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म्यांमार आॅप्रेशन के दूरगामी परिणाम

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भारतीय सेना ने एक बार फिर प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन एनएससीएन खापलांग गुट पर अचानक हमला करके भारी क्षति पहुंचाई है। म्यांमार सीमा के निकट हुई इस मुठभेड़ में कई आतंकवादी मारे गए हैं। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भी पिछले साल 28-29 सितंबर की रात सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सेना की यह एक और बड़ी कार्रवाई है।

इससे पहले जून 2015 में सेना ने म्यांमार की सीमा में घुसकर इसी संगठन के कई शिविरों को तबाह कर दिया था। दरअसल खापलांग गुट के उग्रवादियों ने सेना की टुकड़ी पर गोलियां दागी थीं। जवाबी कार्रवाई करते हुए पूर्वी कमान के जवानों ने तुरंत मोर्चा संभाला और तत्काल मुंहतोड़ जवाब दे दिया।

इस कार्रवाई में सेना को कोई हानि नहीं हुई है। भारत सरकार ने आतंकियों को मुंहतोड़ उत्तर देने की जो रणनीति अपनाई है, उससे देश की जनता और सेना में यह संदेश गया है कि भारत सरकार में निर्णय लेने की क्षमता भी है।

एनएससीएन के मुखिया एसएस खापलांग की 10 जून 2017 को मृत्यु म्यांमार के अस्पताल में हो चुकी है। बावजूद इसके, यह गुट नागालैंड का सबसे खतरनाक अलगाववादी गुट है। दशकों से यह गुट नागालैंड को भारत से अलग करने की मांग कर रहा है, जबकि नागालैंड के अन्य विद्रोही गुट अब सरकार से समझौते के पक्ष में आ गए हैं।

यही एक ऐसा गुट है, जो शांति समझौते का विरोध कर रहा है। इस गुट में अभी भी 1500 विद्रोहियों की संख्या बताई जाती है। भारत और म्यांमार के बीच 1640 किलोमीटर लंबी सीमा रेखा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड व मणिपुर से सटी है। इतनी लंबी सीमा की सुरक्षा करना बीएसएफ को मुश्किल होती है। लिहाजा ये उग्रवादी मौका पाते ही सुरक्षा बलों पर हमला बोल देते हैं। किसी दूसरे देश की सीमा में घुसकर या सीमा पर डटे रहकर आतंकवादियों और उनके शिविरों को नष्ट करना कोई मामूली काम नहीं है, क्योंकि एक देश के सीमाई देशों से मैत्रीपूर्ण संबंध होते है।

म्यांमार की सीमा चीन से जुड़ी है और वहां बड़ी संख्या में चीन के प्रशंसक लोग भी रहते हैं। वैसे उग्रवादियों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई को संयुक्त राष्टÑ संघ की अनुमति मिली हुई है। भारत और म्यांमार के बीच भी ऐसी कार्रवाइयां करने की संधि है। इन सैद्धांतिक सहमतियों के चलते ही भारतीय सेना म्यांमार की सीमा से आतंकी शिविरों पर हमला बोलने में सफल हो पाई।

चीन भी इन अलगाववादियों को हथियार उपलब्ध करता है। हालांकि बांग्लादेश में शेख हसीना के स त्ता में रहते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बांग्लादेश यात्रा के बाद हालात बदले हैं। उल्फा को यहां से मदद और पनाह मिलती रही है, लेकिन अब लगभग विराम लग गया है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद भूटान की पहली विदेश यात्रा करके इसे अपना खास मित्र देश बना लिया है। चीन से हुए डोकलाम मुद्दे पर भी भारत सरकार ने भूटान को यह जता दिया है कि वह हर संकट की घड़ी में उसके साथ है।

पूर्वोत्तर में उग्रवादियों की ताकत इसलिए बढ़ गई, क्योंकि यहां बिखरे तमाम उग्रवादी संगठनों ने मिलकर एक साझा संगठन कुछ समय पहले बना लिया है और तभी से यह सेना पर हमले तथा अन्य हिंसक वारदातें करने में लगा है। इनमें मणिपुर में सक्रिय गुटों के अलावा कमतापुर लिबरेशन आॅगनाइजेशन, नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॅफ नगालिम का खापलांग गुट एनडीएफबी का सोनबिजित गुट और उल्फा का परेश बरुआ गुट शामिल हैं। इस समय इनमें सबसे ताकतवर गुट एनएससीएन है।

इसमें 1500 लड़ाकू जवान हैं और करीब 1000 हजार शिविरों में नए उग्रवादी तैयार किए जा रहे हैं। फिलहाल इस आकस्मिक और अप्रत्याशित आॅपरेशन से उग्रवादी तितर-बितर भी हुए और इनका मनोबल भी टूटा है, क्योंकि इन्हें इतनी त्वरित और निर्णायक सैन्य कार्रवाई की उम्मीद नहीं थी, वह भी म्यांमार की सीमा में।

इस कार्रवाई से पाकिस्तान भी सकते में है। शायद इसीलिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा आसिफ को न्यूयॉर्क में कहना पड़ा है कि ‘मुंबई आतंकी हमलों का मास्टरमाइड हाफिज सईब आतंकी संगठन हक्कानी नेटवर्क और लश्कर-ए-तैयबा उनके देश के लिए बोझ बन गए है। एशिया सोयायटी फोरम को संबांधित करते हुए आसिफ ने इनसे छुटकारा पाने के लिए हमें समय चाहिए।’ पाकिस्तान ने यह लाचारी भारत सरकार द्वारा सैन्य बलों को पूरी स्वतंत्रता दे दिए जाने कारण जताई है।

क्योंकि अब सेना की आक्रामक कार्रवाईयां निरंतर देखने में आ रही हैं। पाकिस्तान भारत का खुला दुश्मन है, जबकि म्यांमार मित्र देश है। भारत-पाक सीमा पर न केवल पाक सेना मुस्तैद है, बल्कि सेना की वर्दी में बड़ी संख्या में हथियार बंद आतंकवादी भी तैनात हैं। लिहाजा अमेरिका की वायु सेना ने जिस तरह से पाक के ऐबटाबाद में उतरकर ओसामा-बिन-लादेन को निपटा दिया था, उसी तर्ज पर भारत का दाऊद या लखवी को निपटाना थोड़ा मुश्किल है?

पाक की परमाणु हथियार के इस्तेमाल की धमकी को भी महज गीदड़ भवकी मान लेना एक भूल होगी? क्योंकि पाक इन हथियारों का इस्तेमाल आंतकवादियों के लिए कर सकता है। इसलिए परवेज मुर्शरफ ने कहा भी था कि हमारे परमाणु बम शब-ए-बारात में फोड़ने के लिए नहीं हैं। आतंकियों के हाथ परमाणु बम देना इसलिए मुश्किल है, क्योंकि पाक आतंकियों का सरंक्षक देश होने के साथ आतंक से पीड़ित देश भी है। ऐसी विपरीत परिस्थिति में आतंकियों के हाथ परमाणु हथियार लगते हैं, तो ये स्वयं पाक के लिए भी घातक साबित हो सकते हैं।

इसलिए भारत पाकिस्तान की ओर से सचेत भी है। बावजूद भारत पीओके में जाकर आतंकी शिविरों पर सर्जिकल स्ट्राइक की तर्ज पर हमला जरूर कर सकता है। ऐसे हमलों से ही भारत सरकार का वह संकल्प पूरा होगा, जिसमें आतंकवाद और उग्रवाद के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता की मंशा अंतर्निहित है।

-प्रमोद भार्गव

 

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