लेख

किसानों की बढ़ती आत्महत्या पर लगाम आवश्यक

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Farmers Suicide |  दिखावट की राजनीतिक परिपाटी के लिहाज से

असमानी तीर चलाना नेताओं की चाल है, तो किसान आज भी अपनी फसलों का उचित मूल्य प्राप्त करने के लिए बेबस और लाचार है। उसकी बेबासी और लाचारी का प्रदर्शन कभी-कभी सत्ता के खिलाफ सितम के रूप में टूट पड़ता है, फिर वह अपनी फसलों को सड़कों पर फैंकने पर विवश हो जाता है, फिर सरकार की फौरी संवेदना किसानों के रूदन पोछने के लिए जागरूक होती है, वह भी दिखावट की राजनीतिक परिपाटी के लिहाज से। (Farmers Suicide)

30 दिसंबर 2016 को प्रकाशित एनसीआरबी की रिपोर्ट एक्सिडेंटल डेथ्य एंड सुसाइड इन इंडिया 2015 के अनुसार वर्ष 2015 में 12 हजार 602 किसानों ने आत्महत्या की, लेकिन राजनीतिक और सियासी परिपाटी में स्वयं का खेल इतना चरम पर पहुंच चुका है कि किसानों की बदहाली पर मात्र मरहम छिड़कने की परंपरा चली आ रही है।

Farmers Suicide आम बात हो चुकी है

हमारे देश में Farmers Suicide का मामला प्रकाश में आना आम बात हो चुकी है। किसी न किसी कारणवश भारतीय किसान प्रतिवर्ष काल के ग्रास में समाहित होता जा रहा है, जिसको लेकर भारतीय रहनुमा व्यवस्था में भी उचित व्यवस्था का अभाव दिखता है।

जिस देश की परिपाटी कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था की रही है, अगर वही अन्नदाता मौत को गले लगाने को विवश है, ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि कहीं न कहीं व्यवस्था में लोच है।

वहीं दूसरी ओर आज की परिपाटी में जहां डिजीटल इंडिया और स्किल इंडिया की बात हो रही है, उस परिदृश्य में अगर किसान और मजदूर के बाल-बच्चे कुपोषण और भुखमरी से काल-कलुवित हो रहे हैं, फिर कहीं न कहीं यह प्रश्न ज्वलंत रूप धारण करना आवश्यक है कि हमारी हुक्मरान व्यवस्था ने आखिर अभी तक ऐसी कोई व्यवस्था पर पुरजोर प्रहार नहीं किया, जिससे हम गरीबी और भुखमरी को काबू कर पाये?

वर्तमान दौर की परिस्थिति में किसान आत्महत्या का मुद्दा गूढ़ होता जा रहा है। किसान और मजूदरों की आत्महत्या को भी देश में राजनीतिक पार्टियों द्वारा सत्ता साधना के प्रतीक के रूप में लगाया जाने लगा।

सुप्रीम कोर्ट ने Farmers Suicide के मुद्दे को तरजीह दी

लेकिन अब जब सुप्रीम कोर्ट ने Farmers Suicide के मुद्दे को तरजीह दी है, तब ऐसा सवाल उठता है कि हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था कृषि को लाभ का धंधा बनाने की दिशा में कौन सा कदम उठाती दिखती है? शीर्ष न्याय व्यवस्था ने इन सरकारी योजनाओं पर सवाल उठाते हुए कहा है कि मुआवजे की व्यवस्था करने मात्र से किसान आत्महत्या को नहीं रोका जा सकता है।

इस निर्णय के बाद हमारी लोकतांत्रिक रहनुमा व्यवस्था को विचार करना होगा कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि कृषि ब्याज और अन्य सुविधाओं को चलाने के पश्चात् भी ऐसा कौन-सा कारण है, जिसके कारण किसान आत्महत्या पर देश में काबू नहीं पाया जा सका है।

विगत कुछ वर्षों में किसानों की बढ़ती आत्महत्या की घटनाओं को नजदीक से देखा जाए, तो हमारे सामने एक तथ्य यह भी निकलकर आता है कि किसान आत्महत्या मात्र कर्ज के बोझ और योजनाओं के लाभ न मिलने के कारण नहीं करता, बल्कि वह अन्य कारणों से भी मजबूर होता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा सरकार पर सवाल खड़े करने पर सरकार की तरफ से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल पीएस नरसिम्हा ने कहा कि सरकार कई योजनाएं लाई है, जिसके द्वारा यह निर्धारित हो सके कि कर्ज के कारण कोई किसान आत्महत्या न करे।

आज देश में किसानों की आत्महत्या के पीछे के कारण केवल कर्ज का दवाब नहीं है। अनेकानेक अन्य वजह भी है, जो काल का रूप धारण करके किसानों को तंग करती है।

जिसमें फसलों का उचित समर्थन मूल्य न मिलना। किसानों को अपनी फसल सस्ते दामों पर बेचनी पड़ती है और वे बैंक की तमाम शर्तों से ग्रसित होकर साहूकार के चंगुल में फंसकर भी अपनी जान दे देते हैं।

अत: सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाये गए ज्वलंत मुद्दे पर सरकार को अपनी नीति और नियत दोनों साफ करते हुए देखना होगा, तभी किसानों को लचर व्यवस्था से आजाद कराया जा सकता है।

महेश तिवारी

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