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वटवृक्ष बना हेनरी ड्यूनेंट द्वारा रोपा रेड क्रॉस का पौधा

Red Cross, Henry Dunant, Hindi Article

दुनिया भर के सभी देशों में अपनी शाखाओं के जरिये मानवता की भलाई के लिए सक्रिय रेड क्रॉस एक विशाल वट वृक्ष की भांति ही नजर आता है, जोकि युद्ध एवं शांतिकाल में समान रूप से मानवता की सेवा में लगा हुआ है और निश्चय ही इस पौधे को रोपने वाले जीन हेनरी ड्यूनेंट की शख्सियत भी झलकने लगती है। उन्हीं के जन्मदिन के उपलक्ष्य में 8 मई को पूरी दुनिया में रेड क्रॉस दिवस मनाया जाता है।

ड्यूनेंट का जन्म स्विटजरलैंड के खूबसूरत शहर जेनेवा में 8 मई, 1828 को हुआ था। ड्यूनेंट के माता-पिता सामाजिक कार्यों को बहुत महत्व देते थे। वे अनाथों, असहायों, बीमारों और गरीबों की सेवा में लगे रहते थे। उन्हीं के संस्कारों का प्रभाव ड्यूनेंट पर पड़ा और 18 वर्ष की आयु में वे एक चैरिटी सोसायटी में शामिल हो गए।

1849 में 21 वर्ष की अवस्था में कम अंक आने के कारण उन्हें कॉलेज छोड़ना पड़ा। पढ़ाई छोड़ने से पहले उन्होंने एक बैंक में काम करना शुरू कर दिया। समाज के लिए कुछ करने का जज्बा उनमें बचपन से हिलोरें मारता था। इसलिए कुछ समय के बाद उन्होंने अपने मित्रों के साथ मिलकर थर्सडे एसोसिएशन नाम के संगठन की स्थापना की। यह युवाओं का समूह था, जिसका उद्देश्य गरीबों की मदद करना था। 1853 को ड्यूनेंट को कंपनी की ओर से अल्जीरिया और ट्यूनिशिया की यात्रा पर जाना पड़ा।

24 जून, 1859 की शाम को जब ड्यूनेंट व्यापारिक दिक्कतों के मद्देनजर फ्रांस के शासक नेपोलियन तृतीय से मिलने जा रहे थे, तो उन्होंने सोलफेरिनो में सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध में हजारों रक्तरंजित घायल एवं मृत लोग धरती पर पड़े देखे। घायलों की देखभाल करने वाला कोई नहीं था। घायल सैनिक रक्त एवं चिकित्सा के अभाव में तड़प रहे थे।

इस घटना से उनका दिल दहल गया और संवेदनशील ड्यूनेंट अपना सारा काम छोड़ घायलों की सेवा में लग गए। घायलों की सेवा के लिए उन्होंने आस-पास के लोगों को भी प्रेरित किया, जिससे बहुत से घायल सैनिकों की जान बचाई जा सकी। लेकिन मूलभूत सुविधाओं, रक्त एवं चिकित्सा के अभाव में हजारों सैनिक मौत के मुंह में समा गए। हेनरी ड्यूनेंट ने अपनी आंखों के सामने घटी इस घटना को ‘ए मैमोरी आॅफ सोलफेरिनो’ के नाम से लिखा है।

इस पुस्तक को उन्होंने दुनिया के मजबूत नेताओं और राष्टÑाध्याक्षों को भेजा और घायल सैनिकों को बिना किसी भेदभाव के चिकित्सा सुविधाएं प्रदान करने की जरूरत रेखांकित की।
सोलफेरिनों के हृदयविदारक दृश्यों से उद्वेलित हेनरी ड्यूनेंट ने 9 फरवरी, 1863 को जेनेवा में पांच लोगों की कमेटी गठित की। 26 से 29 अक्तूबर, 1863 को युद्ध क्षेत्र में घायल सैनिकों की चिकित्सा के लिए एक अन्तर्राष्टÑीय सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में रेड क्रॉस को अमली जामा पहनाने के लिए प्रस्ताव तैयार किए गए। यह तय किया गया कि हर देश में नेशनल रिलीफ सोसायटी फॉर वांउटेड सोल्जर का गठन किया जाएगा।

बिना किसी भेदभाव के घायल सैनिकों की चिकित्सा एवं रक्षा की जाएगी। युद्ध क्षेत्र में घायल सैनिकों की चिकित्सा के लिए स्वयंसेवकों का प्रयोग किया जाएगा। संस्था की पहचान के लिए सफेद पट्टी पर लाल रंग के क्रॉस चिह्न को मान्यता दी गई। जो रेडक्रॉस आज पूरे विश्व में मानवता की सेवा का प्रतीक बना हुआ है।

30 अक्तूबर, 1910 को हेनरी ड्यूनेंट मृत्यु के समय उन पर कर्ज था। उन्हें इस बात का अफसोस भी था कि वे अपने जीवनकाल में कर्ज नहीं उतार पाए। लेकिन अच्छी बात यह रही कि गाँव की चौपालों पर बरगद का पौधा रोपने वाले अनजान व्यक्ति की भांति हेनरी ड्यूनेंट से दुनिया अनभिज्ञ नहीं है।

1901 में उन्हें उनके अथक प्रयासों के लिए पहला नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया था। भारत में रेडक्रॉस की 750 से अधिक शाखाएं हैं, जोकि मानवीय एवं प्राकृतिक आपदाओं व सामान्य स्थितियों में भी मानव जीवन और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए विभिन्न तरह से काम कर रही हैं।

अरुण कुमार कैहरबा

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