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तकनीकी संस्थानों की फीकी पड़ती चमक

2016-17 के लिए दुनिया के शीर्ष शिक्षण संस्थानों की क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैकिंग्स में भारत के सभी आईआईटी और नामी-गिरामी बेंगलुरु का इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ साइंस का पिछले साल के मुकाबले कई पायदान नीचे खिसकना इस बात का संकेत है कि इन संस्थानों की चमक फीकी पड़ने लगी है।
आंकड़ों पर गौर करें तो गत वर्ष की रैकिंग्स में 179वां स्थान पर रहा दिल्ली आईआईटी खिसककर 185वां स्थान पर आ गया है। इसी तरह 202 वां स्थान पर रहा बांबे आईआईटी 219 वां, 286 वें स्थान पर रहा खड़गपुर 313 वां और 272 वां स्थान पर रहा कानपुर 302 वां एवं 147 वां स्थान पर रहा आइआइएससी बेंगलुरु 152 वां स्थान पर पहुंच गया है। इस सूची में आईआईटी मद्रास की स्थिति में पिछले साल की तुलना में सुधार हुआ है। पांच पायदान उपर चढ़कर यह 249 वें स्थान पर पहुंच गया है।
गौरतलब है कि इस सर्वे में 81 देशों के 3800 शिक्षण संस्थानों को शामिल किया गया और 916 शिक्षण संस्थानों की रैकिंग जारी हुई। इस सूची में पहला स्थान अमेरिका के मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी को हासिल हुआ है। क्रमश: दूसरा, तीसरा, चौथा व पांचवा स्थान स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी, हार्वड यूनिवर्सिटी, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और कैल्टेक यूनिवर्सिटी को प्रा΄त हुआ है। भारत के इन नामी-गिरामी शिक्षण संस्थानों का शीर्ष रैकिंग्स में न आना एक किस्म से उनकी साख को बट्टा लगने जैसा है। इसलिए और भी कि इन संस्थानों के गिरते स्तर के कारण हर वर्ष 60 हजार भारतीय छात्र इंजीनियरिंग पढ़ने के लिए विदेशी शिक्षण संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं।
एक वक्त था जब इंजीनियर बनने का सपना देखने वाला हर छात्र यही चाहता था कि उसे इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ टेक्नोलॉजी यानी आईआईटी में दाखिला मिले। लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में युवाओं की सोच में बदलाव आया है और उनकी नजर में अब आईआईटी को लेकर पहले जैसा आकर्षण नहीं है। इसका मूल कारण इन संस्थानों में संसाधनों की कमी और शिक्षकों का अभाव है।
आश्चर्य यह है कि सरकार आइआइटी को आधुनिक संसाधनों को लैस करने और शिक्षकों की कमी की पूर्ति की प्राथमिकता पर ध्यान टिकाने के बजाए 2020 तक एक लाख आईआईटी सीटें बढ़ाने का एलान कर दिया है। यह एक तरह से संस्थानों पर अतिरिक्त बोझ होगा, जिसे संभाल पाना उनके लिए आसान नहीं होगा। यहां सवाल सिर्फ संसाधनों और शिक्षकों की कमी तक ही सीमित नहीं है। शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक भारत में हर वर्ष लाखों इंजीनियरिंग ग्रेजुएट निकलते हैं लेकिन सभी को रोजगार नहीं मिलता है। आईआईटी से हर साल 3000 से 3500 इंजीनियर निकलते हैं जिनमें से 2000 विदेश चले जाते हैं और 500 के करीब मैनेजमेंट कोर्स करने लगते हैं। इसका कारण देश में रोजगार की कमी तो है ही साथ ही गुणवत्तापरक शिक्षा का अभाव भी है।
पिछले दिनों प्रकाश में आयी एस्पाइरिंग माइंड्स की नेशनल इम्पालयबिलिटी रिपोर्ट में कहा गया कि इंजीनियरिंग डिग्री रखने वाले स्रातकों में कुशलता की कमी है और उनमें से करीब 80 फीसद स्रातक रोजगार के काबिल नहीं हैं। यह रिपोर्ट देश भर के 650 से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेजों के तकरीबन डेढ़ लाख इंजीनियरिंग छात्रों के अध्ययन पर आधारित है। चंद स΄ताह पहले एसोचैम की एजुकेशन कमेटी के सर्वेक्षण से भी उद्घाटित हुआ कि देश में चल रहे संस्थानों से निकलने वाले ज्यादतर छात्र-छात्राएं कहीं भी रोजगार पाने के लायक नहीं हैं।
पिछले दो वर्षों के दौरान देश के विभिन्न राज्यों में बड़े ΄ौमाने पर इंजीनियरिंग कालेज बंद हुए हैं। इसके अलावा शिक्षा की निम्न गुणवत्ता की वजह से 2014 से 2016 के बीच केर्पस रिक्रूटमेंट में भी 45 फीसद की गिरावट आयी है। दरअसल इसके लिए इंजीनियरिंग शिक्षा के सिलेबस का आउटडेटेड होना भी एक महत्वपूर्ण कारण है, जिसका अपडेट किया जाना बहुत जरुरी है।

रीता सिंह

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