अनमोल वचन

सत्संग में बैठने से ही कट जाते हैं भयानक कर्म

Satsang in Dera Sacha Sauda, Gurmeet Ram Rahim, Ruhani Satsang, Anmol Vachan

Satsang in Dera Sacha Sauda | Anmol Vachan

सरसा। सत्संग में इन्सान जितनी बार आता है, उतने ही उसके पाप-कर्म कटते चलते जाते हैं। नगदो-नगद सुमिरन का फल मिलता है।अगर इन्सान को दृढ़ यकीन है, सौ प्रसेंट अमल करता है, तो इस जहान में भी खुशियां मिलती हैं और अगर यकीन नहीं करता, सिर्फ सुनता है, मानता नहीं, फिर भी खाली नहीं जाता, बल्कि आत्मा के खाते में कुछ न कुछ फल जमा जरूर हो जाता है। (Satsang in Dera Sacha Sauda)

उक्त अनमोल वचन पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने शाह सतनाम जी धाम में आयोजित बुधवार को सायंकालीन रूहानी मजलिस के दौरान फरमाए।

फकीर अपनी बनाई बात नहीं कहते | Satsang in Dera Sacha Sauda

पूज्य गुरु जी ने फरमाया कि सत्संग में आना बहुत जरूरी है। पता नहीं कब इन्सान अमल करने लग जाए और उसके पाप-कर्म धुलते चले जाएं। पता नहीं कौन सा शब्द उसकी जिंदगी का रास्ता बदल दे और वो परमानन्द की प्राप्ती कर ले, क्योंकि फकीर अपनी बनाई बात नहीं कहते, बल्कि वो उसे भगवान, परमपिता परमात्मा की बात को आगे सबके सामने रखते हैं, शेयर करते हैं।

इसलिए जरूरी है कि सत्संग सुनो और अमल करो। ‘गधा पच्चीसी’ होते हैं कुछ लोग, वो सत्संग कम सुनते हैं और पछंडे ज्यादा मारते हैं, लेकिन ऐसे लोग ज्यादा देर पछंडे नहीं मारते। उन्हें जो मिलना चाहिए, उससे वो खाली रह जाते हैं।

आप जी ने फरमाया कि सत्संग में आओ, तो अपना ध्यान भगवान में रखो, ताकि बेइंतहा फल आपको मिल जाए। आप रोजाना सुनते हैं सत्संग में, जब लोगों के पत्र पढ़े जाते हैं और उन पत्रों में वो बताते हैं कि कैसे कैंसर उड़ गया, कैसे भयानक बीमारियां उड़ गई, कैसे जिंदगी में सफलता मिली, कभी साईकिल पर भी नहीं चढ़ते थे और अब कैसे हवा में उडार हो गई।

एक उम्र ही ऐसी होती है कि उसमें सुनना अच्छा नहीं लगता

यह तभी संभव है जब इन्सान सुने और अमल करे। एक उम्र ही ऐसी होती है कि उसमें सुनना अच्छा नहीं लगता, बस शरारतें ही शरारतें करते हैं। हमने बहुत जगह देखा है और शायद परमपिता जी ने ये शब्द तभी बनवाए हैं कि ‘गधा पच्चीसी जोर उम्र जवानी का’ यानि उम्र होती है एक। आजकल मानें तो 13 से लेकर 20-25 साल तक एक ऐसी उम्र होती है, जिसमें राम-नाम अच्छा नहीं लगता।

क्या चल रहा है सत्संग में, इससे कोई लेना-देना नहीं। तभी शायद बंदर कोम भी कहा जाता है बच्चों को। उसका कारण यही है कि उनका सत्संग में मन नहीं लगता। गप मारना, इधर-उधर की बातें करना ही उन्हें अच्छा लगता है। इससे अच्छा है कि घर पर ही रहो। क्योंकि जब सत्संग में आकर बैठते हो, तो आप उस परमपिता परमात्मा की निगाह में होते हो।

और कहीं ऐसा न हो कि आप कुछ ऐसा-वैसा कर बैठो और फिर सारी जिंदगी भरते रहो। इसलिए बहुत लाजमी है कि सत्संग में और सिर्फ और सिर्फ भगवान की चर्चा सुनो, भगवान की चर्चा करो और उसके अलावा अपने मन के अधीन कभी न चलो। जो लोग मन के अधीन होते हैं, वो मन के गुलाम हो जाते हैं और दु:खी रहते हैं।

‘बिन अमलों के आलमा, इल्म निक्कमे सारे…’

आप जी ने फरमाया कि सत्संग में बहुत-कुछ मिलता है, लेकिन मिलता उन्हीं को है, जो दृढ़ यकीन रखते हैं, पूरा ध्यान से सुनते हैं और अमल करते हैं। क्योंकि ‘बिन अमलों के आलमा, इल्म निक्कमे सारे…’ कितना भी अमल्ल करो, जब तक सुनते नहीं, अमल का फायदा नहीं और कितना भी सुन लो, जब तक अमल नहीं करते कोई फायदा नहीं। इसलिए दोनों ही बातें अति जरूरी हैं कि सुनो और अमल करो।

अगर ऐसा करते हो, तो जिंदगी के आदर्श की प्राप्ति का बीमा हो जाता है। यानि जीते-जी खुशियांं और मरणोपरांत आत्मा मालिक की गोद में बैठकर निजधाम, सतलोक, सचखंड, अनामी जरूर जाती है।
आप जी ने फरमाया कि आप सत्संग सुनते हो तो अमल किया करो और सत्संग सुनने जरूर आया करो, क्योंकि सत्संग में कई बार बैठने से ही कर्म कट जाते हैं और दिल लगाकर ध्यान से बैठो, तो जन्मों-जन्मों की खुशियां इसी जन्म में हासिल होनी शुरु हो जाती हैं और जन्मों-जन्मों के पाप कटने शुरु हो जाते हैं।

इसलिए बेहद जरूरी है कि आप ईश्वर की भक्ति किया करो, सत्संग सुना करो, बुरा संग कभी न किया करो। क्योंकि संग का रंग लाजमी चढ़ता है। सारा दिन गप मारना, झूठ बोलना, ओच्छी हरकतें करते रहना, ऐसे लोगों का संग-सोहबत कभी भी भक्ति में दिल नहीं लगने देता। इसलिए हमेशा याद रखो कि संग ऐसे लोगों का ही करो, जो मालिक से जोड़ने का काम करें। उन लोगों की सोहबत कभी न करो, जो मालिक से दूर करने की कोशिश करते हैं।

सत्संग में आने से असफलता, सफलता में बदल जाती है

सत्संग में तो उस भगवान की चर्चा होती है, जो कण-कण, जर्रे-जर्रे में विराजमान है। सत्संग में आने से असफलता, सफलता में बदल जाती है। सत्संग में आने से, दिल लगाकर सुनने से और अमल करने से लोग हारी बाजी भी जीत जाया करते हैं।
आप जी ने फरमाया कि सत्संग इन्सान को उत्साहित करता है। सत्संग इन्सान को आत्मबल देता है। सत्संग इन्सान को नया जीवन देता है। लेकिन बात वहीं आती है कि जो सुनकर अमल किया करते हैं।

इसलिए भाई, आप सत्संग सुना करो, अमल किया करो और मालिक की चर्चा करते-करते आगे बढ़ते जाया करो। किसी की परवाह न करो कि कोई आपको क्या कहता है। क्योंकि आप जानते हैं कि आप कुछ गलत कर्म नहीं कर रहे और अच्छे-नेक कर्मों में आगे बढ़ रहे हैं, तो फिर किसी की परवाह क्यों? कौन क्या कहता है, कौन क्या बात करता है, उसकी परवाह न करके आप अपने लक्ष्य यानि राम को पाना है, उसी सृष्टि की सेवा करनी है, आत्मिक शांति, आत्मबल हासिल करना है, इस तरह आगे बढ़ते जाया करो। यह तभी संभव है, जब सुनकर अमल करोगे।

इसलिए ध्यान से सुना करो, अमल किया करो, तो यकीनन आपकी झोलियां मालिक की दया-मेहर, रहमत से एक न एक दिन जरूर मालामाल होंगी।

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