सम्पादकीय

पंजाब सरकार की शराब पर दोगली नीति

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राज्य को नशा मुक्त करने के पंजाब सरकार के वायदे का सच तीन माह में ही सामने आ गया है। कांग्रेस ने अपने चुनाव घोषणापत्र में वायदा किया था कि सरकार आने पर प्रत्येक वर्ष की भांति 5 फीसदी शराब के ठेके बंद करवाए जाएंगे।

इस तरह पांच वर्षों में 25 फीसदी ठेके खत्म कर दिए जाएंगे, किन्तु सत्ता परिवर्तन होते ही पार्टी ने गिरगिट रंग दिखाया और राष्ट्रीय व राज्य मार्गों पर होटलों, रेस्टरों व क्लबों में शराब परोसने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की काट ढूंढ ली।

सरकार ने कानून में शोध बिल पास करके सुप्रीम कोर्ट की उस भावना पर पानी फेर दिया है कि सड़कों से शराब के ठेके उठाने से सड़क हादसों में कमी आएगी। इससे पहले राज्य के कई राजमार्गों को डीनोटीफाई करके शराब की बिक्री को पहले ही छूट दी गई है।

सरकार की नीतियों की पोल इस बात से भी खुल जाती है कि शोध बिल पास करने के लिए जो दलीलें दी गई हैं, वह सरकार की घोषणा के विपरीत हैं। सरकार ने दलील दी है कि सड़कों से शराब की बिक्री खत्म होने से राज्य को आर्थिक नुक्सान हो रहा है और युवाओं को रोजगार भी नहीं मिल रहा। कांग्रेस पार्टी चुनाव घोषणा-पत्र में प्रत्येक परिवार में एक नौकरी देने की घोषणा कर चुकी है।

क्या अब पंजाब सरकार सिर्फ शराब परोसने वालों के रूप में ही पंजाबियों को रोजगार देगी। हकीकत यह है कि शराब राज्य की तबाही का कारण बनी हुई है। 40 फीसदी सड़क हादसे व झगड़ों में कत्लेआम का कारण शराब ही है। इसी कारण राज्य में शराब के खिलाफ लहर चल रही है। विशेष तौर पर महिलाओं ने कई जगहों पर शराब के ठेकों को ताले लगाकर रोष-प्रदर्शन किए हैं।

सैंकड़ों पंचायतें शराब के खिलाफ प्रस्ताव डाल चुकी हैं, किन्तु जब सरकार को शराब में बड़ी कमाई नजर आती है, तो सिद्धांत, वायदे, घोषणा, जनता की भलाई सब कुछ पंख लगाकर उड़ जाते हैं।

दूसरी तरफ बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, केरल जैसे राज्य शराबबंदी के लिए आगे बढ़ रहे हैं। यदि बिहार जैसा राज्य शराबबंदी के बावजूद उन्नति कर रहा है, तो पंजाब पर क्या असर पड़ सकता है! पंजाब कैंसर व अन्य बीमारियों का गढ़ बन गया है। ऐसे में शराब और अधिक बीमारियां ही लेकर आएंगी। खेल यूनिवर्सिटिज खोलने का लाभ तब ही है, यदि पंजाबी शराब से मुक्त होंगे।

पंज+आब को शर+आब बनाने की बजाए, यहां की जवानी को खेल, शिक्षा व हुनर की तरफ लगाया जाए। सरकार के पास नौकरियों का अभी से टोटा पड़ गया है कि वह शराब की दुकानें खोलने चल पड़ी है, तो पांच वर्ष शराब की कमाई पर गुजारने आसान नहीं। सरकार युवाओं को हुनरमंद बनाकर उनके लिए रोजगार के अवसर पैदा करे।

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