सम्पादकीय

मलाला व सांतोष से कुछ सीख ले पाकिस्तान

Jadhav, Punished, Pakistan, India, Raw Agent

नार्वे की अवार्ड ज्यूरी ने इस साल का शान्ति नोबेल पुरुस्कार कोलंबिया के राष्ट्रपति मैनुएल सांतोष को देने का ऐलान बहुत महत्वपूर्ण है, जो पूरी दुनिया के देशों को नसीहत देता है। सांतोष को यह पुरुस्कार तब देने का ऐलान किया गया जब इराक, ट्यूनीशिया, यमन, सहित दर्जन भर देशों में ग्रहयुद्ध चल रहा है। नोबल पुरुस्कार देने का उद्देश्य ही अमन के प्रयासों को मजबूत करना और उसकी सराहना करनी है, ताकि और लोग भी अमन को प्राथमिकता दें। सांतोष अपने देश के रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं। कोलम्बिया पिछले 50 सालों से सेना और हथियारबंद बागियों में टकराव के कारण हिंसा का सामना कर रहा था। ढाई लाख लोग इस हिंसा की भेंट चढ़ गए थे। सन 2014 शान्ति के लिए यह पुरस्कार भारत और पाकिस्तान को संयुक्त रूप से पाकिस्तान में आतंकवाद हमले में शिकार लड़की यूसूफ मलाला को मिला, जिसने तालिबान की धमकियों के बावजूद स्वात घाटी में लड़कियों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया हुआ था। आतंकवादियों की गोली सहन कर मलाला डटी रही और आज स्वस्थ होकर भी वह लड़कियों की बेहतरी के लिए काम कर रही है। पाकिस्तान के लिए यह पुरस्कार गर्व की बात थी, लेकिन इस गर्व को मानने की बजाय पाकिस्तान दूसरे देशों में शान्ति भंग करने की साजिशों को अपनी तहजीब का हिस्सा बना रहा है। भारत के कैलाश सत्यार्थी को यूसूफ मलाला के साथ शान्ति का नोबल पुरुस्कार मिला था, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दोनों देशों को आपसी रिश्ते बेहतर बनाने का संदेश था। भारत ने इस पुरस्कार के सम्मान में अपनी जिम्मेदारी दिखाते हुए भारत ने पाकिस्तान के साथ मित्रता का हाथ बढ़ाया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी काबुल से आते-आते बिना तय कार्यक्रम से लाहौर जाकर मित्रता को बढ़ावा दिया, लेकिन पाक ने मलाला को संयुक्त राष्ट्र में मिले सम्मान की परवाह न करते हुए आतंकवाद की खेती को जारी रखा। हैरानी है कि इसी देश में मलाला जैसी नाबालिग लड़कियां हैं, जो आतंकवाद का शिकार होती हैं, लेकिन पाकिस्तान की सरकार हाफिज मोहम्मद सईद, मसूद अजहर, जकी-उल-रहमान लखवी जैसे आतंकवादी सरगनों की मेहमानवाजी के लिए सब कुछ करती है। शान्ति के लिए पुरस्कार जीत चुके देश के लिए आतंकवादी देश करार दिए जाने की मांग उठना पाक के लिए शर्मनाक है। पाक के शासकों ने आतंकवाद और सेना के दबाव में इंसानियत नैतिक मूल्यों को कुएं में डाल दिया है। पाकिस्तान चाहे कश्मीर के नाम पर ड्रामे करे, लेकिन अंतरराष्ट्रीय भाईचारे में उसकी साख बुरी तरह गिर चुकी है, जिसे शब्दों के तकनीकी हेर-फेर से बहाल करना बेहद कठिन है। पाक नोबल पीस प्राईज के सामने सदा शर्मिंदा रहेगा।

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