादी डा.अनुग्रह नारायण सिन्हा जो बाद मे बिहार के पहले उप मुख्यमंत्री रहे द्वारा स्थापित किया गया था।
एक समय उनका सम्पर्क गांधी जी के साथ काम कर रहे जवाहर लाल नेहरु से हुआ। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का हिस्सा बने। 1932 मे गांधी, नेहरु और अन्य महत्वपूर्ण कांग्रेसी नेताओ के जेल जाने के बाद, उन्होंने भारत मे अलग-अलग हिस्सों मे संग्राम का नेतृत्व किया। अन्तत: उन्हें भी सितम्बर 1932 मे मद्रास में गिरफ्तार कर लिया गया और नासिक जेल में भेज दिया गया। जहां उनकी मुलाकात एम. आर. मासानी, अच्युत पटवर्धन, एन. सी. गोरे, अशोक मेहता, एम. एच. दांतवाला, चार्ल्स मास्कारेन्हास और सी. के. नारायणस्वामी जैसे उत्साही कांग्रेसी नेताओं से हुई। जेल में इनके द्वारा की गई चचार्ओं ने कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी को जन्म दिया। लेकिन जब कांग्रेस ने 1934 मे चुनाव मे हिस्सा लेने का फैसला किया तो जेपी और कांग्रेस सोसलिस्ट पार्टी ने इसका विरोध किया।
स्वाधीनता के आंदोलनों में अनेक बार हिस्सा लेने वाले, अनेक बार जेल जाने वाले जेपी ने राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए हर कष्ट सहन किया। इस कार्य में भागीदारी निभाई उनकी सहधर्मिणी प्रभावती देवी ने। 1948 मे उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी दल का नेतृत्व किया और बाद में गांधीवादी दल के साथ मिलकर समाजवादी सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की। 19 अप्रैल 1954 में गया, बिहार में उन्होंने विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन के लिए अपना जीवन समर्पित करने की घोषणा की। लेकिन 1960 के दशक के अंतिम भाग में लोगों के दबाव में वे राजनीति में पुन: सक्रिय हुए।
1975 में इंदिरा गांधी ने आपात्काल की घोषणा की जिसके अन्तर्गत जेपी सहित 600 से भी अधिक विरोधी नेताओं को बंदी बनाया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई। जेल मे जेपी की तबीयत और भी खराब हुई। 7 महीने बाद उनको मुक्त कर दिया गया। 1977 जेपी के प्रयासों से एकजुट विरोध पक्ष ने इंदिरा गांधी को चुनाव में हरा दिया। जयप्रकाश नारायण का निधन उनके निवास स्थान पटना में 8 अक्टूबर 1979 को हृदय की बीमारी और मधुमेह के कारण हुआ। उनके सम्मान में तत्कालीन प्रधानमंत्री चरण सिंह ने 7 दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की थी, उनके सम्मान में कई हजार लोग उनकी शोक यात्रा में शामिल हुए। अटलबिहारी बाज΄ोयी सरकार द्वारा 1999 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया। 1965 में उन्हें समाजसेवा के लिये मैगससे पुरस्कार भी प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल भी उनके नाम पर है।

रमेश सर्राफ धमोरा

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