लेख

पीएचडी योग्यता वाले भी चपरासी बनने की कतार में

Phd holders applied for sweeper job

यह समाचार भले ही उत्तरप्रदेश के लखनऊ से आया हो और हमारी व्यवस्था को शर्मसार करने को काफी हो पर कमोबेस यह स्थिति समूचे देश में देखने में आ रही है। लखनऊ से प्राप्त समाचार के अनुसार चपरासी के 62 पदों के लिए यही कोई 93 हजार आवेदन आए हैं उनमें से चपरासी की आरंभिक योग्यता धारक यानी कि पांचवीं से 12 वीं तक के 7400 आवेदक है जबकि चपरासी के पद के लिए आवेदकों में साढ़े तीन हजार तो पीएच डी की उपाधि प्राप्त युवा हंै। मजे की बात यह है कि आवेदकों में तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं की भी अच्छी खासी हजारों में संख्या है। यह कोई नई बात नहीं हैं और ना ही अझूबी। क्योंकि कुछ समय पहले राजस्थान में सचिवालय में चपरासी के पद के लिए भी कई हजार आवेदन प्राप्त हुए थे और उनका साक्षात्कार लेना तक मुसीबत का सबब बन गया था। इसी तरह से नगर पालिकाओं और नगर निगमों में सफाई कर्मचारियों के पदों के लिए भी तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के आवेदन आम होता जा रहा है। इंजीनियरिंग व प्रबंधन में डिग्री धारी युवाआें का चपरासी या सफाई कर्मचारी की नौकरी के लिए आवेदन करना देश की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी नौकरी की ललक की स्थिति दोनों से ही रुबरु कराने के लिए काफी है।

पिछले दिनों ही मुरादाबाद नगर निगम में सफाई कर्मियों के पदों की भर्ती के समय इन तकनीकी व विशेषज्ञताधारी युवाओं को साक्षात्कार के दौरान सफाई के लिए नाले में उतारने के समाचार सुर्खियों में आ चुके हंै। इन युवाओं को भर्ती के दौरान फिजीकल परीक्षा में फावड़ा कुदाल आदि देकर के सुरक्षा साधनों के बिना ही नाले की सफाई के लिए उतार देने से मीडिया को एक समाचार मिल गया। हांलाकि आज स्थिति यह होती जा रही है कि एक पद के हजारों दावेदार हैं। ऐसे में कम पदों के लिए भर्ती भी मुश्किल भरा काम हो गया है। चतुर्थ श्रेणी या लिपिक के पदों के लिए भी इंजीनियरिंग, एमबीए, पोस्ट ग्रेजुएट तक पास युवाओं के आवेदन आना आम होता जा रहा है। डिग्रीधारी युवाओं का कहना है कि बेरोजगारी के चलते उनकी मजबूरी है। दूसरी तरफ कुशल व योग्य युवाओं के लिए नौकरी के एक ढूंढों हजार अवसर वाली स्थिति भी हमारे देश में उपलब्ध है।

एक समय था जब लोग प्राइवेट नौकरी की ओर आकर्षित थे और उसका कारण भी अच्छा वेतन और अच्छी सुविधाएं होती थी। पर वेतन आयोगों के चलते अब सरकारी नौकरी में भी आकर्षक वेतन और बेहतर सुविधाएं मिलने लगी है। इसके साथ ही सरकारी नौकरी में बंदिशें कम और एक तारीख को पूरी पगार वाली स्थिति के साथ ही रिटायरमेंट के बाद का आकर्षण बरबस सरकारी नौकरी की तरफ खींच रहा है। मेडिकल, अवकाश व अन्य सुविधाएं अलग। ऐसे में अब निजी से भी बेहतर तनख्वाह और सुविधाओं के और वह भी बिना जबावदेही के तो सरकारी नौकरी का आकर्षण और अधिक बढ़ता जा रहा है। यही कारण है कि सरकारी नौकरी की चाह में यह तस्वीर पूरे देश में देखने को मिल जाएगी। सरकारी नौकरी के एक-एक पद के लिए इतने अधिक आवेदन आते हैं और इसमें न्यूनतम योग्यता तो अब कोई मायने ही नहीं रखती, एक से एक उच्च योग्यताधारी आवेदकों में मिल जाते हैं।

ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि क्या बेरोजगारी की समस्या वाकई इतनी गंभीर है ? या कहीं हमारी शिक्षा व्यवस्था में ही खोट हैं ? या अन्य कोई कारण है? दरअसल इसके कई कारणों में से एक हमारी शिक्षा व्यवस्था, दूसरी हमारी शिक्षा का स्तर, तीसरी सरकारी नौकरी के प्रति आज भी युवाओं का आकर्षण आदि है। पिछले दशकों में देश में शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। शिक्षण संस्थाएं बहुत खुल गई हैं। आज स्थिति यहां तक आ गई है कि देश के इंजीनियरिंग कॉलेजों व प्रबंधन संस्थानों की सीटें भी पूरी नहीं भर पाती हंै। युवाओं का धीरे धीरे एमबीए आदि से मोहभंग होता जा रहा है। जिस इंजीनियरिंग में प्रवेश के लिए युवाओं का कड़ी मेहनत के बाद भी मुश्किल से प्रवेश मिलता था आज प्रवेश परीक्षा में कम अंक लाने पर भी प्रवेश हो जाता है। यहां तक कि सीनियर सैकण्डरी के प्राप्तांकों के आधार पर भी प्रवेश होने लगा है। तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि कई तकनीकी व प्रबंधन शिक्षण संस्थानों में तो स्तरीय संकाय सदस्यों का अभाव आम है।

सबसे गंभीर बात यह है कि कुछ पैसों के लालच में शिक्षक संस्थानों में संकाय सदस्यों को फर्जी तरीके से दिखाया जा रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा हाल ही जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि करीब 80 हजार शिक्षक एक से अधिक संस्थानों में अपना प्लेसमेंट दिखा कर वेतन भत्ते प्राप्त कर रहे हैं। यूजीसी ने ऐसे 80 हजार शिक्षकों को नौकरी से हटाने को साफ साफ कह दिया है। इसका मतलब साफ है कि इन संस्थानों में पढ़ाई की क्या स्थिति होगी इसके लिए कहने की आवश्यकता नहीं है। इंजीनियरिंग में अच्छी योग्यताधारी युवाओं को तो कोई भी संस्थान अपने यहां प्लेसमेंट दे देता है। लगभग सभी कंपनियों द्वारा आजकल सीधे संस्थानों में प्लेसमेंट के लिए साक्षात्कार आयोजित कर चयन कर लिया जाता है।

बेशक सरकार इंजीनियरिंग, प्रबंधन, मेडिकल व इसी तरह की अन्य शिक्षण संस्थाओं का जाल फैलाएं, निजी क्षेत्र को अधिक से अधिक बढ़ावा दे, निजी विश्वविद्यालयों को मान्यता दे पर यह साफ हो जाना चाहिए कि इन संस्थानों के शिक्षा के स्तर से किसी तरह का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। यदि हमारे शिक्षण संस्थान कुशल, योग्य और प्रतिभाशाली विशेषज्ञ तैयार करने में सक्षम नहीं है तो ऐसी शिक्षा का कोई महत्व नहीं रह जाता है। सरकार को शिक्षण संस्थानों की शैक्षिक स्तर और गुणवत्ता पर किसी तरह की आंच नहीं आने देनी होगी नहीं तो दुर्भाग्यजनक व शर्मसार करने वाली स्थिति यानी की बेरोजगारों की भीड़ और सरकारी नौकरी की चाह में चपरासी जैसे पदों की चाह और युवाओं में कुंठा व आपराधिक प्रवृति को किसी भी दशा में रोका जाना संभव नहीं होगा। सरकार को समय रहते कारगर प्रयास करने होंगे।

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