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दम तोड़ रहे सार्क को चाहिये आॅक्सीजन

सार्क (दक्षेस) का पूरा नाम दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ है। इस संगठन की स्थापना 7-8 दिसम्बर, 1985 को बंग्लादेश की राजधानी ढाका में हुई थी। संस्थापक सदस्यों की संख्या 7 थी, जिसमें भारत, पाकिस्तान भी शामिल थे। सन् 2007 में अफगानिस्तान के रूप में इसको आठवां सदस्य मिला। विश्व की 25 प्रतिशत आबादी को समेटने वाल यह विश्व का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन है।

यूं तो इस संगठन की स्थापना के पीछे कई उद्देश्य थे। जैसे- दक्षिण एशिया क्षेत्र की जनता के जीवनस्तर में सुधार करना तथा आर्थिक सामाजिक सांस्कृतिक तकनीकी और वैज्ञानिक क्षेत्रों में सक्रिय सहयोग तथा पारस्परिक सहायता में वृद्धि करना आदि। शुरू में तो लगा कि यह संगठन एक प्रेशर कुकर के वाल्व की तरह काम करेगा और क्षेत्रीय तनाव को कम करेगा,

लेकिन आज हम इसका आकलन करें तो पायेंगे कि यह संगठन अपने रास्ते से भटक गया है और विश्व के अन्य संगठनों के मुकाबले बड़ी बदतर स्थिति में है। इसकी बदहाली के पीछे कुछ कारण हैं, जिनकी सिलसिलेवार विवेचना जरूरी है। जितनी प्रगति दिसम्बर-1985 से नवम्बर 1986 तक हुई थी, उससे कहीं ज्यादा बिगाड़ 1987 में भारत, पाक, श्रीलंका और भारत-बांग्लादेश सम्बन्धों में हुआ है।

दरअसल इस संगठन की नींव ही आपसी अविश्वास, विजन की कमी और सदस्यों के बीच तनाव तथा वैमनस्य पर टिकी है। सबसे पहले बात करें, भारत-पाक सम्बन्धों की। दोनों ही देश इस संगठन की रीढ़ हैं, लेकिन दोनों ही देश एक-दूसरे के सबसे बड़े शत्रु के रूप में उभर कर सामने आये हैं।

यूं तो साफ्टा (साउथ एशियन फ्री ट्रेड एरिया) के गठन के बाद भारत में पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन के रूप में चिन्हित किया है, लेकिन दोनों ही देशों के बीच में कश्मीर समस्या, सीमा विवाद, सिन्धु नदी विवाद और आतंकवाद की समस्या प्रगति में बाधक बनी हुई है। दक्षिण एशिया में हिन्दुस्तान का रसूख बड़े भाई का है,

वह पंचशील जैसे सिद्धान्तों से बंधा हुआ है और अपनी पूर्ण जिम्मेदारी निभाता रहता है, लेकिन पाकिस्तान उकसावे और चिढ़ाने का काम करता रहता है, जिसकी वजह से दोनों देश तनावग्रस्त रहते हैं। सन् 1947 से 1999 तक दोनों देशों के बीच चार युद्ध हो चुके हैं और वास्तविकता यह है कि दोनों के बीच 1999 के बाद सम्बन्धों में गुणात्मक गिरावट दर्ज की गयी है।

दोनों ही देश परमाणु क्षमता से लैस हैं और दोनों के ही दुनिया में कुछ हबीब हैं और कुछ रकीब। जब आपस में ही मनमुटाव है, तो भला संगठन के सदस्य के रूप में ये क्या योगदान दे पायेंगे या दे पा रहे हैं। यह अपने आपमें समझ में आ जाता है। अगर हम एक अन्य सदस्य राष्ट्र नेपाल की बात करें, तो स्थिति और विकट जान पड़ती है।

अव्वल तो यह देश अपनी ही घरेलू दुश्वारियों को कम नहीं कर पा रहा है, तो दूसरी तरफ भारत जैसे पड़ोसी से उसके सम्बन्ध कभी रागात्मक, तो कभी तनावपूर्ण बन जाते हैं। नेपाल आन्तरिक परेशानियों से हमेशा ही हलकान रहा है। जब राजशाही थी, तब भी परेशान था और अब जब जम्हूरियत है, तब भी परेशान।

कभी माओवादी, और मद्धेशियों के बीच कुश्ती का अखाड़ा बन जाता है, तो कभी भारत और चीन के बीच धींगामुश्ती का सबब बन जाता है। देखा जाय तो चीन और भारत की जोर आजमाइश में नेपाल यूं तो एक बफर स्टेट के रूप में कार्य करता है, लेकिन शक्ति सन्तुलन के खेल में फिसड्डी साबित होता है।

अगर एक और सदस्य बांग्लादेश की बात करें, तो बताते चलें कि यह मुल्क अभी भी राजनीतिक अस्थिरता तथा गृहयुद्ध की वजह से हाशिये पर नजर आता है। भारत के साथ इसकी उलझन के दो कारण हैं- एक तो फरक्का विवाद और दूसरा शरणार्थियों की समस्या। गरीबी, भुखमरी और बेरोजगारी तथा अशिक्षा के मुद्दे पर बात करें,

तो यह गौरतलब है कि इस देश को दक्षेस का सदस्य बनकर कोई खास फायदा नहीं हुआ है। अब बात की जाये, अफगानिस्तान की, तो यह मुल्क रूस और अमेरिका जैसी महाशक्तियों का मोहरा बना हुआ है। आतंकवादियों का पनाहगाह तथा पाकिस्तान के नापाक मंसूबों का शिकार यह मुल्क हमेशा ही सुर्खियों में रहता है।

इस देश में हमेशा ही कठपुतली सरकार बनी और विपन्न और बेजार अफगानिस्तान अपना ही भला करने में असमर्थ है। ऐसे में भला वह किसी संगठन के सदस्य के रूप में व अपनी भूमिका के साथ कितना और कैसे न्याय कर पायेगा, यह सर्वविदित है। अगर हम श्रीलंका की बात करें, तो वहां मसायल कम नहीं हैं। तमिल आतंकवाद से जूझने के बाद उसका सरोकार गंभीर आर्थिक विसंगति से हुआ।

हर तरह से दु:खी श्रीलंका किसी की मदद कर पाने की स्थिति में नहीं है। इस तरह देखा जाये, तो हम यह पता लगा लेते है कि सार्क के जितने भी सदस्य हैं सब बेहाल और परेशान। भारत की बात क्यों छोड़ी जाये। गरीबी और अशिक्षा ने इस देश से किनारा तो कर लिया लेकिन आतंकवाद भ्रष्टाचार और बेरोजगारी का घुन इसे मुतवातर चाट रहा है।

ठीक है कि आर्थिक उन्नति कर रहा है और राजनीतिक स्थिरता भी है, लेकिन अकेला चना भाड़ कहां तक फोड़ पायेगा। मालदीव और भूटान इतने छोटे और कम हनक वाले मुल्क हैं कि ये संगठन से कुछ प्राप्त ही कर सकते हैं कुछ दे पाने की स्थिति में नहीं। इस तरह इस संगठन की स्थिति विचित्र है।

अब तो आर्थिक सम्बन्ध विकसित करने का दौर है। साफ्टा के निर्माण के बाद ही इस संगठन की मुश्किलें कम नहीं हुई है। अभी भी इनदेशों के आपसी रिश्ते मामले को पेचीदा बना देते हैं। यूरोपीय यूनियन हो या आसियान नाटो हो या सीटो। यह संगठन अन्य सभी संगठनों के समक्ष कही भी नहीं ठहर पाता है।

इसका कारण यह है कि सदस्यों के बीच आपस में सामंजस्य और सहयोग की कमी है तथा वे एक मंच साझा करने के बावजूद एक जुट नहीं हो पाये। इस संगठन का अब न तो कोई औचित्य बचा है और न ही यह प्रासंगिक रह गया है। देखा जाये तो यह संगठन दमतोड़ रहा है और इसके जिन्दा रहने के लिए सदस्य देशों की एक जुटता रूपी आक्सीजन की जरूरत हैं जो शायद मिलती हुई प्रतीत नहीं हो रही है।

जब इस संगठन का निर्माण हुआ था तो क्षेत्र को बहुत उम्मीदें थीं। चीन जैसे देश इस संगठन को खुर्दबीन नजर से देख रहा था तथा अमेरिका और रूस जैसे देश यह मान रहे थे कि इस क्षेत्रीय संगठन से कई अन्तर्राष्ट्रीय और क्षेत्रीय मुद्दों को सुलझाने में मदद मिलेगी लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

भारत की लाख कोशिशों के बावजूद जिया उर रहमान के इस ब्रेन चाइल्ड को जैसे किसी की नजर लग गयी और आज यह संगठन हर तरह की इमदाद का मोहताज हो गया है। विश्व को इस संगठन के पुनर्जीवित होने का इन्तजार करना पड़ेगा।

-अमित कुमार श्रीवास्तव

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