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अंतरिक्ष में मनुष्य भेजने का खुला रास्ता

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अतरिक्ष असीम है और उसमें जिज्ञासा व खोज की अनंत संभावनाएं हैं। करीब 30 साल पहले भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में भविष्य की सुखद संभावनाओं को तलाशने की पहल की थी। आज हम एक-एक कर कई उपलब्धियां हासिल कर अंतरिक्ष के विस्तार में अहम् मुकाम हासिल कर चुके हैं।

एक साथ अंतरिक्ष में 104 उपग्रह प्रक्षेपित करने के बाद अब हम देश का सबसे बड़ा, ताकतवर और वजनी स्वदेशी रॉकेट प्रक्षेपण यान, यानी जीएसएलवी मार्क-3 अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करने में सफल हो गए हैं। 640 टन मसलन 200 हाथियों के भार के बराबर यह रॉकेट है। अपनी पहली ही उड़ान में इसने 3136 किलोग्राम के जीसैट-19 उपग्रह को उसकी कक्षा में प्रक्षेपित कर दिया है।

इस कामयाबी का भविष्य में सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि अंतरिक्ष यात्री भी अंतरिक्ष में भेजने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। इंटरनेट की गति बढ़ जाएगी। इससे अन्य देशों के चार टन वजनी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने का महंगा बाजार भी भारत के लिए खुल जाएगा। हल्के उपग्रह भेजने में भारत ने पहले ही दुनिया में व्यापारिक साख बना ली है।

मनुष्य का जिज्ञासु स्वभाव उसकी प्रकृति का हिस्सा रहा है। मानव की खगोलीय खोजें उपनिषदों से शुरू होकर उपग्रहों तक पहुंची हैं। हमारे पूर्वजों ने शून्य और उड़न तश्तरियों जैसे विचारों की परिकल्पना की थी। शून्य का विचार ही वैज्ञानिक अनुसंधानों का केंद्र बिंदु है। बारहवीं सदी के महान खगोलविज्ञानी आर्यभट्ट और उनकी गणितज्ञ बेटी लीलावती के अलावा वराहमिहिर,भास्कराचार्य और यवनाचार्य ब्रह्मांण्ड के रहस्यों को खंगालते रहे हैं।

इसीलिए हमारे वर्तमान अंतरिक्ष कार्यक्रमों के संस्थापक वैज्ञानिक विक्रम साराभाई और सतीश धवन ने देश के पहले स्वदेशी उपग्रह का नामाकरण ‘आर्यभट्ट‘ के नाम से किया था। अंतरिक्ष विज्ञान के स्वर्ण-अक्षरों में पहले भारतीय अंतरिक्ष यात्री के रूप में राकेश शर्मा का नाम लिखा गया है। उन्होनें 3 अप्रैल 1984 को सोवियत भूमि से अंतरिक्ष की उड़ान भरने वाले यान ‘सोयूज टी-11 में यात्रा की थी। सोवियत संघ और भारत का यह साझा अंतरिक्ष कार्यक्रम था।

तय है, इस मुकाम तक लाने में अनेक ऐसे दूरदर्शी वैज्ञानिकों की भूमिका रही है,जिनकी महत्वाकांक्षाओं ने इस पिछड़े देश को न केवल अंतरिक्ष की अनंत उंचाईयों तक पहुंचाया, बल्कि अब धन कमाने का आधार भी मजबूत कर दिया। ये उपलब्धियां कूटनीति को भी नई दिशा देने का पर्याय बन रही हैं।

दरअसल प्रक्षेपण तकनीक दुनिया के चंद छह-सात देशों के पास ही है। लेकिन सबसे सस्ती होने के कारण दुनिया के इस तकनीक से महरूम देश अमेरिका, रूस, चीन, जापान का रुख करने की बजाय भारत से अंतरिक्ष व्यापार करने लगे हैं।

इसरो इस व्यापार को अंतरिक्ष निगम ‘एंट्रिक्स कार्पोरेशन’ के जरिए करता है। इसरो पर भरोसा करने की दूसरी वजह यह भी है कि उपग्रह यान की दुनिया में केवल यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी को छोड़ कोई दूसरा ऐसा प्रक्षेपण यान नहीं है,जो हमारे पीएसएलवी-सी के मुकाबले का हो।
दरअसल यह कई टन भार वाले उपग्रह ढोने में दक्ष है।

अब जीएसएलवी मार्क-3 ने नया अध्याय रच दिया है। जाहिर है, व्यावसायिक उड़ानों को मुंह मांगे दाम मिलेंगे। यही वजह है कि अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे विकसित देश अपने उपग्रह छोड़ने का अवसर भारत को दे रहे हैं। हमारी उपग्रह प्रक्षेपित करने की दरें अन्य देशों की तुलना में 60 से 65 प्रतिशत सस्ती हैं। बावजूद हमें अपनी गति और तेज करने की जरूरत है।

अभी इस बाजार में कमाई के नजरिए से अमेरिका की हिस्सेदारी 41 प्रतिशत है, जबकि भारत की कमाई 4 प्रतिशत पर ही सीमटी हुई है। चीन प्रतिवर्ष कम से कम 20 प्रक्षेपण करता है। इस दृष्टि से भी हमारी चीन से होड़ बनी रहेगी। बावजूद इसरो ने पिछले कुछ सालों में उपलब्धियों के जो झंडे गाढ़े हैं, उससे पता चलता है कि अगर काम करने का खुला परिवेश और स्वायत्तता मिले तो हमारे संस्थान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रहने वाले नहीं है। लेकिन इसरो की सफलता एक अपवाद है।

भारत के बाकी वैज्ञानिक संस्थान उल्लेखनीय प्रदर्शन करने में पिछड़ रहे हैं। भारत अंतरिक्षयान और उपग्रह प्रक्षेपण में तो अमेरिका, रूस और चीन को टक्कर दे रहा है, लेकिन परमाणु ऊर्जा से लेकर सैनिकों के लिए सुरक्षा कवच और उच्च कोटी के हथियारों के निर्माण में आज भी पिछड़े हुए हैं। इस दिशा में भी पहल की जरूरत है। बावजूद चुनौतियां कम नहीं हैं, क्योंकि हमारे अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने अनेक विपरीत परिस्थितियों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद जो उपलाब्धियां हासिल की हैं, वे गर्व करने लायक हैं।

अब अहम् चुनौतियां रक्षा क्षेत्र में हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने की दिशा में हम मजबूत पहल ही नहीं कर पा रहे हैं। जरूरत के साधारण हथियारों का निर्माण भी हमारे यहां नहीं हो पा रहा है।

आधुनिकतम राइफलें भी आयात कर रहे हैं। इस बद्हाली में हम भरोसेमंद लड़ाकू विमान, टैंक विमानवाहक पोत और पनडुब्यिों की कल्पना ही कैसे कर सकते हैं ? हमें विमान वाहक पोत आइएनएस विक्रमादित्य रूस से खरीदना पड़ा है। जबकि रक्षा संबंधी हथियारों के निर्माण के लिए ही हमारे यहां रक्षा अनुसंधान और विकास संस्थान ‘डीआरडीओ’ काम कर रहा हैं, परंतु इसकी उपलब्धियां गौण हैं। इसे अब इसरो से प्रेरणा लेकर अपनी सक्रियता बढ़ाने की जरूरत है।

क्योंकि भारत हथियारों का सबसे बड़ा आयातक देश है। भारत वाकई दुनिया की महाशक्ति बनना चाहता है तो उसे रक्षा-उपकरणों और हथियारों के निर्माण की दिशा में स्वावलंबी होना चाहिए। अन्यथा क्रायोजेनिक इंजन की तकनीक के बाबत रूस और अमेरिका ने जिस तरह से भारत को धोखा दिया था, उसी तरह जरूरत पड़ने पर मारक हथियार प्राप्त करने के परिप्रेक्ष्य में भी मुंह की खानी पड़ सकती है।

दरअसल अकादमिक संस्थान दो तरह की लक्ष्यपूर्ति से जुड़े होते हैं, अध्यापन और अनुसंधान। जबकि विवि का मकसद ज्ञान का प्रसार और नए व मौलिक ज्ञान की रचनात्मकता को बढ़ावा देना होता है। लेकिन समय में आए बदलाव के साथ विवि में अकादमिक माहौल लगभग समाप्त हो गया है। इसकी एक वजह स्वतंत्र अनुसंधान संस्थानों की स्थापना भी रही है।

इसरो की ताजा उपलब्धियों से साफ हुआ है कि अकादमिक समुदाय,सरकार और उद्यमिता में एकरूपता संभव है। इस गठजोड़ के बूते शैक्षिक व स्वतंत्र शोध संस्थानों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है। बशर्ते इसरो की तरह विवि को भी अविष्कारों से वाणिज्यिक लाभ उठाने की अनुमति दे दी जाए। इसी दिशा में पहल करते हुए डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संप्रग सरकार सरकारी अनुदान प्राप्त बौद्घिक संपत्ति सरंक्षक विधेयक 2008 लाई थी।

इसका उद्देश्य विवि और शोध संस्थानों में अविष्कारों की प्रक्रिया को प्रोत्साहित करना और बौद्घिक संपत्ति के अधिकारों को सरंक्षण तथा उन्हें बाजार उपलब्ध कराना है। इस उद्यमशीलता को यदि वाकई धरातल मिलता है तो विज्ञान के क्षेत्र में नवोन्मेशी छात्र आगे आएंगे और आविष्कारों के नायाब सिलसिले की शुरूआत संभव होगी।

क्योंकि तमाम लोग ऐसे होते हैं, जो जंग लगी शिक्षा प्रणाली को चुनौती देते हुए अपनी मेधा के बूते कुछ लीक से हटकर अनूठा करना चाहते हैं। अनूठेपन की यही चाहत नए व मौलिक आविष्कारों की जननी होती है। गोया, इस मेधा को पर्याप्त स्वायत्तता के साथ अविष्कार के अनुकूल वातावरण देने की भी जरूत है। ऐसे उपाय यदि अमल में आते है तो हम स्वावलंबी तो बनेंगे ही, विदेशी मुद्रा कमाने में भी सक्षम हो जाएंगे।

प्रमोद भार्गव

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