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होड़ समाज को रही है तोड़!

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होड़ ने पूरे समाज को तोड़ दिया है। यह होड़ जोड़ भी सकती थी। ऐसा तभी होता, जब इसकी दिशा सही होती। दरअसल गति के चक्कर में प्रगति और दुर्गति का अंतर समाप्त होता जा रहा है। अधिकाधिक पैसा अर्जित करने और दिखावा करने की होड़ लगी है। स्थिति ‘आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास’ वाली हो गई है।

ज्यादा से ज्यादा अर्जित करने की होड़ में जीवन की गुणवत्ता और गरिमा का कचूमर निकल गया है। जरूरतों को पूरा करने के लिए बनाया गया बाजार बादशाह बन गया है। जैसे नौकर मालिक को टंगड़ी मार कर खुद मालिक बन बैठा हो। जैसे अंग्रेज आए थे व्यापार करने और धीरे-धीरे हमारी कमजोरियों का फायदा उठाते हुए शासक बन बैठे थे। ठीक वैसे ही बाजार ने किया है।

बाजार की ताकतों ने इन्सानियत को ठेंगा दिखाते हुए वर्चस्व स्थापित कर लिया। बाजार ने दिखावा करना ही नहीं सिखाया। दिखावे की होड़ करना भी सिखा दिया। दिखावे की चाहत ऐसी है कि जाति की तरह जाती ही नहीं। घर ऐसा चाहिए कि अंदर शांति मिले ना मिले, लेकिन बाहर से देखने वाले का मन बेचैन हो उठे। आंखों में किरकिरी की तरह चुभने लगे।

उसकी छाती पर सांप लोटने लगें। प्रवेश द्वार ऐसा ऊंचा और भव्य चाहिए कि हर कोई देखता ही रह जाए। आराम व सोने के लिए घर बनाया था, लेकिन घर सोने का बनाने की होड़ लग गई। रावण के विशाल पुतलों को हर वर्ष फूक कर पर्यावरण का दम निकालने वाले रावण की तरह सोने की लंका बनाने पर आमादा हैं। सोने की लंकाओं में नींद तो क्या आनी थी, ईर्ष्या, द्वेष, नफरत, अनिद्रा सहित अनेक प्रकार की मानसिक विकृतियां फल रही हैं।

इस होड़ के युग में विवाह संबंधों का जरिया नहीं, दिखावे का मौका है। तर्क यह कि आखिर इसी लिए तो कमाते-धमाते हैं। शादी में ही नहीं दिखाया, तो फिर किस काम का। कुतर्क गढ़ते-गढ़ते शादी को सौदेबाजी और शक्ति प्रदर्शन में तब्दील कर दिया है। ऐसे में इन्सानियत कहां बचनी थी। जिन लोगों को भोजन के आधिक्य के कारण खाया-पीया हजम नहीं होता,

उनके लिए सैंकड़ों प्रकार के व्यंजन तैयार कर रखे हैं। टैंट में कोई भूखा न आ जाए, इसके लिए सिक्योरिटी गार्ड तैनात कर रखे हैं। सजे-धजे लोग इसे भी एक जिम्मेदारी कहते हैं। आलीशान शादी विवाह की जिम्मेदारी के लिए भले ही बरसों पहले उन्होंने सामाजिक जिम्मेदारी को अलविदा कह दिया हो। भ्रष्टाचार को गरियाते-गरियाते भ्रष्टाचार को ही आलिंगन कर लिया हो।

लूट-खसोट कर आए, चाहे जैसे भी पैसा आए। जो पैसा साधन था, वह साध्य बन गया। रूपयों के ढ़ेर पर बैठा या फिर इसके लिए उतावले व्यक्ति में मानवीय मूल्यों का क्या बनेगा। इसका तो खुद ही अंदाजा लगा लीजिये। हर क्षेत्र में होड़ मची है। मेहनत-मजदूरी करके शांति से जीवन बसर करने वाले किसान की हालत सबसे अधिक पतली हो गई है।

वह अधिक पैदावार करने के लिए कर्ज ले रहा है। धरती माता की छाती को रसायनों व कीटनाशकों से छलनी कर रहा है। अनाज, फल-सब्जियां पैदा करने के स्थान पर जहर पैदा कर रहा है। सभी एक मुगालता लिए जी रहे हैं। किसान को मुगालता है कि वह अन्नदाता है, लेकिन वह जहरदाता बनता जा रहा है।

लोगों को भ्रम है कि वे हरी सब्जियां खाकर सेहत बना रहे हैं। लेकिन वास्तव में सेहत के साथ खिलवाड़ हो रहा है। एक किसान ने बताया कि रसायनिक खादों और कीटनाशकों की नई-नई कंपनियां आ रही हैं। वे किसानों को प्रलोभन दे रही हैं। प्रलोभन और बहकावे के चक्कर में धरती और खेती का घनचक्कर बन गया है।

 

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