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न्यायपालिका की गरिमा पर चोट

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देश में एक संवैधानिक संकट पैदा हो गया है। कोलकाता हाईकोर्ट के जज सीएस कर्णन को न्यायालय की अवमानना के केस में सुप्रीम कोर्ट के सात जजों ने मिलकर सजा सुनाई और त्वरित गिरफ्तारी का आदेश भी दे दिया। अब तक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को जेल भेजने की सजा सुनाई गई हो।

जहाँ तक संवैधानिक प्रक्रिया का सवाल है तो यह स्पष्ट है कि उच्च न्यायालय के न्यायाधीश यदि अपने संवैधानिक दायित्वों का उल्लंघन करते हैं, तो उन पर कदाचार के आधार पर संसद में महाभियोग चलाया जा सकता है। किन्तु यह पहला ऐसा मामला है, जिसमें किसी न्यायाधीश पर महाभियोग न चलाकर उसे सामान्य प्रक्रिया द्वारा जेल भेजा गया हो!

बेशक हाईकोर्ट के एक सिटिंग जज को जेल भेजने का आदेश भारतीय इतिहास की अभूतपूर्व घटना है। लेकिन जस्टिस सीएस कर्णन प्रकरण ने न्यायपालिका की विसंगतियों और खामियों को उजागर कर दिया है। इससे न्यायपालिका पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मौजूदा विवाद कलकत्ता हाईकोर्ट के जस्टिस कर्णन पत्र से शुरू हुआ है।

उन्होंने 20 जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए पीएम को खत लिखा था और उसकी जाँच की मांग की थी। पीएम कार्यालय ने वह पत्र भारत के मुख्य न्यायाधीश को भेज दिया था। उन आरोपों पर सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं बोल रहा है। बिना जाँच के उन आरोपों को कैसे रद्द कर दिया गया, यह समझ से परे है?

वैसे जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप अब हैरान नहीं करते। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकीलों से बात कीजिये, तो वे भ्रष्टाचार के ढेर सारे किस्से सुनायेंगे। कैसे-कैसे फैसले होते हैं! किस तरह से प्रभाव डाला जाता है! जजों की नियुक्ति से लेकर प्रमोशनों तक पर उंगलियां उठती रही हैं। अभी ताजा मामला लालू प्रसाद के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में देखा जा सकता है।

फैसले में झारखंड हाईकोर्ट के जज के खिलाफ कठोर टिप्पणी की गई है। अरुणाचल प्रदेश के पूर्व सीएम कलिखो पुल ने अपने 60 पेज के सुसाइड लेटर में भी सुप्रीम कोर्ट के जजों पर गंभीर आरोप लगाये थे। उनकी पत्नी उस पत्र को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी गई, लेकिन उन्हें न्याय नहीं मिला। उन्होंने सत्ता के सभी दरवाजों पर दस्तक दी, लेकिन हर जगह एक रहस्यमय चुप्पी ही मिली।

सवाल यह भी है कि अगर जस्टिस कर्णन मानसिक केस हैं, जैसा की कहा जा रहा है, तो फिर कोलेजियम ने उनका चयन कैसे किया था? अगर कोई जज के बारे में भ्रष्टाचार की सूचना दे, तो वह न्यायपालिका की अवमानना कैसे हो गई? मेरा मकसद न्यायपालिका पर लांछन लगाना या उसकी गरिमा पर आघात पहुँचाना कतई नहीं है,

लेकिन जब ऐसे मामले सामने आएंगे, तो उससे न्यायपालिका की गरिमा पर चोट तो लगेगी ही। और इसके लिए खुद न्यायपालिका ही जिम्मेवार है। सवाल यह भी है कि संविधान निर्माताओं में ज्यादातर ना-गिरामी वकील शामिल थे। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद से लेकर ड्राफ्टिंग कमेटी अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर भी नामी विधिवेत्ता थे।

लेकिन वे इस तरह के खतरे को भांप नहीं सके, जो संकट अभी पैदा हुआ है। न्यायविदों को मिलकर इसका समाधान ढूंढने की जरुरत है, ताकि न्यायपालिका की गरिमा और उसमें लोगों की आस्था सुरक्षित रह सके। इस पर बहस बहुत आगे तक जायेगी। बहरहाल उभयपक्ष ने संयम से काम नहीं लिया। सुप्रीम कोर्ट के चरम कदम से पूर्व केंद्र सरकार को पहल करनी थी।

महाभियोग के प्रस्ताव को लाकर देश की राजनीति को इस विषय में सक्रिय किया जा सकता था, जो कदाचित पूर्व की भांति इस विवाद को किसी सम्मान जनक मोड़ पर ला सकती थी। न्यायपालिका में बेजा हस्तक्षेप के लिए बदनाम मोदी सरकार जरुरी हस्तक्षेप के अवसर पर उदासीन रही है।

– देवेंद्रराज सुथार

 

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