सम्पादकीय

वास्तव में बुराइयों का हो समूल नाश

विजयदशमी का त्यौहार पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया गया। हजारों वर्षों से फूंकते आ रहे रावण, मेघनाथ, कुंभकरण, के पुतले पूरे देश में जलाए गए और लोगों ने जश्न मनाया कि बुराई को जला दिया गया, जबकि प्रति वर्ष दशहरा के पर्व पर यह चर्चा भी आम रहती है कि रावण की बजाय समाज अपने भीतर व्या΄त बुराइयों को क्यों नहीं जलाता। दरअसल दशहरा के वक्त होने वाले पुतलों के दहन के पीछे भी तो यही विचार प्रमुख है कि रावण बुराई का प्रतीक है। अत: बुराइयों का अंत होना चाहिए और अच्छाई धर्म की जीत होनी चाहिए। इधर धीरे-धीरे समाज में एक वर्ग अब पुतलों के दहन के इस आडंबर को खत्म करने की भी बात करने लगा है और इस बात पर जोर देने लगा है कि समाज में व्याप्त बुराइयां, भ्रष्टाचार, दुराचार, कन्या भूण हत्याएं, वेश्यावृत्ति, लूटपाट, हत्याएं, मिलावटखोरी, जमाखोरी, सूदखोरी, प्रदूषण इत्यादि का अन्त किया जाए ना कि बार-बार रावण का पुतला जलाया जाए। ऐसे लोगों का एक तर्क यह भी है कि रावण ने भले ही माता सीता का अपहरण कर एक बुराई की थी, परन्तु वास्तव में रावण एक सिद्धपुरूष थे। वह महात्मा, पंडित, प्रजा वत्सल राजा व श्रेष्ठ मानव थे। रावण सभी वेदों का ज्ञाता, आयुर्वेद, का रचियता था। यही नहीं उसने अपने वक्त में सूर्य, चन्द्रमा, हवा, पानी, अग्नि सब पर विजय प्राप्त कर रखी थी और इन सबका वह मानव कल्याण में उपयोग कर रहा था। रावण ने पुष्पक नामक ऐसा विमान बनाया था कि वह कोई प्रदूषण नहीं फैलाता था। उसकी कोई आवाज नहंी थी और उसकी गति मन की सोच के बराबर थी। उसने ऐसे रसायन तैयार कर लिए थे कि यदि एक चुटकी रसायन समुन्द्र जल में डाल देता तो पृथ्वी के सारे समुन्द्र मीठे हो जाते लेकिन वह प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाना जाता था और उसने सभी विधाओ को समस्त प्राणीमात्र के कल्याणार्थ ही प्रयोग किया। रावण मिट्टी, पत्थर, लकड़ी जैसे सामान को सोने में बदल लेने की कला से परिपूर्ण था। ऐसे विद्ववान व्यक्ति को हर वर्ष बुराई का प्रतीक बताकर समाज को भ्रमित किए रखना अब ठीक नहीं है। वह भी तब जब समाज के अधिकतर लोग रावण को भी शर्मशार कर देने वाले कुकृत्य कर रहे हैं, यहां मानवता तार-तार हो रही है। कुछ संगठन न्यायपालिका के माध्यम से भी इस बुराई का अंत करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं कि रावण दहन नहीं हो। लेकिन रावण दहन अब इस देश की संस्कृति का ऐसा हिस्सा बन चुका है कि लोग यह कभी नहीं चाहेंगे कि रावण दहन बंद हो। लेकिन समाज को इतना अवश्य कर लेना चाहिए कि रावण दहन के वक्त जो बुराइयों के अंत की कथा दोहराई जाती है उसे समाज में वास्तविक रूप में स्थापित किया जाए। दैनिक जीवन में समाज जो बुराइयां कर रहा है उनका समूल अंत हो।

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