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जरूरी है भारत के लिए श्रीलंका

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भारत के दक्षिण में स्थित तमिल संस्कृति वाला द्विपीय देश श्रीलंका भारत के लिए कितना महत्वपूर्ण है, इसका अदांजा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उस वक्तव्य से लगाया जा सकता है, जिसमें उन्होंने स्वीकार किया कि उनकी श्रीलंका यात्रा दोनों देशों के बीच स्थायी संबंधों में से एक है, जो बौद्ध धर्म की साझी विरासत को उजागर करती है।

प्रधानमंत्री के उक्त कथन का निर्वचन करें, तो इसका अर्थ यह बनता है कि अन्य दक्षिण एशियाई देशों की तुलना में श्रीलंका हमारे लिए कहीं अधिक महवपूर्ण है। प्रश्न यह उठता है कि यकायक ऐसा क्या हो गया है कि श्रीलंका हमारे लिए दूसरे अन्य पड़ौसी राष्ट्रों से अधिक जरूरी हो गया है?

यद्यपि प्रधानमंत्री की यह यात्रा धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व वाली यात्रा है, जिसका न कोई कूटनीतिक उदेश्य था और न कोई औपचारिक तैयारी थी। बावजूद इसके पीएम मोदी की दो दिन की श्रीलंका यात्रा कई राजनयिक उदेश्यों को साधने में सफल रही है। मोदी की यात्रा अपने उदेश्य में कितनी सफल रही है, इसका अनुमान श्रीलंका सरकार के उस निर्णय से भी लगया जा सकता है,

जिसमें उसने चीनी पनडुब्बी को कोलंबो के बंदरगाह में रखने को लेकर की गई चीन की अपील को खारिज कर दिया है। इससे पहले श्रीलंका ने अक्टूबर 2014 में आखिरी बार किसी चीनी पनडुब्बी को कोलंबो बंदरगाह पर रखने की इजाजत दी थी, जिस पर भारत ने कड़ी आपत्ती दर्ज करवाई थी। कोई सन्देह नहीं कि इस यात्रा के द्वारा भारत श्रीलंका में चीनी प्रभाव को कम करने में सफल हुआ है।

भारत, श्रीलंका का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार और चौथा सबसे बड़ा निवेशक देश है। श्रीलंका भी भारत का बड़ा व्यापारिक सहयोगी है। कोलंबो में 70 प्रतिशत जहाजों की आवाजाही भारत से होती है। विकास से संबंधित अनेक कार्ययोजनाओं का निर्धारण श्रीलंका सरकार की प्राथमिकताओं और आपसी वार्तालाप के बाद ही किया जाता है।

पिछले वर्ष भारत सरकार ने शिक्षा, स्वास्थय, परिवहन, छोटे और मध्य उद्यम विकास और प्रशिक्षण के क्षेत्रों में कई लघु विकास परियोजनाएं शुरू की है। आतंरिक एवं बाहृय सुरक्षा सहित हिंद महासागर में समुद्री सुरक्षा से संबंधित मुद्दोंंं पर भी दोनों देशों के बीच सहयोग में संतोषजनक प्रगति हुई हैं।

मजबूत आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों के बावजूद इन वर्षो में श्रीलंका की चीन से नजदीकी बढ़ी है, विशेष रूप से नौ सेना समझौते के संदर्भ में। श्रीलंका घाटे में चल रहे अपने हैमबैनटोटाटा बंदरगाह को 99 साल के लिए चीन को किराए पर देने का विचार भी बना रहा है। हालांकी टेÑड यूनियनों व स्थानीय ग्रामीणों और बौद्व भिक्षुओें के विरोध के कारण चीन के साथ समझौते में देरी हो रही है।

हालिया वर्षों में चीन ने श्रीलंका में एयरपोर्ट, सड़कें, रेलवे और बंदरगाह के निर्माण के लिए काफी निवेश किया है। ऐसा करने के पीछे उसका मकसद भारत के लिए आर्थिक अस्थिरता पैदा करना है, जो पारंपरिक रूप से श्रीलंका का आर्थिक साझेदार रहा है। चीन भी हमारे प्रधानमंत्री के इस दौरे पर नजरे गड़ाए हुए था। पेचिंग में आयोजित हुई वन बेल्ट,

वन रोड़ (ओबीओआर) समिट से ठीक पहले पीएम मोदी के श्रीलंका दौरे से चीन में खलबली मचना स्वाभाविक था। ऐसे में चीनी नेतृत्व की पीएम मोदी की इस यात्रा पर निगाहें रहना लाजमी था। एशिया को यूरोप से जोड़ने वाली इस महत्वाकांशी परियोजना को वर्ष 2013 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनफिंग ने प्रस्तावित किया था।

इस परियोजना में शामिल होने के लिए नेपाल ने पहले ही समझौते पर हस्ताक्षर कर दिये है। अगर श्रीलंका भी चीन की प्रस्तावित योजना में शामिल हो जाता है, तो उसका यह कदम भारत की चिंता को बढ़ा सकता है। ऐसे में मोदी का यह दौरा अपने आप में अहम् हो जाता है। यद्यपि विदेश नीति के मामले में मोदी की अगुवाई में भारत ने पहले ही रक्षात्मक नीति को त्याग दिया है

और दूसरे देशों के मामलों में अपने हित को प्राथमिकता देते हुए कडेÞ फैसले लिए हैं। ऐसे में देखना यह है कि दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की आपसी समझदारी और बेहतरीन तालमेल से दिल्ली-कोलंबो संबंधों में नई ऊर्जा का जो संचार हुआ है, वह चीनी पैठ के चलते कब तक बना रह सकता है।

-एन.के. सोमानी

 

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