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कहीं सरबजीत न बन जाए जाधव!

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भारतीय नौसेना के सेवानिवृत्त अधिकारी कुलभूषण जाधव की फांसी की सजा इंटरनेशनल कोर्ट आॅफ जस्टिस (आईसीजे) की अस्थायी रोक से पाकिस्तान बोखला गया है। पाकिस्तान सेना प्रधानमंत्री नवाज शरीफ पर लगातार दबाव बना रही है कि वो अंतरराष्टÑीय न्यायालय की परवाह न करे। जहां आईसीजे की रोक को भारत की बड़ी जीत माना जा रहा है,

वहीं जाधव की फांसी पर रोक की खबर से देश में खुशी का माहौल है। कल तो जो पाकिस्तान मीडिया जाधव मामले को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा व छाप रहा था, जाधव की फांसी पर रोक लगने के बाद उसको सांप सूंघ गया है। अब यह साफ हो गया है कि पाकिस्तान अब 19 मई से पहले जाधव को फांसी नहीं दे सकता है। देश में मोदी सरकार के इस कदम की चारों तरफ तारीफ हो रही है।

पाकिस्तान के नापाक इतिहास पर नजर डालें तो वो किसी भी नीचता पर उतर सकता है। कोट लखपत जेल में बंद भारतीय कैदी सरबजीत सिंह, चमेल सिंह और किरपाल सिंह के साथ जो हुआ, वो देशवासी अभी भूले नहीं है। पाकिस्तान अंतरराष्टÑीय दबाव व कूटनीतिक असफलता की बौखलाहट में कहीं कोई ऐसा कदम न उठा बैठे, जो जाधव के लिये जानलेवा साबित हो।

पाकिस्तान द्वारा षड्यंत्रपूर्वक जासूसी के आरोप में पकड़े गए भारतीय नौसेना के पूर्व अधिकारी कुलभूषण जाधव को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद पूरा भारतीय जनमानस गुस्से से भरा हुआ था। केन्द्र सरकार पर भी भारी दबाव था। पाकिस्तान ने इस बारे में मान्य राजनयिक परंपराओं तथा अंतर्राष्टÑीय कानूनों की जिस तरह अवहेलना की उससे ये तो लग रहा था

कि कुलभूषण के साथ भारी अन्याय हुआ। पाकिस्तान का जो चरित्र ऐसे मामलों में रहा है, उसे देखते हुए सामान्य कूटनीतिक प्रयासों से बात बनने की कोई उम्मीद नजर नहीं आई और तब भारत ने अंतर्राष्टÑीय न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। पाकिस्तान को भारत से शायद इस कदम की उम्मीद नहीं थी। जाधव के विरूद्ध पाकिस्तानी सैन्य अदालत की कार्रवाई वियना समझौते और मानवाधिकार का खुला उल्लंघन किया है।

2 मई 2013 को पाकिस्तान के जिन्ना अस्पताल में बुरी तरह जख्मी हालत में भर्ती भारतीय कैदी सरबजीत सिंह की मौत हो गयी थी। सरबजीत का मामला देश और दुनिया से अनजान नहीं है। सरबजीत सिंह भारत-पाकिस्तान सीमा पर बसे तरनतारन जिले के भिखीविंड गांव का रहने वाला किसान था। 30 अगस्त 1990 को वह अनजाने में पाकिस्तानी सीमा में पहुंच गया था।

यहां उसे पाकिस्तान आर्मी ने गिरफ्तार कर लिया। लाहौर और फैसलाबाद में हुए बम धमाके का आरोपी बनाकर सरबजीत सिंह को जेल में बंद कर दिया गया। इस बम हमले में 14 लोगों की जान गई थी। 1991 में बम धमाके आरोप में सरबजीत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। पाकिस्तान सरकार ने सरबजीत को मंजीत सिंह मान लिया

और एंटी टेररिज्म कोर्ट ने 15 सितंबर 1991 को उसे मंजीत सिंह के नाम पर सजा-ए-मौत सुनाई। सरबजीत सिंह ने पाकिस्तान राष्टÑपति के सामने पांच बार दया याचिका लगाई, लेकिन इन याचिकाओं पर फैसला नहीं हो सका। सरबजीत के परिवार ने रिहाई के लिए सारी कोशिशें की। सरबजीत सिंह पर लाहौर की कोट लखपत जेल में कैदियों ने हमला कर दिया था, इसके बाद पाकिस्तान ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया।

सरबजीत के मामले में पाकिस्तान सरकार पर उसे रिहा करने का चौतरफा दबाव था। जनवरी 2013 में लखनऊ में सरबजीत पर लिखी किताब ‘सरबजीत की अजीब दास्तान’ पुस्तक के विमोचन के मौके पर लखनऊ पधारे उनके पाकिस्तान में वकील और किताब के लेखक अवैस शेख और उनकी बहन व बेटी से मेरी लंबी बातचीत हुई।

उस वक्त सरबजीत की बहन दलबीर कौर ने जेल में भाई की हत्या का शक जाहिर किया था। दलबीर कौर का शक सच साबित हुआ। 29 अप्रैल 2013 को फांसी की सजा पाये कैदी पर दूसरे कैदियों ने जानलेवा हमला किया। और तीन दिन बाद 2 मई को उसकी जिन्ना अस्पताल में मौत हो गयी। पाकिस्तान की जेलों में भारतीय कैदियों के साथ क्रूरता की सारी हदें पार की जाती हैं।

जिस कोट लखपत जेल में सरबजीत सिंह कैद था। उसी जेल में कैद रहे स्वर्ण लाल के मुताबिक जेल में जानवरों जैसा सलूक होता है। बेरहमी से पीटते हैं। छोटे-छोटे कमरों मे बंद कर दिया जाता है। नीचे लिटा कर बाजू पकड़ लेते हैं। टांगें उठाकर ऊपर चार-पांच लोग जूतों समेत पूरे शरीर को रौंदते हैं। पीठ की चमड़ी उतर जाती है। टमाटर से ज्यादा लाल शरीर कर देते हैं। पाकिस्तान की जेल कोट लखपत में 12 साल की सजा काटकर लौटे जम्मू के निवासी विनोद साहनी का भी कहना है कि कोट लखपत जेल में भारतीय कैदियों के साथ बहुत बुरा बर्ताव किया जाता है।

पाकिस्तान की जेल में बंद एक अन्य भारतीय कैदी किरपाल सिंह को भी जासूस बताते हुए पाकिस्तान की कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी। कूटनीतिक प्रयासों के बावजूद किरपाल की भी संदग्धि हालत में वहां मौत हो गई थी। हालांकि पाकिस्तान सरकार ने इसकी वजह हार्ट-अटैक बताई थी, लेकिन किरपाल के घर वालों को पाक सरकार की इस बात पर आज भी भरोसा नहीं है। किरपाल ने 24 साल और सरबजीत ने करीब 23 वर्षों तक पाकिस्तान की जेल में यातना का दर्द झेला था। इन दोनों को इस तरह की घटना का ताजा उदाहरण माना जा सकता है। कुलभूषण जाधव की कहानी भी अब कुछ ऐसा ही मोड़ लेती दिखाई दे रही है।

जम्मू जिले के चमेल सिंह को पाकिस्तानी सेना ने 2008 में गिरफ्तार किया था। उन पर जासूसी करने का आरोप लगा था। इसके बाद उनपर अपना जुर्म कबूलने को लेकर मानसिक और शारीरिक दबाव भी डाला गया। इसी दौरान 2013 में जेल में पुलिसवालों की पिटाई से उनकी जान चली गई। बाद में पाकिस्तान द्वारा उनकी मौत पर पर्दा डालने और इसको एक प्रातिक मौत साबित करने की भी पूरी कोशिश की गई थी।

कुलभूषण की जान बचाने को लेकर मोदी सरकार की काफी घेराबंदी हो रही थी। विपक्ष के अलावा सोशल मीडिया पर भी मोर्चे खुल गए थे। अब चूंकि फांसी फिलहाल टल गई है इसलिए उम्मीदें कुछ बढ़ी हैं। यद्यपि ऐसे प्रकरणों में लेन-देन भी होता है। मसलन भारत की कैद में रह रहे पाकिस्तानी जासूसों को कुलभूषण के बदले में छोड़ा जा सकता है। वैसे भी जासूसी के आरोप में फांसी की सजा अप्रत्याशित ही है। जो भी हो, किन्तु भारत सरकार ने समूचे प्रकरण में जिस धैर्य एवं शान्ति के साथ कदम बढ़ाए, वह परिपक्व राजनय एवं सटीक रणनीति का उदाहरण है।

पिछले कुछ समय से भारत-पाक के बीच लगातार खटास बढ़ी ही है। पिछले वर्ष जम्मू कश्मीर के उड़ी में सेना के र्केप पर हुए हमले ने दोनों देशों के रिश्तों से जो कडवाहट पैदा हुई थी, उसे जाधव को मिली फांसी की सजा और बढ़ा देगी। इसके अलावा सिंधु जल समझौता, पाकिस्तान में चीन के सहयोग से बन रहा आर्थिक करिडोर, गिलगिट बलूचिस्तान को सूबा बनाने का फैसला समेत कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर विवाद कायम है। जाधव को मिली फांसी की सजा के बाद इन सभी मुद्दों पर खाई और बढ़ेगी। हालांकि जाधव की फांसी अभी टली नहीं है। लेकिन ये रोक भारत के लिए बड़ी कामयाबी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि कुलभूषण जाधव सुकुशल वतन लौटेगा।
-आशीष वशिष्ठ

 

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