सम्पादकीय

विचारधारा से भटकी पार्टी व नेता

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दिल्ली की राजनीति में तीसरी ताकत बनकर उभरी व भारी बहुमत से सत्ता में पहुंची आम आदमी पार्टी की झाड़ू अब तीला-तीला होकर बिखर रही है। पार्टी की दुर्गति इस कद्र हो रही है कि पार्टी के शीर्ष नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ डट गए हैं। पार्टी में एकाएक मौकापरस्ती, बदलेखोरी, भ्रष्टता, सिद्धांतहीनता सतह पर आ गई है। सिद्धांतों के नाम पर जिस भी मंत्री को हटा दिया जाता है, वही पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल के विरूद्ध मोर्चा खोल देता है। सारे मंत्री, विधायक इस बात पर एकमत जान पड़ रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल पैसा ले रहे हैं। जमीनों की डील करवाई जा रही है, परंतु सारे नेता तब तक चुप बैठे हैं, जब तक कि उन्हें मंत्री पद व गाड़ी सहित सरकारी सुविधाएं मिल रही हैं।

कपिल मिश्रा, जो अब चीख-चीख कर कह रहे हैं कि केजरीवाल ने दो करोड़ रुपए लिए हैं, वह भी उतने ही दोषी हैं, जितना कि अरविंद केजरीवाल। आखिर वह क्यों इस बात को दबाकर बैठे रहे? जब यह लेन-देन हो रहा था, उन्होंने तब क्यों नहीं मीडिया, राज्यपाल व केन्द्र सरकार को इस बारे में जानकारी दी? जनप्रतिनिधि होने एवं सरकार में होने के चलते उनका नैतिक एवं संवैधानिक दायित्व बनता था कि वह भ्रष्टाचार के विरूद्ध आवाज उठाते। अब मिश्रा के पास मंत्री पद नहीं रहा, तो वह शोर मचा रहे हैं। इससे यह भी जाहिर हो रहा है कि भ्रष्टाचार पर शोर नहीं मचा रहे, बल्कि केजरीवाल से हिसाब चुकता कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के विरूद्ध आंदोलन से निकली पार्टी है। इस पार्टी के अपने निर्माण व गठन के वक्त बहुत ऊंचे सिद्धांत थे। लोगों का एक बड़ा हुजूम भ्रष्टाचार के विरूद्ध भावनात्मक रूप से इसमें घुस गया, जिनकी भ्रष्टाचार के विरूद्ध टिके रहने की शक्ति एवं आत्मविश्वास क्षणभंगुर था।

अब ये हुजूम से निकले आम आदमी पार्टी के नेता छल-प्रपंच सीख चुके हैं और अपना असली चरित्र, जोकि पारम्परिक राजनेताओं जैसा ही है, दिखा रहे हैं। दिल्ली के बाद आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता पंजाब में बढ़ी थी। वहां पर भी चुनावों के दौरान इस पार्टी के नेताओं पर पैसों के लेन-देन करने, अलगाववादियों से धन व चुनावी मदद लेने, पार्टी नेताओं के नशा करने के चर्चे आम रहे। नतीजा, बहुत जल्द पंजाब की जनता ने भांप लिया कि सत्ता आम आदमी पार्टी के हाथ देना, यानि रोज झगड़ा-तमाशा देखना पड़ेगा। अत: 132 वर्ष पुरानी कांग्रेस को चुनकर प्रदेशवादियों ने जता दिया कि आम आदमी पार्टी अदूरदर्शी, मौकापरस्त, अनाड़ी नेताओं का जमावड़ा भर है।

इधर आम आदमी पार्टी पंजाब में हार के बाद नया ढांचा बना रही है और एक शराबी नेता को पार्टी की कमान सौंप दी है, जिससे वायदा लिया है कि वह शराब नहीं पियेगा। क्या पंजाब में पार्टी के पास नशामुक्त नेताओं की कमी है? आम आदमी पार्टी आए दिन ऐसा बर्ताव कर रही है कि लोग अब इन पर हंसने लगे हैं। राजनीतिक दलों में सबसे बड़ी पहचान दल की विचारधारा होती है। नेता आते-जाते रहते हैं, लेकिन पार्टी अपनी एक विचारधारा पर आगे बढ़ती रहती है। जिस विचारधारा की झलक पार्टी के नेताओं से कार्यकर्ताओं तक में झलकती है। अफसोस, आम आदमी पार्टी की अब कोई विचारधारा ही नजर नहीं आ रही है और इसके नेताओं व कार्यकर्ताओं का व्यवहार तो एकदम समझ से परे है।

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