लेख

सुकमा की शहादत का मुंहतोड़ जबाव हो

Sukma Attack

ललित गर्ग

Sukma Attack छत्तीसगढ़ के सुकमा क्षेत्र में नक्सलवादियों ने 26 सीआरपीएफ जवानों की नृशंस हत्या करके करोड़ों देशवासियों को आहत किया है। इस प्रकार की अमानवीय एवं नृशंस हत्या ने हर बार की तरह अनेक सवाल पैदा किये हैं।

मुख्य सवाल तो यही है कि क्या हमारे सुरक्षाकर्मियों की जान इतनी सस्ती है कि उन्हें इस तरह बार-बार नक्सलियों से जूझना पड़ता है? क्यों अपनी जान देनी पड़ती है? बार-बार सरकार का यह कहना कि शहीदों की शहादत व्यर्थ नहीं जायेगी, तो फिर हम कब इस शहादत का मुंह तोड़ जबाव देंगे? पुरानी घटना के घाव सूखते नहीं कि एक और वीभत्स एवं नृश्ांस कांड सामने आ जाता है।

Sukma Attack भय व आक्रोश आना स्वभाविक

आखिर कब नक्सलियों की इन चुनौतियों का जबाव देने में हम सक्षम होंगे? क्या हो गया है हमारे देश को? कभी कश्मीर में आतंकवाद, पूर्वोत्तर में सशस्त्र विद्रोह और मध्य भारत में नक्सलवाद। लहूलुहान हो चुके इस देश के लोगों के दिल और दिमाग में बार-बार करतब दिखाती हिंसा को देखकर भय और आक्रोश होना स्वाभाविक है, विनाश एवं निर्दोष लोगों की हत्या को लेकर चिन्ता होना भी जायज है। इस तरह निदोर्षों को मारना कोई मुश्किल नहीं, कोई वीरता भी नहीं। पर निर्दोष जब भी मरते हैं, पूरा देश घायल होता है।

नन्हें हाथों में थमा देते हैं हथियार

सवाल यह भी उठता है कि इस प्रकार के नक्सलियों एवं नक्सलवाद से कैसे निपटा जाए। कौन मदद दे रहा है इन नक्सलियों को। किसका दिमाग है जिसने अपने हितों के लिए कुछ लोगों को गुमराह कर उनके हाथों में हथियार थमा दिए और वे राष्ट्र के अनुशासित व राष्ट्रभक्त जवानों को बार-बार निशाना बनाते हैं और सकते में डाल देते हैं।

इस तरह का नक्सलवाद एवं आतंकवाद सैकड़ों लोगों को लील रहा है। हजारों को असहाय बना रहा है। सुकमा में हुए नक्सली हमले ने एक बार फिर साबित किया है कि बस्तर के इस इलाके में किसका सिक्का चलता है। यहां नक्सली कमांडर मडवी हिडमा की तूती बोलती है।

Sukma Attack हिडमा हमले का मास्टरमाइंड

अब तक मिले सुरागों से पता चलता है कि हिडमा ही इस हमले का मास्टरमाइंड है। मडवी हिडमा उर्फ हिडमन्ना की उम्र 25 साल है। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक वो सुकमा में जंगरगुंडा इलाके के पलोडी गांव का रहने वाला है। इस इलाके में वह हिडमालु और संतोष के नाम से भी जाना जाता है। बीते करीब एक दशक के दौरान उसका खौफ इस कदर फैला कि अब वो इस इलाके का मोस्ट वॉन्टेड नक्सली है। पुलिस ने उस पर 25 लाख रुपये के ईनाम का ऐलान किया है। क्या इनाम की घोषणा इस विकराल समस्या का समाधान है?

राष्ट्रीयता की भावना तो पहली शर्त

देश में हजारों निर्दोष लोगों की जान जा चुकी है और मौत के आंकड़े डराने वाले हैं। आतंकवाद हो या नक्सलवाद, सुरक्षाकर्मियों ने लगातार अपनी शहादतें दी हैं। देश के सुरक्षाकर्मियों को मारकर चलने वाले इस खौफनाक एवं हिंसक मंजर को आन्दोलन कैसे कहां जा सकता है?

आन्दोलन तो लोकतांत्रिक तरीके से जायज मांगों के लिये किये जाने वाला संघर्ष होता है, जिसमें राष्ट्रीयता की भावना तो पहली शर्त है। नक्सलियों की अब तक की स्थितियों को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि वे लूटपाट करने वाले गिरोह है, आतंक फैलाने वाले देशद्रोही है, आम-जनता को डरा-धमका कर लूटना उनकी दिनचर्या है।

Sukma Attack देश की संपत्ति को पहुंचा रहे नुकसान

क्षेत्र-विशेष में उनका पूरा आतंक छाया रहता है, इनको बिना पैसे दिए कोई भी काम?नहीं कर सकता। कोई भी व्यापारी बिना पैसे दिए व्यापार नहीं चला सकता। रेल पटरियों, पुलिस थानों, स्कूलों, अस्पतालों को उड़ाते हैं, करोड़ों की देश की सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाते है, विकास कार्यों को बाधित करते हैं, सड़कें नहीं बनने देते।

नक्सली संगठन और कुछ नहीं वन एवं खनिज संपदा को लूटने एवं उगाही करने वाले ऐसे माफिया गिरोह बन कर रह गये हैं जिनकी सभ्य समाज में कोई जगह नहीं हो सकती। भूख और गरीबी से लोहा लेने और बंदूक के जोर पर शोषक दुनिया को बदलने का सपना लिए रक्त क्रांति की दुनिया में प्रवेश करने से इस आन्दोलन का मूल हार्द ही भटक गया है, जो किसी से छिपा नहीं।

दृढ़ इच्छा-शक्ति दिखानी होगी

सरकार से सीधे टकराने एवं हिंसा का तांडव काने वाले ऐसे नक्सलियों के खिलाफ सीधी आर-पार की लड़ाई जरूरी हो गयी है। सुकमा पर रोषभरी टिप्पणियों व प्रस्तावों से नक्सलवाद से लड़ा नहीं जा सकता। नक्सलवाद से लड़ना है तो दृढ़ राजनैतिक इच्छा-शक्ति दिखानी ही होगी। सरकार अगर ईमानदारी से ठान लें तो नक्सलवाद पर काबू पाया जा सकता है।

जैसे शांति, प्रेम खुद नहीं चलते, चलाना पड़ता है, ठीक उसी प्रकार नक्सलवाद भी दूसरों के पैरों से चलता है। जिस दिन उससे पैर ले लिए जाएँगे, वह पंगु हो पाएगा। और उसी दिन वास्तविक रूप में नक्सलवाद का अंत होना शुरू होगा। अन्यथा नक्सलियों को महज भटके हुए नागरिक मानना एक किस्म का पलायनवाद ही नहीं बल्कि एक विकराल समस्या के प्रति आंख मूंदना ही कहा जायेगा।

Sukma Attack 230 में दबदबा कायम

नक्सलवादियों की हिंसक रचना एवं संगठन अर्द्धसैनिक बलों एवं सरकार की रचना से ज्यादा सशक्त, कारगर एवं प्रभावी क्यों है। वे हिंसा की ऐसी नई-नई तरकीबें कहां से लाते हैं कि सुरक्षा बलों से हमेशा एक कदम आगे रहते हैं।

जब भी नक्सलियों को प्रतीत होता है कि अभी वे कमजोर है वे विकेन्द्रित हो जाते हैं, फिर वे धीरे-धीरे अपनी शक्ति इकट्ठी करते हैं, संगठित होते हैं। जब उन्हें ताकत मिल जाती है तो फिर हिंसक वारदात कर देते हैं। यह बड़ा षडयंत्र है इसलिये इसका फैलाव भी बढ़़ता जा रहा है। अपनी जबर्दस्त रणनीति के चलते नक्सलियों ने देश के कुल करीब 620 जिलों में से 230 जिलों में अपना दबदबा कायम किया हुआ है।

कब तक घटनाएं देखते रहेंगे

नक्सलियों के गढ़ों में हर सड़क बारूदी हो चुकी है, कोई इलाका सुरक्षित नहीं, किसी का भी जीवन सुरक्षित नहीं। सुकमा में नक्सलियों ने ऐसे समय में खूनी कार्रवाई की है, जब राज्य सरकार माओवाद पर नियंत्रण पाने के दावे कर रही थी। कोई ऐसा दावा हो, या सड़के बनना हो या नक्सलवाद को लेकर कोई बड़ी कार्रवाई की भनक- जब-जब ऐसा होता है, नक्सली अपनी मौजूदगी का अहसास कराने के लिए इस तरह की कार्रवाई को अंजाम देते हैं।

कब तक हम इन घटनाओं को होते हुए देखते रहेंगे। कब तक केन्द्र सरकार राज्य सरकार पर और राज्य सरकार केन्द्र सरकार पर बात टालती रहेगी। कब तक सुस्ती और नक्सली हिंसा से निपटने के मामले में कामचलाऊ रवैये अपनाया जाता रहेगा।

Sukma Attack जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता

न जाने कब से यह कहा जा रहा है कि सीआरपीएफ के जवान छापामार लड़ाई लड़ने का अनुभव नहीं रखते, फिर ऐसे जवानों को क्यों नहीं तैनात किया जाता जो इस तरह की छापामार लड़ाई में सक्षम हो, जो नक्सलियों को उनकी ही भाषा में सबक सिखा सके? इसके साथ ही नक्सलियों के खिलाफ स्थानीय स्तर पर भी सशक्त जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। उनकी कमजोरियों को स्थानीय जनता के बीच लाया जाना चाहिए। नक्सली संगठनों की महिला कार्यकतार्ओं के साथ पुरुषों द्वारा किये जाने वाले शारीरिक एवं मानसिक शोषण को उजागर किया जाना चाहिए।

रणनीति पर अमल हो

जैसाकि पहले से तय है कि दिल्ली में नक्सल प्रभावित राज्यों की बैठक आयोज्य हैं, इस बैठक में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों एवं राज्यों के संबंध में प्रभावी निर्णय लिये जाने जरूरी है। नक्सलियों से निपटने के लिए नई रणनीति बनाने के साथ ही यह भी जरूरी है कि उस पर कारगर तरीके से अमल भी हो।

नासूर बन गए नक्सलियों से सख्ती से निपटने में सेना के हस्तक्षेप से संकोच क्यों? जब हम आतंकवाद के लिये सेना का उपयोग कर सकते हैं तो यहां क्यो नहीं? दरअसल हमारी राजनैतिक दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव एवं आधी-अधूरी सोच ने ही नक्सलियों को दुस्साहसी बनाया है।

Sukma Attack देश के अस्तित्व पर एक बड़ा दाग

तभी वे न तो हथियार डालने के लिए तैयार हैं और न ही बातचीत करने के लिए, फिर भी पता नहीं क्यों उन्हें वार्ता की मेज पर आने का बार-बार निमंत्रण दिया जाता रहता है। नक्सली हमलों में जान गंवाने वाले जवानों की बढ़ती संख्या देश के अस्तित्व एवं अस्मिता पर एक बड़ा दाग है।

आज किसको छू पाता है मन की सूखी संवेदना की जमीं पर औरों का दु:ख दर्द? नक्सलवाद एवं आतंकवाद जैसी नृशंस चुनौतियों का क्या अंत होगा? बहुत कठिन है उफनती नदी में नौका को सही दिशा में ले चलना और मुकाम तक पहुंचाना।

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